

सनातन धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन सभी देवी-देवता स्वर्ग लोक से नीचे धरती पर उतर आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। माना जाता है कि भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर नाम के एक राक्षस का संहार करके देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी। त्रिपुरासुर के अत्याचारों से मिली मुक्ति और भगवान शिव के इस कृत्य पर सभी देवता अपनी प्रसन्नता जाहिर करने के लिए भगवान शिव की नगरी काशी पहुंचकर दीप प्रज्वलित करते हैं और खुशियां मनाते हैं।

दीपावली से ठीक 15 दिन बाद देव दीपावली काशी में, मां गंगा के किनारे मनाई जाएगी। अब आपको बताते हैं कि देव दीपावली आखिर क्यों मनाई जाती है और इसे मनाने के पीछे क्या कारण है।


हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ,अवतार सिंह बिष्ट ,रूद्रपुर उत्तराखंड
भगवान शिव ने किया था त्रिपुरासुर का वध
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार त्रिपुरासुर नाम के राक्षस ने तीनों लोकों पर अपना कबजा कर लिया था। उसके आतंक से देवता परेशान होकर भगवान शिव के पास पहुंचे और त्रिपुरासुर के आतंक के बारे में पूरी बात बताई। देवताओं ने भगवान शिव से कहा की इस राक्षस का अंत ही आखिरी विकल्प है, नहीं तो यह पूरी सृष्टि में हाहाकार मचा कर रख देगा। देवताओं के निवेदन करने के बाद भगवान शिव ने उस राक्षस का वध कर दिया।
देवताओं ने काशी में मनाई थी दीपावली
त्रिपुरासुर के अंत होने के बाद सभी देवता प्रसन्न हुए और भगवान शिव का आभार व्यक्त करने के लिए उनकी नगरी काशी पहुंचे। काशी पहुंचने के बाद देवताओं ने मां गंगा किनारे दीप प्रज्जवलित कर त्रिपुरासुर के अंत की खुशियां मनाई। दीपों के प्रकाश से उस समय काशी नगरी संपूर्ण जगत में जगमगा उठी थी। इस कारण काशी की दीपावली को देव दीपावली कहा जाता है।
दिवाली के 15 दिन बाद मनाई जाती है देव दीपावली
जिस दिन त्रिपुरासुर का वध हुआ था। वहा दिन कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी। यानी दीपावली से ठीक 15 दिन बाद कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि पड़ती है। इस कारण दिवाली के ठीक 15 दिन बाद देव दीपावली मनाने का विधान है।




