

संपादकीय | सामाजिक न्याय की दिशा में सार्थक पहल,उत्तराखंड में बंगाली समुदाय की वंचित उपजातियों को अनुसूचित जाति के समान छात्रवृत्ति लाभ देने का निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। धामी सरकार ने संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहते हुए जिस तत्परता और संवेदनशीलता का परिचय दिया है, वह सराहनीय है। केंद्र के अधिकार क्षेत्र को सम्मान देते हुए राज्य स्तर पर राहत देना दूरदर्शी शासन का उदाहरण है। सांसद अजय भट्ट द्वारा लोकसभा में इस विषय को मजबूती से उठाना यह दर्शाता है कि भाजपा सरकार और उसके जनप्रतिनिधि हाशिये पर खड़े समाज की आवाज सुनने को तैयार हैं। यह पहल उत्तराखंड की मूल अवधारणा—समान अवसर और सामाजिक समरसता—को मजबूत करती है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
उत्तराखंड में सामाजिक न्याय और समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने बंगाली समुदाय की कुछ वंचित उपजातियों—विशेष रूप से नमःशुद्र, पौंड्र और माझी—के लिए ठोस और संवेदनशील कदम उठाए हैं। यह वे समुदाय हैं जो दशकों से अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा पाने की मांग कर रहे हैं और जिनकी सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति को लेकर समय-समय पर आंदोलन, रैलियां और ज्ञापन होते रहे हैं।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में इन उपजातियों को पहले से अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है, जबकि उत्तराखंड और दिल्ली जैसे राज्यों में यह प्रक्रिया लंबे समय से लंबित रही। ऐसे में उत्तराखंड सरकार द्वारा उठाया गया हालिया कदम न केवल व्यावहारिक है, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी परिचायक है।
उत्तराखंड सरकार द्वारा अब तक की गई प्रमुख प्रक्रियाएं
- समुदाय की मांग को औपचारिक मान्यता
भाजपा सरकार ने सबसे पहले बंगाली समुदाय की इन उपजातियों की मांग को गंभीरता से संज्ञान में लिया। सामाजिक संगठनों, बंगाली महासभा और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से प्राप्त ज्ञापनों पर विचार कर इसे केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से जुड़ा विषय माना गया। - छात्रवृत्ति में अंतरिम राहत
वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने एक ऐतिहासिक और मानवीय निर्णय लेते हुए यह आदेश जारी किया कि नमःशुद्र, पौंड्र और माझी जाति के विद्यार्थियों को अनुसूचित जाति के समान छात्रवृत्ति का लाभ दिया जाएगा।
यह फैसला तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब पूर्ण SC दर्जा अभी केंद्र सरकार के स्तर पर विचाराधीन है। इससे हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा के क्षेत्र में तत्काल राहत मिली है। - समाजिक न्याय विभाग के माध्यम से प्रस्ताव तैयार
राज्य सरकार द्वारा सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण विभाग के स्तर पर आवश्यक दस्तावेज, जातीय अध्ययन, जनसंख्या आंकड़े और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े तथ्य संकलित कर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। - केंद्र से समन्वय और अनुशंसा
अनुसूचित जाति में किसी भी जाति को शामिल करने का संवैधानिक अधिकार केंद्र सरकार के पास है। इस संवैधानिक मर्यादा का सम्मान करते हुए उत्तराखंड सरकार ने केंद्र को स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया है कि राज्य स्तर पर इन उपजातियों को सामाजिक रूप से वंचित मानते हुए SC दर्जा देने के पक्ष में सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा चुका है। - आंदोलन को संवाद में बदलने का प्रयास
भाजपा सरकार की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने सड़क के आंदोलन को संवाद और नीति की मेज तक पहुंचाने का प्रयास किया। यही कारण है कि लंबे समय से चली आ रही यह मांग अब एक ठोस प्रशासनिक प्रक्रिया का रूप ले चुकी है।
एक जिम्मेदार सरकार, एक संवेदनशील संदेश
उत्तराखंड भारतीय जनता पार्टी सरकार यह भली-भांति समझती है कि सामाजिक न्याय केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि चरणबद्ध और संवैधानिक प्रक्रिया से मिलता है। जब तक केंद्र सरकार द्वारा पूर्ण SC दर्जा नहीं मिलता, तब तक छात्रवृत्ति जैसे अंतरिम लाभ देकर राज्य सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी वंचित समुदाय को शिक्षा और अवसरों से वंचित नहीं होने देगी।
यह निर्णय न केवल बंगाली समुदाय के लिए आशा की किरण है, बल्कि उत्तराखंड के समस्त समाज के लिए यह संदेश भी है कि राज्य सरकार जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर नहीं, बल्कि न्याय और समान अवसर के सिद्धांत पर कार्य कर रही है।




