लाइव प्रसारण: खड़ी होली की मची है धूम, रुद्रपुर से संस्कृति का सीधा संवाद✍️ अवतार सिंह बिष्ट | Hindustan Global Times

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Rudrapur। पर्वतीय लोकसंस्कृति की धड़कन एक बार फिर खड़ी होली के सुरों में जीवंत हो उठी है। वसुंधरा ग्रीन, फुलसूँगी से हो रहा लाइव प्रसारण इस सांस्कृतिक उत्सव को केवल एक स्थानीय आयोजन तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि इसे शहर और प्रवासी पर्वतीय समाज के बीच भावनात्मक सेतु में बदल रहा है। डिजिटल युग में परंपरा का यह सीधा प्रसारण इस बात का प्रमाण है कि लोकसंस्कृति केवल मंच तक सीमित नहीं, बल्कि अब स्क्रीन के माध्यम से भी घर-घर पहुंच रही है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


जगदीश बिष्ट एवं गीता बिष्ट दंपति द्वारा वर्ष 2017 से निरंतर आयोजित यह खड़ी होली अब एक प्रतिष्ठित सामाजिक आयोजन का स्वरूप ले चुकी है। इस वर्ष का कार्यक्रम विशेष रूप से चर्चा में है क्योंकि इसका लाइव प्रसारण किया जा रहा है, जिससे वे लोग भी इस उत्सव से जुड़ पा रहे हैं जो किसी कारणवश उपस्थित नहीं हो सके।
ढोल-दमाऊं की थाप, कुमाऊँनी और गढ़वाली होली के पारंपरिक राग, महिलाओं की सामूहिक स्वर लहरियां और पारंपरिक वेशभूषा—इन सबने आयोजन को विशिष्ट गरिमा प्रदान की। पारिवारिक वातावरण में आयोजित यह उत्सव सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण बना।
विशेष उल्लेखनीय रहा महिलाओं का उत्साहपूर्ण सहभाग। पारंपरिक गीतों के साथ आधुनिक संगीत की झलक ने यह संकेत दिया कि संस्कृति स्थिर नहीं होती, वह समय के साथ संवाद करती है। परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय इस आयोजन की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरा।
तेजी से बदलते शहरी परिवेश में, जहाँ नई पीढ़ी वैश्विक प्रभावों से प्रभावित है, ऐसे आयोजन उन्हें अपनी जड़ों से परिचित कराने का सशक्त माध्यम बन रहे हैं। लाइव प्रसारण ने इस प्रयास को और व्यापक बना दिया है। प्रवासी परिवारों ने भी डिजिटल माध्यम से जुड़कर अपनी सांस्कृतिक भागीदारी सुनिश्चित की।
यह आयोजन केवल रंग और राग का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और सामूहिक पहचान का उत्सव है। खड़ी होली के बहाने समाज एक साथ बैठता है, गाता है, संवाद करता है और अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराता है।
निस्संदेह, वसुंधरा ग्रीन में गूंजती यह होली रुद्रपुर की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई दे रही है। लाइव प्रसारण के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट है—लोकसंस्कृति जीवित है, सक्रिय है और डिजिटल युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी।


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