महाराणा सांगा का गुजरात अभियान – 1518 ईस्वी में ईडर के उत्तराधिकार संघर्ष में महाराणा सांगा ने रायमल राठौड़ का समर्थन किया, जिससे विरोधी पक्ष के भारमल ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर की सहायता ली। सुल्तान ने निजामुल्मुल्क के नेतृत्व में ईडर पर आक्रमण करवाया, जिससे रायमल को पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी और अंततः निजामुल्मुल्क ने ईडर पर कब्जा कर लिया। 1520 ईस्वी में महाराणा सांगा ने 40,000 घुड़सवारों के साथ ईडर पर आक्रमण किया। निजामुल्मुल्क, महाराणा की शक्ति से भयभीत होकर बिना लड़े भाग गया और अहमदनगर में शरण ली। महाराणा ने ईडर को जीतकर रायमल को पुनः गद्दी पर बैठाया। बाद में, महाराणा सांगा ने अहमदनगर पर चढ़ाई की। घमासान युद्ध हुआ, जिसमें राजपूत योद्धा कान्हसिंह चौहान ने वीरगति प्राप्त की। अंततः अहमदनगर का किला जीत लिया गया, और निजामुल्मुल्क भागकर अहमदाबाद चला गया। इसके बाद महाराणा ने बीसलनगर को भी लूट लिया। इस अभियान में महाराणा सांगा ने अपने अपमान का बदला लिया, गुजरात के सुल्तान को परास्त किया, रायमल को पुनः ईडर का शासक बनाया और विजयी होकर चित्तौड़ लौटे।

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“महाराणा सांगा के गुजरात अभियान का विस्तृत वर्णन”

प्रिंट मीडिया, शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/संपादक उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर, (उत्तराखंड)

“1518 ई. – महाराणा सांगा व गुजरात के सुल्तान द्वारा ईडर के उत्तराधिकार संघर्ष में हस्तक्षेप”

ईडर के उत्तराधिकार संघर्ष में महाराणा सांगा द्वारा रायमल राठौड़ का पक्ष लिए जाने पर भारमल नाराज़ होकर गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर की शरण में चले गए और मदद मांगी।

सुल्तान मुजफ्फर ने निजामुल्मुल्क को फ़ौज समेत ईडर पर चढ़ाई करने भेजा। रायमल घबराकर बीजानगर की पहाड़ियों में चले गए और बाद में गुजराती सेनाओं से कई लड़ाइयां लड़े। आखिर में निजामुल्मुल्क ने ईडर पर कब्ज़ा कर लिया।

“1520 ई. – महाराणा सांगा की ईडर पर चढ़ाई”

एक दिन एक भाट ने निजामुल्मुल्क के सामने महाराणा सांगा की प्रशंसा करते हुए कहा कि “आज पूरे हिंदुस्तान में महाराणा संग्रामसिंह जैसा कोई दूसरा राजा नहीं है। महाराणा ने रायमल को शरण दी है, इसलिए आप भले ही थोड़े दिन ईडर में रह लो, पर अंत में राज्य तो रायमल को ही मिलेगा”

ये सुनकर निजामुल्मुल्क ने एक कुत्ते का नाम संग्रामसिंह रखकर उसे ईडर के दरवाजे पर बांध दिया और भाट से कहा कि “अगर संग्रामसिंह ऐसा ही मर्द है, तो यहां आकर अपनी किस्मत आज़मावे। मैं भी देखता हूँ कि वह किस तरह रायमल की हिफाज़त करता है। मैं यहीं बैठा हूँ, वह आता क्यों नहीं है यहां ?”

भाट ने कहा कि “महाराणा सांगा जरूर आवेंगे और तुमको ईडर से निकालेंगे”

फिर भाट ने चित्तौड़ आकर महाराणा सांगा को यह बात बताई, तो महाराणा ने 40 हज़ार सवारों समेत ईडर पर चढाई की। रास्ते में डूंगरपुर रावल उदयसिंह अपनी फौज समेत महाराणा की सेवा में हाजिर हुए।

महाराणा सांगा के सामने मालवा का सुल्तान नहीं टिक सका तो निजामुल्मुल्क तो मात्र गुजरात के सुल्तान का एक सिपहसलार था। महाराणा सांगा की चढ़ाई की ख़बर सुनकर ही वह घबरा गया और उसने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर को खत लिखकर मदद मांगी, लेकिन सुल्तान के मंत्रियों और निजामुल्मुल्क के बीच अनबन थी, जिसके कारण मंत्रियों ने सुल्तान से कहा कि इस वक्त निजामुल्मुल्क की मदद वास्ते फ़ौज भेजना ठीक नहीं है।

सुल्तान मुजफ्फर फौज समेत रवाना हुआ और मुहम्मदाबाद पहुंचा, जहां उसे निजामुल्मुल्क का खत मिला, जिसमें लिखा था कि “राणा के पास 40 हज़ार सवार हैं और मेरे पास महज़ 5000, इस ख़ातिर ईडर को बचाना नामुमकिन है।”

मुजफ्फर ने फिर मंत्रियों से सलाह की और मंत्रियों ने फ़ौज भेजना गलत बताया। गुजराती सुल्तान और उसके मंत्रियों के बीच सलाह मशवरे होते रहे और इधर महाराणा सांगा ईडर तक आ पहुंचे।

निजामुल्मुल्क लड़ने के लिए किले से बाहर निकला, पर महाराणा की फौज देखकर बिना लड़े ही भागकर फिर से ईडर के किले में जा छिपा। कुछ समय बाद वह ईडर छोड़कर अहमदनगर के किले में चला गया। महाराणा सांगा ने ईडर पर अधिकार करके वहां की गद्दी पर रायमल राठौड़ को बिठाया।

“महाराणा सांगा की अहमदनगर पर चढाई”

निजामुल्मुल्क के अहमदनगर में छिपे होने की खबर सुनकर महाराणा सांगा ने अहमदनगर के किले को घेर लिया। निजामुल्मुल्क के सैनिकों ने किले के द्वार बन्द कर दिए और किले से ही हमले किए।

महाराणा की तरफ से डूंगरसिंह चौहान सख्त जख्मी हुए और उनके कई भाई-बेटे इस लड़ाई में काम आए। महाराणा ने डूंगरसिंह को बदनोर की जागीर दी थी।

बदनोर में डूंगरसिंह द्वारा बनवाए हुए महल, तालाब, बावड़ियाँ आदि मौजूद हैं। वर्तमान में डूंगरसिंह चौहान के वंशज वागड़ में रहते हैं। डूंगरसिंह चौहान के पुत्र कान्हसिंह चौहान ने बड़ी बहादुरी दिखाई।

कान्हसिंह ने महावत से कहा कि हाथी से किले के दरवाजे तुड़वा दो। हाथी ने दरवाजे पर लगी कीलों से डरकर हमला नहीं किया, जिससे कान्हसिंह ने दरवाजे पर लगी कीलों को पकड़ा और हाथी से कहा कि टक्कर मारे।

हाथी की टक्कर से दरवाजा खुल गया, पर कान्हसिंह के जिस्म से कीले आरपार हो गए व वे वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसी ही एक घटना महाराणा अमरसिंह के समय ऊँठाळा दुर्ग में हुई, जिसमें बल्लू शक्तावत ने वही काम किया जो यहां कान्हसिंह ने किया।

कान्हसिंह की वीरता से उत्साहित होकर राजपूतों ने अहमदनगर के किले में घुसकर सब मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया।

निजामुल्मुल्क अपनी फौज समेत किले के पीछे की खिड़की से भाग रहा था कि तभी उस भाट ने देख लिया, जिसने महाराणा सांगा की तारीफ की थी। भाट ने कहा कि “तुम तो सदा ही महाराणा के आगे भागा करते हो”

ये सुनकर निजामुल्मुल्क लज्जित हुआ और बाहर निकलकर नदी के मुहाने पर जाकर महाराणा का सामना करने के लिए रुक गया। महाराणा सांगा ने अहमदनगर का किला फतह किया व निजामुल्मुल्क से मुकाबले के लिए नदी की तरफ निकले।

नदी किनारे निजामुल्मुल्क ने 1200 जंगी सवार व 1000 पैदल फौज के साथ महाराणा सांगा की फौज का सामना किया। निजामुल्मुल्क का सिपहसालार असत खां मारा गया।

निजामुल्मुल्क जख्मी हालत में खिज्र खां के साथ भागकर अहमदाबाद चला गया। अहमदनगर की लड़ाई में महाराणा सांगा ने कई मुसलमानों को कैद किया।

अहमदनगर में कहर बरपाने के बाद अगले दिन महाराणा सांगा बड़नगर पहुंचे, जहां ब्राह्मणों ने महाराणा से विनती करते हुए कहा कि “आपके पूर्वजों ने हमेशा हमारी सहायता की है, इसलिए आप बड़नगर को न लूटें”

महाराणा सांगा ने उनकी बात मानकर वहां से प्रस्थान किया और बीसलनगर पहुंचे। बीसलनगर की लड़ाई में मेवाड़ी फ़ौज के हाथों वहां का हाकिम हातिम खां मारा गया। महाराणा ने बीसलनगर को लूट लिया।

इस प्रकार महाराणा सांगा ने अपने अपमान का बदला लिया, निजामुल्मुल्क को बुरी तरह परास्त किया, अपनी शरण में आए हुए रायमल राठौड़ को ईडर का राज दिलाया और गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर को हंसी का पात्र बनाते हुए कैद किए गए मुसलमानों को साथ लेकर चित्तौड़ की तरफ़ प्रस्थान किया।


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