मुंबई की अंधेरी गलियाँ?क्राइम स्टोरी : “डैडी – दगड़ी चॉल से विधानसभा तक”

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मुंबई का नाम लेते ही अंडरवर्ल्ड की कहानियाँ सामने आ जाती हैं। दाऊद इब्राहिम, हाजी मस्तान, करिम लाला और छोटा राजन जैसे डॉन के बीच एक और नाम दशकों तक गूंजता रहा—अरुण गवली। कभी ‘डैडी’ कहलाने वाले इस डॉन की दास्तान अपराध और राजनीति के अजीब मेल का प्रतीक है।
गरीबी से अपराध की ओर
1955 में अहमदनगर जिले के एक गरीब परिवार में जन्मे गवली का बचपन संघर्षों से भरा था। परिवार रोज़गार की तलाश में मुंबई आ गया। गवली ने मिलों में नौकरी की, लेकिन 1970 के दशक में मिलों के बंद होने के बाद बेरोज़गारी ने उन्हें अपराध की ओर धकेल दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

शुरुआत में गवली रामभाई नाइक गैंग और बाद में दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी से जुड़े। लेकिन जल्दी ही उन्होंने अपनी अलग राह बनाई और भायखला की दगड़ी चॉल को अपना किला बना लिया। यही से गवली का नाम ‘डैडी’ बनकर गूंजने लगा।

खूनी गैंगवार,1990 के दशक में गवली और दाऊद गैंग के बीच खूनी संघर्ष शुरू हुआ। शहर में सुपारी किलिंग, रंगदारी और शूटआउट आम हो गए। पुलिस रिकॉर्ड में गवली पर हत्या, वसूली और संगठित अपराध के दर्जनों मामले दर्ज हुए। लेकिन स्थानीय लोग उन्हें गरीबों का मसीहा मानते थे। शादियों में मदद करना और मुहल्ले की समस्याएँ सुलझाना उनकी छवि को और मजबूत करता रहा।

1997 में गवली ने अखिल भारतीय सेना पार्टी बनाई। 2004 में वे चिंचपोकली विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। राजनीति ने उन्हें वैध पहचान दी, लेकिन उनके अपराध का साया हमेशा साथ रहा

2007 में शिवसेना पार्षद कमलाकर जामसंदेकर की हत्या ने गवली को फिर सुर्खियों में ला दिया। जाँच में गवली के गैंग का हाथ सामने आया। 2012 में मकोका अदालत ने उन्हें उम्रकैद और 17 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा।

2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्र और लंबी जेल की सजा को देखते हुए जमानत मंजूर कर दी। 17 साल बाद गवली नागपुर जेल से बाहर आए। मुंबई की दगड़ी चॉल में उनका स्वागत किसी नायक की तरह हुआ। गुलाल, फूल और नारों के बीच गवली की वापसी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि मुंबई का समाज अपराध और राजनीति को किस नज़र से देखता है।

अरुण गवली की कहानी सिर्फ एक गैंगस्टर की दास्तान नहीं, बल्कि इस सच्चाई का आईना है कि कैसे अपराध, राजनीति और जनता की भावनाएँ मिलकर एक ‘डॉन’ को ‘डैडी’ बना देती हैं। अब देखना होगा कि जेल से बाहर आने के बाद 70 वर्षीय गवली किस राह पर चलते हैं—क्या वे राजनीति में फिर से कदम रखेंगे या बीते अपराधों की परछाई से दूरी बनाएंगे।

अरुण गवली की रिहाई का मायना?मुंबई की दगड़ी चॉल में बुधवार रात जब गुलाल उड़ाया गया, मिठाइयाँ बांटी गईं और फूलों की बरसात हुई, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की जेल से रिहाई का जश्न नहीं था। यह उस शहर की याद दिलाने वाला क्षण भी था, जिसने कभी अंडरवर्ल्ड के साए में सांस ली थी। अरुण गवली, जिन्हें उनके अनुयायी ‘डैडी’ कहकर पुकारते हैं, 17 साल बाद जेल से बाहर आए।

गवली की कहानी भारतीय अंडरवर्ल्ड और राजनीति के उस संगम का प्रतीक है, जहाँ अपराध, सत्ता और जनसमर्थन एक अजीब-सी गठजोड़ बनाते हैं। एक ओर वे 1980-90 के दशक में भय और खौफ का नाम बने, तो दूसरी ओर राजनीति की राह पकड़कर विधायक तक बने। यह विरोधाभास ही गवली को एक मिथकीय चरित्र बना देता है—एक ऐसा शख्स जो अपराधी भी था और नेता भी।

सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्र और जेल में बिताए लंबे समय को देखते हुए जमानत दी है। लेकिन सवाल यह है कि समाज उन्हें अब किस रूप में देखेगा? क्या वे जेल की दीवारों से बाहर निकलकर एक ‘सुधरे हुए’ जननेता के तौर पर अपनी छवि बनाएंगे, या फिर उनकी पहचान हमेशा अपराध की परछाई में ही कैद रहेगी?

गवली की रिहाई हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि लोकतंत्र में अपराध और राजनीति का यह गठजोड़ आखिर कब तक चलेगा। जनता की स्मृति छोटी होती है, लेकिन इतिहास गवाह है कि अंडरवर्ल्ड से राजनीति तक का सफर कभी भी निर्दोष नहीं रहा।

आज ‘डैडी’ की वापसी पर उनके समर्थक उत्साहित हो सकते हैं, पर मुंबई को यह सवाल जरूर करना चाहिए कि क्या अपराध की राजनीति का यह अध्याय अब भी अधूरा है, या इसके पन्ने आखिरकार बंद हो जाने चाहिए।




मुंबई की अंधेरी गलियाँ?मुंबई—एक ऐसा शहर जिसे “सपनों की नगरी” कहा जाता है। यहाँ रोज़ाना हज़ारों लोग अपने सपनों को पूरा करने आते हैं। कोई अभिनेता बनने का ख्वाब लेकर, कोई कारोबारी, तो कोई मेहनतकश मज़दूर बनकर। लेकिन इन्हीं चमकती रोशनियों के पीछे एक अंधेरा भी पलता रहा है—मुंबई का अंडरवर्ल्ड।

1970 से लेकर 1990 का दौर, मुंबई पुलिस और अंडरवर्ल्ड के बीच जैसे लगातार युद्ध का दौर था। एक तरफ़ वरदराजन मुदलियार, करीम लाला और दाऊद इब्राहिम जैसे नाम अपराध की दुनिया के सम्राट बनकर उभरे, तो दूसरी तरफ़ अरुण गवली जैसे डॉन ने अपनी जमीनी पकड़ से मुंबई की राजनीति और अपराध दोनों को हिला दिया।

गवली का नाम आते ही “दगड़ी चॉल” की तस्वीर आँखों में उभरती है। यह वही जगह थी जो एक समय मुंबई पुलिस के लिए अजेय किला मानी जाती थी। पुलिस के लिए वहाँ घुसना किसी दुश्मन के गढ़ पर चढ़ाई करने जैसा था। लेकिन गवली के लिए यह सिर्फ़ घर नहीं, बल्कि सत्ता और डर का प्रतीक बन चुका था।

आज 17 साल बाद जेल से छूटे अरुण गवली को लोग फिर “डैडी” कहकर पुकार रहे हैं। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ एक अपराधी की नहीं, बल्कि उस समाज और व्यवस्था की भी है जिसने अपराध और राजनीति को आपस में गूंथ दिया।


बचपन और शुरुआती ज़िंदगी?अरुण गुलाबराव गवली का जन्म 1955 में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के कोपरगाँव तालुके में हुआ था। गवली का परिवार गरीब था और रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करता था। बेहतर रोज़गार की तलाश में उनका परिवार मुंबई आ गया और भायखला की मशहूर दगड़ी चॉल में रहने लगा।

गवली का बचपन तंगहाली और संघर्ष में बीता। उन्होंने शुरुआत में मुंबई की कपड़ा मिलों में काम किया। लेकिन 1970 के दशक में जब कपड़ा मिलों में बड़े पैमाने पर हड़तालें और बंदी शुरू हुईं, तब हज़ारों मजदूर बेरोज़गार हो गए। अरुण गवली भी उन्हीं में से एक थे।

बेरोज़गारी और गरीबी ने गवली को अपराध की ओर धकेल दिया। पहले उन्होंने जुए और सट्टेबाज़ी जैसे छोटे-मोटे काम किए। धीरे-धीरे वे स्थानीय गुंडों के संपर्क में आए और दगड़ी चॉल से निकलकर मुंबई के अंडरवर्ल्ड में कदम रख दिया।


: अंडरवर्ल्ड की सीढ़ियाँ शुरुआत – मामा और बाप्पा के साथ?मुंबई अंडरवर्ल्ड में गवली का पहला असली संपर्क रामा नाइक और बाबू रेशीम जैसे स्थानीय गैंगस्टरों से हुआ। इन्हें दगड़ी चॉल का “मामा-बाप्पा” कहा जाता था। ये दोनों गवली के गुरु जैसे बने और धीरे-धीरे गवली ने इनके साथ मिलकर उगाही, जुआ, और स्मगलिंग में हाथ आज़माया।

दाऊद से दोस्ती और दुश्मनी?1980 के दशक की शुरुआत में गवली का संपर्क दाऊद इब्राहिम से हुआ। शुरू में दोनों ने एक-दूसरे के साथ काम किया। गवली की जमीन पर पकड़ और दाऊद के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन ने अंडरवर्ल्ड को नया आकार दिया।

लेकिन ज्यादा समय यह दोस्ती नहीं टिक सकी। दाऊद धीरे-धीरे दुबई से ऑपरेट करने लगा और उसका नेटवर्क बहुत बड़ा हो गया। वहीं गवली मुंबई में रहकर लोकल पावर का चेहरा बने रहे। दोनों के बीच पैसे और वर्चस्व को लेकर खींचतान शुरू हुई, जो बाद में खूनी दुश्मनी में बदल गई।

गवली गिरोह का उदय?1980 और 1990 के दशक में दाऊद का डी-कंपनी अंडरवर्ल्ड पर राज कर रहा था। लेकिन दगड़ी चॉल से अरुण गवली ने भी अपना गैंग खड़ा किया।वसूली और सुपारी किलिंग,जुए और सट्टे का धंधा,बिल्डरों और कारोबारियों से प्रोटेक्शन मनी,गवली का नाम जल्दी ही मुंबई की ख़बरों में आने लगा। दगड़ी चॉल उनका “मुख्यालय” बन गई। पुलिस भी जानती थी कि बिना खून-खराबे के वहाँ दाखिल होना लगभग नामुमकिन है।

गवली की ताकत इतनी बढ़ी कि दाऊद के कई पुराने साथी भी उनका साथ देने लगे। यह वही दौर था जब मुंबई अंडरवर्ल्ड खेमों में बंट गया—एक तरफ़ दाऊद इब्राहिम, दूसरी तरफ़ अरुण गवली।

रुद्रपुर की गलियों में हाल के दिनों में अंडरवर्ल्ड की हलचल शहरों की शांति के पीछे रहस्यमयी परछाइयाँ कभी ड्रग्स की खेप, तो कभी ……………..की फुसफुसाहट। क्रमशः








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