गणतंत्र दिवस 2026: पहाड़ की पीड़ा, संविधान की चेतावनी और पौड़ी गढ़वाल का अधूरा सपना

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भारत का गणतंत्र केवल राजपथ की परेड, सैन्य शक्ति प्रदर्शन या औपचारिक भाषणों तक सीमित नहीं है। गणतंत्र का वास्तविक अर्थ है—हर नागरिक को समान अवसर, सम्मानजनक जीवन और न्याय। लेकिन जब 26 जनवरी 2026 को देश अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, तब उत्तराखंड और उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जैसे पर्वतीय जिलों में यह सवाल फिर से खड़ा होता है—क्या पहाड़ के लिए गणतंत्र वास्तव में पूरा हुआ है?
उत्तराखंड राज्य निर्माण के पीछे जो सपना था—पलायन रोके जाने का, स्थानीय रोजगार का, शिक्षा–स्वास्थ्य की बेहतर व्यवस्था का—वह सपना आज भी अधूरा प्रतीत होता है। विशेषकर पौड़ी गढ़वाल, जो कभी प्रशासनिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा, आज उपेक्षा, खाली होते गांवों और टूटते भरोसे का प्रतीक बनता जा रहा है।
हिमालय क्रांति पार्टी और पहाड़ की असली आवाज
लगभग एक दशक पहले, 2018 के आसपास, जब मुख्यधारा की राजनीति पहाड़ को केवल चुनावी गणित के रूप में देख रही थी, तब हिमालय क्रांति पार्टी जैसी क्षेत्रीय ताकतों ने पौड़ी गढ़वाल में यह सवाल उठाया था कि—
“अगर पहाड़ से लोग पलायन कर रहे हैं, तो यह केवल रोजगार का संकट नहीं, बल्कि गणतंत्र की विफलता है।”
हिमालय क्रांति पार्टी ने स्थायी राजधानी, स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास, शिक्षा–स्वास्थ्य की विकेंद्रीकृत व्यवस्था और पलायन के खिलाफ ठोस नीति की मांग को लगातार उठाया। इन मांगों को उस समय भले ही “क्षेत्रीय राजनीति” कहकर खारिज कर दिया गया हो, लेकिन 2026 में खड़े होकर देखें तो वही सवाल आज भी जस के तस हैं।
स्थायी राजधानी: केवल प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक सवाल
उत्तराखंड में स्थायी राजधानी का प्रश्न केवल भौगोलिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता का प्रश्न है। पौड़ी गढ़वाल लंबे समय तक यह अपेक्षा करता रहा कि पहाड़ के भीतर प्रशासनिक केंद्र स्थापित होंगे, जिससे विकास का संतुलन बनेगा।
लेकिन 26 वर्ष बाद भी राजधानी का अस्थायी स्वरूप यह बताता है कि सत्ता की प्राथमिकताओं में पहाड़ आज भी पीछे है। हिमालय क्रांति पार्टी ने यह स्पष्ट कहा था कि—
“जब तक सत्ता का केंद्र पहाड़ में नहीं होगा, तब तक नीति भी मैदान-केंद्रित ही रहेगी।”
गणतंत्र दिवस 2026 पर यह सवाल और तीखा हो जाता है कि क्या एक पर्वतीय राज्य की राजधानी भी यदि स्थायी न हो, तो उसे पूर्ण गणतंत्र कैसे कहा जाए?
पलायन: पौड़ी गढ़वाल का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संकट
पलायन पौड़ी गढ़वाल की नियति नहीं है, बल्कि दशकों की नीतिगत उपेक्षा का परिणाम है। 2018 में जिस तरह गांव के गांव खाली हो रहे थे, वह स्थिति आज भी पूरी तरह बदली नहीं है।
खेत बंजर हैं, स्कूलों में ताले लटक रहे हैं, और गांवों में केवल बुज़ुर्ग रह गए हैं। यह केवल सामाजिक संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए चेतावनी है। क्योंकि जब नागरिक अपने ही क्षेत्र में जी नहीं पा रहा, तो उसके मतदान, भागीदारी और लोकतांत्रिक अधिकार भी कमजोर पड़ते हैं।
हिमालय क्रांति पार्टी ने वर्षों पहले यह कहा था कि—
“पलायन रोके बिना कोई भी गणतंत्र पहाड़ में टिक नहीं सकता।”
बेरोज़गारी: पहाड़ के युवा और टूटा भरोसा
पौड़ी गढ़वाल का युवा आज सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुका है। शिक्षा लेने के बाद उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं—या तो शहरों की ओर पलायन, या फिर बेरोज़गारी।
2016 से 2026 के बीच कई योजनाएं आईं, स्वरोज़गार के दावे हुए, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि स्थानीय स्तर पर टिकाऊ रोजगार का अभाव बना हुआ है। पर्यटन, कृषि, बागवानी, जड़ी-बूटी और वन आधारित उद्योग—ये सभी संभावनाएं कागज़ों तक सीमित रहीं।
गणतंत्र का अर्थ केवल वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानजनक आजीविका का अधिकार भी है, जो पहाड़ के युवाओं को आज भी पूरी तरह नहीं मिल पाया।
शिक्षा: स्कूल हैं, लेकिन भविष्य नहीं
पौड़ी गढ़वाल में शिक्षा व्यवस्था गणतंत्र की एक और असफल कड़ी है। 2018 में कई सरकारी स्कूल छात्रविहीन हो चुके थे। 2026 में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती।
दूरी, शिक्षकों की कमी, संसाधनों का अभाव और पलायन—इन सबने पहाड़ के बच्चों के भविष्य को असुरक्षित बना दिया है। संविधान समान शिक्षा का अधिकार देता है, लेकिन पहाड़ में यह अधिकार आज भी संघर्ष बनकर रह गया है।
स्वास्थ्य: जीवन के अधिकार पर सवाल
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी पौड़ी गढ़वाल में गणतंत्र की सच्चाई उजागर करती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भवन तो हैं, लेकिन डॉक्टर नहीं। आपात स्थिति में मरीजों को घंटों सड़क पर ले जाना आज भी आम बात है।
जब इलाज दूरी और किस्मत पर निर्भर हो जाए, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 पर सीधा प्रहार है।
गणतंत्र दिवस 2026: आत्ममंथन की ज़रूरत
26 जनवरी केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। पौड़ी गढ़वाल जैसे जिलों के लिए यह पूछने का समय है—
क्या पलायन रुका?
क्या युवाओं को स्थानीय रोजगार मिला?
क्या शिक्षा और स्वास्थ्य सुलभ हुए?
क्या स्थायी राजधानी का सपना साकार हुआ?
यदि इन सवालों के जवाब आज भी अधूरे हैं, तो यह मानना पड़ेगा कि पहाड़ में गणतंत्र अभी अधूरा है।
पहाड़ बचेगा, तभी गणतंत्र बचेगा
हिमालय क्रांति पार्टी और अन्य स्थानीय आवाज़ों ने 2018में जो चेतावनी दी थी, वह आज और प्रासंगिक हो चुकी है। पौड़ी गढ़वाल का भविष्य केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवैधानिक प्रतिबद्धता से तय होगा।
इस गणतंत्र दिवस पर संकल्प लेना होगा कि—
पहाड़ को हाशिये से उठाकर नीति के केंद्र में लाना ही सच्चा गणतंत्र है।
क्योंकि यदि पहाड़ खाली हुआ, तो केवल गांव नहीं उजड़ेंगे—गणतंत्र की आत्मा भी खोखली हो जाएगी।

26 जनवरी 2026 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर पौड़ी मुख्यालय में पार्टी द्वारा वर्ष 2026 के कैलेंडर का विधिवत विमोचन किया गया। इस अवसर पर संगठन के उत्कृष्ट एवं समर्पित कार्यकर्ताओं को सम्मान पत्र व स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने संविधान, लोकतंत्र और उत्तराखंड हित में संगठन की प्रतिबद्धता दोहराई तथा कार्यकर्ताओं के योगदान की सराहना की।

हिमालय क्रांति पार्टी एवं उससे जुड़े कार्यक्रम/आयोजन में प्रमुख रूप से अजय बिष्ट (केंद्रीय अध्यक्ष) के साथ दिनेश बिष्ट, लाल सिंह बिष्ट, रविन्द्र जुयाल, शंकर दत्त, अनिल जोशी, कन्हैया लाल डबरियल, शिवानंद नौटियाल, कुलवंत सिंह नेगी, हंसा दत्तू बेलवाल, लक्ष्मण सिंह रावत, देवेंद्र सिंह, विजेश चन्द्र बिष्ट, राम सिंह रावत, ए. एस. मेहरा, बिरेन्द्र सिंह बंगारी, महेश चन्द्र डौ, दिनेश सिंह रावत, महेश आर्य, महेश उपाध्याय, मनोज जुयाल (फिल्म डायरेक्टर, उत्तराखंड), विपिन कुकरेती, बृजेश शर्मा (दिल्ली), संजय कुमार (दिल्ली), गब्बर सिंह चौहान (पौड़ी), पूजा चमोली, रेखा बालोनी, भारतीय बिष्ट, ग्रुप सिंह भंडारी, संजय सिंह, सत्येंद्र सिंह रावत, अरविंद सिंह रावत, सुरेश चमोली, देवेंद्र गोसाई, पपेंद्र सिंह रावत, मनमोहन, गौरव तथा रमेश सिंह बेलवाल की उल्लेखनीय उपस्थिति/भागीदारी रही।


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