रुद्रपुर का बाजार बनाम बाजार माफिया: असली व्यापार किसके भरोसे?

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रुद्रपुर देवभूमि की औद्योगिक नगरी रुद्रपुर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ दुकानों के शटर खुले हैं लेकिन भीतर सन्नाटा पसरा है। पक्के व्यापारी—जो साल भर जीएसटी भरते हैं, बिजली-पानी के बिल चुकाते हैं, नगर निगम के नियमों का पालन करते हैं—वे रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहे हैं। सवाल सीधा है: क्या नियम मानने वाला ही आज सबसे बड़ा ‘दोषी’ बन गया है?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


टैक्स देने वाला व्यापारी बनाम बिना सत्यापन का अस्थायी बाजार
रुद्रपुर के स्थायी व्यापारी सरकार को नियमित जीएसटी अदा करते हैं। लाखों का बिजली बिल, हजारों का टैक्स और करोड़ों का माल दुकानों में रखा-रखा खराब हो रहा है। दूसरी ओर, सोमवार को लगने वाला बाजार—रुद्रपुर झील (जिसे स्थानीय लोग लंबे समय से ‘रुद्रपुर झील’ के नाम से जानते हैं) के आसपास—और बृहस्पतिवार को बगवाड़ा क्षेत्र में लगने वाली मंडी में बाहरी राज्यों से आए व्यापारी कपड़ा, प्लास्टिक, क्रॉकरी, राशन और सस्ता दोयम दर्जे का सामान बेचते हैं।
ग्राहक टूट पड़ते हैं। कारण स्पष्ट है—कम कीमत।
लेकिन प्रश्न यह है कि इन बाजारों का सत्यापन किसने किया?
न पुलिस का स्पष्ट रिकॉर्ड, न नगर निगम की पारदर्शी अनुमति, न प्रशासन की सार्वजनिक सूची। यह अनौपचारिकता ही असली विवाद की जड़ है।
सड़कें जाम, कॉलोनियां त्रस्त, लेकिन कार्रवाई शून्य
बगवाड़ा और आसपास की कॉलोनियों में बाजार के दिन सड़कें फोर-व्हीलर और टू-व्हीलर से पटी रहती हैं। स्थानीय निवासियों को घर से निकलना मुश्किल हो जाता है। पार्किंग की व्यवस्था नहीं, भीड़ नियंत्रण का प्रबंधन नहीं, और संदिग्ध व्यापारियों की उपस्थिति को लेकर कोई औपचारिक जांच नहीं।
जिला प्रशासन, नगर निगम और पुलिस—तीनों की भूमिका सवालों के घेरे में है।
वेंडिंग ज़ोन बनाम राजनीतिक संरक्षण
गांधी पार्क क्षेत्र में वर्षों से राजमा-चावल बेचने वालों को हटाकर वेंडिंग ज़ोन में शिफ्ट किया गया। तर्क दिया गया—शहर को सुव्यवस्थित बनाना है। लेकिन विडंबना देखिए, उसी गांधी पार्क के दोनों ओर सर्दियों में गर्म वस्त्रों की अस्थायी ठेलियां सज जाती हैं।
क्या नियम केवल चुनिंदा लोगों पर लागू होते हैं?
मार्केट और भूरारानी क्षेत्र में भी अस्थायी बाजारों का विस्तार हो रहा है। पहले जहाँ केवल सब्जी मंडी लगती थी, अब हर तरह का सामान बिकने लगा है। इसका सीधा असर स्थायी दुकानदारों पर पड़ रहा है।
व्यापार मंडल की भूमिका पर भी प्रश्न
व्यापार मंडल समय-समय पर आंदोलन करता है, ज्ञापन देता है, विरोध दर्ज कराता है। लेकिन सूत्रों से यह भी चर्चा है कि कुछ अवैध बाजारों को मौन सहमति या अप्रत्यक्ष समर्थन भी मिलता है।

रुद्रपुर के भूरा रानी क्षेत्र में रेलवे क्रॉसिंग के पास दान में दी गई भूमि पर लग रहा बाजार गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। भीड़भाड़, अव्यवस्थित पार्किंग और ट्रेनों की आवाजाही के बीच कभी भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है। यदि हादसा होता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी—स्थानीय प्रशासन, नगर निगम, बाजार संचालक या रेलवे विभाग की? सुरक्षा मानकों की अनदेखी सीधे जनजीवन से खिलवाड़ है। प्रशासन को तत्काल संयुक्त निरीक्षण कर सुरक्षा घेरा, वैकल्पिक स्थल और स्पष्ट जवाबदेही तय करनी चाहिए, वरना लापरवाही की कीमत मासूम नागरिकों को चुकानी पड़ सकती है।


यदि यह सच है, तो यह दोहरी नीति है—सार्वजनिक रूप से विरोध और अंदरखाने समझौता।
यदि यह असत्य है, तो व्यापार मंडल को पारदर्शिता से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
विश्वास ही संगठन की पूंजी है।
लोकतंत्र में वोट बनाम व्यापार
जब चुनाव आते हैं, रोड शो होते हैं, धार्मिक या जनजागरूकता अभियान निकलते हैं—तो बाजार राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का केंद्र बन जाता है। लेकिन जब वही बाजार स्थायी व्यापारियों की रोजी-रोटी छीनने लगे, तब शासन-प्रशासन मौन क्यों हो जाता है?
स्थानीय व्यापारी चेतावनी दे रहे हैं कि यदि विधानसभा क्षेत्र में अनियंत्रित बाजारों पर रोक नहीं लगी, तो वे जुलूसों और राजनीतिक कार्यक्रमों को बाजार क्षेत्र में अनुमति नहीं देंगे। यह चेतावनी केवल गुस्सा नहीं, बल्कि आर्थिक हताशा का संकेत है।
असली समाधान क्या है?
समस्या का समाधान बाजार बंद कराना नहीं, बल्कि नियमों का समान अनुपालन है।
सभी अस्थायी बाजारों का अनिवार्य सत्यापन हो।
नगर निगम और प्रशासन सार्वजनिक रूप से सूची जारी करें कि किसे अनुमति दी गई है।
जीएसटी और व्यापार पंजीकरण की अनिवार्यता हो।
पार्किंग और ट्रैफिक प्रबंधन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
स्थानीय व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट नीति बने।
प्रशासन को निर्णय लेना ही होगा
रुद्रपुर के स्थायी व्यापारी शहर की आर्थिक रीढ़ हैं। वे ही नगर निगम को राजस्व देते हैं, वे ही रोजगार सृजित करते हैं, वे ही शहर की पहचान बनाए रखते हैं।
यदि उनके साथ न्याय नहीं हुआ, तो यह केवल एक वर्ग की हानि नहीं होगी—यह शहर की आर्थिक संरचना को कमजोर करेगा।
जिला प्रशासन, नगर निगम, व्यापार मंडल और जनप्रतिनिधियों को यह तय करना होगा कि वे संगठित व्यापार के साथ खड़े हैं या अनियंत्रित बाजार तंत्र के साथ।
रुद्रपुर का बाजार किसी माफिया या राजनीतिक प्रयोगशाला का मंच नहीं बन सकता।
यह शहर मेहनतकश व्यापारियों का है—और उनकी आवाज को अनसुना करना अब संभव नहीं।

Uttarakhand राज्य गठन के बाद जिस पारदर्शी, स्वावलंबी और सांस्कृतिक रूप से सुरक्षित विकास मॉडल का सपना देखा गया था, वह आज कई सवालों के घेरे में है। औद्योगिक नगरों से लेकर पहाड़ी कस्बों तक अनियंत्रित अस्थायी बाजारों, भू-माफिया, खनन नेटवर्क, अवैध वसूली और संदिग्ध कारोबारी तंत्र ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को असंतुलित कर दिया है। स्थायी व्यापारी जीएसटी, बिजली-पानी और नगर निकाय कर चुकाते हैं, जबकि कई अस्थायी बाजार बिना स्पष्ट सत्यापन, बिना कर पारदर्शिता और बिना सार्वजनिक अनुमति सूची के संचालित होते दिखते हैं। इससे न केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा असमान होती है, बल्कि स्थानीय निवासियों में उपेक्षा और असुरक्षा की भावना भी बढ़ती है।
यदि निजी जमीन पर भारी किराये लेकर बाजार लगाए जा रहे हैं, तो राजस्व और कर अनुपालन की सार्वजनिक जानकारी अनिवार्य की जानी चाहिए। पुलिस-प्रशासन, नगर निकाय और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय हो—क्योंकि बिना संरक्षण के ऐसा तंत्र फल-फूल नहीं सकता। समाधान बाजार बंद कराना नहीं, बल्कि समान नियम, अनिवार्य पंजीकरण, कर पारदर्शिता, ट्रैफिक प्रबंधन और स्थानीय व्यापार संरक्षण नीति लागू करना है। अन्यथा यह अनौपचारिक माफिया तंत्र धीरे-धीरे देवभूमि की आर्थिक रीढ़ और सांस्कृतिक धरोहर—दोनों को कमजोर कर  क्रमशः……………….


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