रुद्रपुर का ‘रुद्रपुर’ क्यों? इतिहास के साथ विमर्श और चेतावनी

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नगर महापौर विकास शर्मा द्वारा फेसबुक पर यह दावा करना कि रुद्रपुर शहर का नाम सीधे “भगवान रुद्र (शिव)” से जुड़ा है — और नगर निगम द्वारा धार्मिक प्रतीकों (त्रिशूल, डमरू आदि) की स्थापना को उसी पहचान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना — सिर्फ एक सांस्कृतिक नारा नहीं है, बल्कि यह इतिहास और पहचान के पुनर्लेखन की एक चिंताजनक प्रक्रिया है। यह जरूरी है कि हम इस मामले पर गंभीरता से विचार करें, क्योंकि यह न सिर्फ रुद्रपुर के वर्तमान विकास की तस्वीर पेश करता है, बल्कि हमारे सामूहिक स्मृति, शहरी धरोहर और सांस्कृतिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

संपादकीय  —त्रिशूल–डमरू की आड़ में इतिहास: रुद्रपुर की पहचान राजनीति के मोर्चे पर”रुद्रपुर आज विकास, निवेश और आधुनिक शहरी सुविधाओं के मोड़ पर खड़ा है — लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इसी दौर में शहर की ऐतिहासिक पहचान राजनीतिक प्रयोगशाला में बदलती जा रही है। नगर महापौर विकास शर्मा द्वारा फेसबुक पर यह दावा करना कि रुद्रपुर का नाम सीधे भगवान रुद्र (शिव) से सम्बद्ध है, और नगर निगम द्वारा त्रिशूल व डमरू जैसे धार्मिक प्रतीकों की स्थापना को “शहर की असली पहचान” बताना, प्रश्नों के नए द्वार खोलता है। क्या यह इतिहास की पुनर्स्थापना है — या इतिहास का पुनर्लेखन?

तथ्य साफ हैं, लेकिन सुविधा से अनदेखे किए जा रहे हैं। रुद्रपुर का नाम 16वीं शताब्दी के चंद राजवंश के शासक राजा रुद्र चंद के नाम पर पड़ा था — यह इतिहास के ताम्रपत्रों, पुरातात्विक प्रमाणों और स्थानीय स्मृतियों में दर्ज है। राजा रुद्र चंद ने इस क्षेत्र को सामरिक दृष्टि से विकसित किया था, न कि इसे किसी धार्मिक ‘शिवपुरी’ स्वरूप में स्थापित किया। 1960 के दशक में शरणार्थी पुनर्वास के बाद रुद्रपुर ने आधुनिक रूप लिया। इस स्पष्ट इतिहास के बावजूद “रुद्र = शिव” का नया आख्यान प्रस्तुत करना शहर की ऐतिहासिक विरासत को धार्मिक-राजनीतिक एंगल से बदलने का संकेत देता है।

सवाल यह नहीं कि शिव प्रतीक स्थापित हों या न हों — सवाल यह है कि क्या शहर के सार्वजनिक स्थानों को राजनीतिक धार्मिक प्रतीकों का मंच बनाया जा रहा है? जब स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, जल निकासी, रोजगार और सुरक्षा जैसी व्यावहारिक जरूरतें चुनौती बनी हुई हैं, तब विशाल त्रिशूल और डमरू प्राथमिकता क्यों? क्या यह शहर की पहचान को समृद्ध करने का प्रयास है, या जनता के धार्मिक भावनाओं को साधने की जल्दबाज़ी?

यह चिंता इसलिए भी गहरी है क्योंकि राजनीतिक नारे क्षणिक होते हैं, लेकिन इतिहास और विरासत स्थायी होते हैं। यदि रुद्रपुर की पहचान को नए धार्मिक आख्यान में ढाल दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ उस वास्तविक विरासत से कट जाएँगी — जिसमें चंद राजाओं का योगदान, अटरिया मंदिर की उत्पत्ति, भू-राजनीतिक संघर्ष और आधुनिक पुनर्वास की कहानी शामिल है।

समाधान स्पष्ट है: प्रतीक स्थापित किए जाएँ तो साथ में इतिहास भी स्थापित हो। यदि चर्चाओं और स्वार्थों की जगह शोध और सत्य सक्रिय हो — तो रुद्रपुर जितना शिव का शहर हो सकता है, उतना ही रुद्र चंद की विरासत का गर्व भी बन सकता है। शहर की पहचान का भविष्य धार्मिक भावनाओं पर नहीं, सच्चाई, इतिहास और जिम्मेदार शहरी सोच पर टिकना चाहिए।

रुद्रपुर की असली ताक़त भावनात्मक नारे में नहीं, अपनी विरासत से ईमानदार संवाद में है।


1. इतिहास की जड़ें: “रुद्रपुर” नामकरण का सच

पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि रुद्रपुर नामकरण का इतिहास जितना सरल नहीं है, उतना कि उसे राजनीतिक रिलीफ में पेश किया जा रहा है। ऐतिहासिक स्रोतों और लोककथाओं के अनुसार:

  • रुद्रपुर की स्थापना 16वीं शताब्दी में चंद राजवंश के राजा रुद्र चंद ने की थी।
  • कुछ लोककथाएँ कहती हैं कि राजा रुद्र चंद की रथ की एक पहिया दलदली इलाके में फंस गई, और उन्होंने वहाँ मंदिर एवं कुआँ बनवाया — वही वर्तमान में अटरिया मंदिर माना जाता है।
  • इतिहासकारों की मान्यता है कि रुद्र चंद ने ताराई क्षेत्र में एक सैन्य चौकी (कैंप) बनाकर उसे सामरिक दृष्टि से मजबूती दी थी, न कि धार्मिक दृष्टि से “शिवपुरी” या “रुद्रपुरी” जैसा स्थान माना।
  • बाद में, छठी-सातवीं शताब्दी की बातों के बजाय, यह शहर ब्रिटिश साम्राज्य के समय, और विशेष रूप से आज़ादी के बाद, एक बदलते भू-राजनीतिक संदर्भ में विकसित हुआ।
  • आधुनिक रुद्रपुर का पुनरुत्थान 1960 में हुआ, जब विभाजन के बाद शरणार्थियों को यहाँ बसाया गया था।
  • पुरातात्विक अनुसंधानों में रुद्र चंद के शासनकाल के ताम्रपत्र (copper plates) भी मिले हैं, जो इस नामकरण की ऐतिहासिकता को पुष्ट करते हैं।

2. महापौर का प्रस्ताव: धर्म-प्रतीकों का शहरी विमर्श

महापौर विकास शर्मा ने अपनी फेसबुक पोस्ट में घोषणा की है कि निगम इंदिरा चौक पर विशाल त्रिशूल लगाएगा, और डीडी चौक पर महादेव का डमरू। इस कदम को वे “नगर्मय धार्मिक पहचान” को मजबूत करने के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

यहां कुछ सवाल उठते हैं:

  • क्या शहर की विकास प्राथमिकता सिर्फ धार्मिक प्रतीकों की स्थापना तक सीमित होनी चाहिए, जब इसके सामने अनेक श्रेयस्कर विकास कार्य (स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी सुविधाएं) हैं?
  • क्या “रुद्र” शब्द का उपयोग सिर्फ धार्मिक जनमत हासिल करने का एक तरीका तो नहीं बन रहा है, जबकि ऐतिहासिक तथ्य राजा रुद्र चंद की विरासत की ओर इशारा करते हैं?
  • क्या इस पुनर्लेखन (reinterpretation) के माध्यम से नगर निगम द्वारा शहर की पैतृक पहचान को धार्मिक-राजनीतिक एजेंडा के अनुरूप मोड़ा जा रहा है?

3. पहचान और विरासत: एक सांस्कृतिक चुनौती

यह केवल एक नाम परिवर्तन या प्रतीक स्थापित करने की बात नहीं है — यह शहर की पहचान, उसकी ऐतिहासिक जड़ों और विरासत के संरक्षण की लड़ाई है।

  • रुद्रपुर की कहानी सिर्फ “रुद्र = शिव” नहीं है, बल्कि यह 16वीं-17वीं सदी के चंद राजाओं की राजनीतिक और सामरिक सोच की परतों में बसी है।
  • यदि हम केवल धार्मिक प्रतीकों के सहारे “धार्मिक पहचान” का प्रचार करेंगे, तो हम इतिहास की गहराइयों को खो सकते हैं — खासकर उस जटिल विरासत को, जो राजशाही, संघर्ष, साम्राज्य और स्थानीय शासन से जुड़ी है।
  • इसके अलावा, इस तरह के प्रतीकों को सार्वजनिक चौराहों पर लगाने का मतलब है कि शहर का सार्वजनिक स्थान धार्मिक रूपक में बदल जाता है — और यह विचार करना होगा कि क्या यह धर्मनिरपेक्ष लोकशहर की भावना के अनुरूप है या नहीं।

4. प्रस्तावना: स्मृति पुनर्स्थापना की जिम्मेदारी

मैं प्रमुख तीन कदमों का सुझाव देना चाहूँगा, जिनके माध्यम से रुद्रपुर की असली विरासत सुरक्षित रखी जा सकती है:

  1. इतिहास-समिति आयोग: नगर निगम या राज्य सरकार की पहल से एक स्थानीय इतिहास-समिति की स्थापना हो, जिसमें इतिहासकार, पुरातत्वविद और नागरिक प्रतिनिधि शामिल हों। यह आयोग रुद्रपुर की जड़ों पर शोध करे, शहरी स्मृति को दस्तावेजित करे और उसे जनता के साथ साझा करे।
  2. शहरी सांस्कृतिक योजना: विकास योजनाओं में धार्मिक प्रतीकों की स्थापना के साथ-साथ उस सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को शामिल किया जाए, जिसे प्रतीकों से अलग दिखाया जाए — जैसे कि स्मारक, स्टैच्यू, सार्वजनिक संग्रहालय या सूचना पैनल। शहर के प्रमुख चौराहों में स्थायी ऐतिहासिक पैनल लगाए जाएँ, जो राजा रुद्र चंद की कहानी, अटरिया मंदिर की उत्पत्ति, चंद-रुहेल संघर्ष आदि को दर्शाएँ।
  3. जन भागीदारी और शिक्षा: नागरिकों को, विशेष रूप से युवाओं को, यह समझाने की जरूरत है कि शहर का नामकरण सिर्फ धार्मिक कारणों से नहीं हुआ था। स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्थानीय इतिहास की शिक्षा को बढ़ाया जाए। थिएटर, लोककथाओं और कला-कार्यशालाओं के ज़रिए यह संदेश दिया जाए कि रुद्रपुर का इतिहास सिर्फ पौराणिक नहीं, बल्कि सघन, पीढ़ियों से जुड़ा हुआ और बहुआयामी है।

5. मांग: मूर्ति या स्मारक? – “राजा-रूद्र सिंह” की भूमिका

रुद्रपुर इतिहासकारों ने सुझाव दिया है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उत्तराखंड सरकार को राजा-रूद्र सिंह की मूर्ति लगाने की पहल करनी चाहिए। यह विचार, यदि सही संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो न केवल एक प्रतीकात्मक कदम हो सकता है, बल्कि यह स्थानीय पहचान, ऐतिहासिक न्याय और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का एक महत्वपूर्ण संकेत भी हो सकता है:

  • राजा-रूद्र सिंह की मूर्ति सिर्फ एक प्रतिमा नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह रुद्रपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा का एक सार्वजनिक स्मारक हो सकता है।
  • इस मूर्ति के साथ एक प्रकाशित पैनल बनाया जाना चाहिए, जिसमें रुद्र चंद की भूमिका, उनका काल, उनकी उपलब्धियाँ और शहर की स्थापना की कहानी हो।
  • मूर्ति की उद्घाटन कार्यक्रम में स्थानीय इतिहासकार, नागरिक प्रतिनिधि, युवा विज्ञान/इतिहास छात्र और शहरी योजनाकारों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि यह सिर्फ एक राजनीतिक आयोजन न बने, बल्कि एक शैक्षिक और सामुदायिक घटना हो।

6चेतावनी,महापौर शर्मा द्वारा प्रस्तावित त्रिशूल और डमरू प्रतीक केवल “धार्मिक झंडे” नहीं हैं — वे एक बड़े विमर्श की शुरुआत हैं। इतिहास को मोड़ना, पुनर्लेखन करना और प्रतीकों के ज़रिए पहचान को नए सिरे से गढ़ना एक नाजुक दिशा है। यदि यह कदम सिर्फ पब्लिसिटी या धार्मिक पॉपुलिज्म का हिस्सा बन जाता है, तो हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों की जटिलता और समृद्धि को खो सकते हैं।

रुद्रपुर के नागरिकों, इतिहासकारों, शहरी नियोजकों और उत्तराखंड सरकार की जिम्मेदारी है कि वे इस अवसर का उपयोग सिर्फ महान धार्मिक प्रतीकों के निर्माण के लिए न करें, बल्कि असली विरासत, असली कहानी और असली पहचान को संरक्षित, सम्मानित और साझा करें।

अगर वास्तव में रुद्रपुर की धरोहर को बचाना है और उसका भविष्य एक सशक्त, तथ्य-आधारित और सांस्कृतिक चेतना पर आधारित पहचान चाहती है — तो हमें “रुद्रपुर = रुद्र” के पुरालेखीय सूत्र से आगे बढ़कर उस रुद्र चंद की कहानी को याद रखना होगा, जिसने न सिर्फ भूमि जीती, बल्कि शहर की नींव रखी थी।


✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


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