सहकारी बैंकों का ‘स्वरोजगार मॉडल’ बना घोटाले का ई-रिक्शाई-रिक्शा के नाम पर लोन, कमाई सिस्टम की—डूबा जनता का पैसा

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देहरादून।उत्तराखंड में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के नाम पर चलाई गई ई-रिक्शा योजना अब एक सुनियोजित वित्तीय लापरवाही और संभावित मिलीभगत का मॉडल बनकर सामने आ रही है। सहकारी बैंकों द्वारा बांटा गया करीब 20 करोड़ रुपये का ई-रिक्शा लोन डूब चुका है, लेकिन न तो लोन लेने वालों को चिंता है और न ही बैंक अफसरों को।
सबसे चौंकाने वाला मामला देहरादून की तिलक रोड शाखा का है, जहां अकेले पांच करोड़ रुपये का लोन एनपीए घोषित हो चुका है। सवाल यह नहीं कि पैसा डूबा कैसे, सवाल यह है कि डुबाया किसने और किसके इशारे पर?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)


उत्तराखंड में स्वरोजगार के नाम पर बांटे गए ई-रिक्शा यूपी, बिहार, झारखंड और हरियाणा भेज दिए गए, वहीं का लोन यहीं से दे दिया गया। क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या सुनियोजित मिलीभगत? सरकार बताए—जनता का पैसा किसके संरक्षण में डुबोया गया?


बिना ज़मानत, बिना आय प्रमाण—और बिना ज़मीर के लोन वितरण
सरकारी योजना के तहत ई-रिक्शा खरीदने के लिए सवा लाख से डेढ़ लाख रुपये तक का लोन दिया गया।
कोई सिक्योरिटी नहीं, कोई इनकम प्रूफ नहीं—और नतीजा: पैसा गया, योजना गई, भरोसा गया।
स्थायी निवास की शर्त हवा में, बाहरी राज्यों की मौज
नियम साफ थे—स्थायी निवास प्रमाण पत्र अनिवार्य।
लेकिन हकीकत यह है कि अफसरों ने नियमों को जेब में डालकर यूपी, बिहार, झारखंड और हरियाणा के लोगों को सिर्फ आधार और वोटर कार्ड के आधार पर लोन बांट दिए।
यानी—
उत्तराखंड की योजना, पैसा उत्तराखंड का, फायदा बाहरी लोगों का।
यह खुलासा खुद राज्य सहकारी बैंक के निवर्तमान निदेशक मनोज पटवाल ने किया। उनकी शिकायत पर सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने जांच के आदेश दिए। जांच में गड़बड़ियों की पुष्टि भी हो गई—लेकिन सवाल यह है कि अब तक कितनों पर कार्रवाई हुई?
वसूली में भी ‘सिस्टम फेल’, या जानबूझकर ढील?
जांच में सामने आया कि:
लोन बांटने में नियम तोड़े गए
वसूली में जानबूझकर लापरवाही बरती गई
सबसे ज्यादा गड़बड़ी तिलक रोड ब्रांच में
अब ब्रांच अफसरों से जवाब तलब किए गए हैं, लेकिन जनता पूछ रही है—
क्या सिर्फ जवाब से पांच करोड़ लौट आएंगे?
एमडी नीरज बेलवाल का कहना है कि एनपीए खत्म करने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब पैसा बांटा जा रहा था, तब निर्देश कहां थे?
सवाल जो सिस्टम को चुभता है
क्या यह अक्षम्य लापरवाही है या सुविधाजनक चुप्पी?
क्या बिना स्थायी निवास के लोन देना नियमों की हत्या नहीं?
क्या बाहरी लोगों को फायदा पहुंचाना नीति थी या साजिश?
और सबसे बड़ा सवाल—इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
  ज़रूरी बिंदु इन बिंदुओं को जरूर उठाया जाए:
ई-रिक्शा योजना का उद्देश्य बनाम हकीकत
तिलक रोड ब्रांच के आंकड़े और एनपीए
स्थायी निवास नियम कैसे तोड़े गए
यूपी-बिहार के लोगों को लोन देने का खुलासा
जिम्मेदार अफसरों के नाम और पद
आम जनता का सवाल—“हमारा पैसा कौन लौटाएगा?”
ग्राउंड विजुअल:
सहकारी बैंक की शाखा
ई-रिक्शा (यदि मौजूद हों तो)
दस्तावेजों की कॉपी/RTI
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
यह सिर्फ लोन डूबने की खबर नहीं है,
यह सिस्टम के ई-रिक्शा पर बैठकर सरकारी पैसे की खुली सवारी की कहानी है—
जहां ब्रेक भी अफसरों के पास थे और एक्सीलेरेटर भी।
अब देखना यह है कि
जांच सिर्फ कागजों में दौड़ेगी या सच में जिम्मेदारों तक पहुंचेगी।


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