अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर शैल सांस्कृतिक समिति का अल्टीमेटमसीबीआई जांच में देरी हुई तो सड़क से सदन तक आंदोलन—गोपाल सिंह पटवाल

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रुद्रपुर। अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर उत्तराखंड की सियासत और समाज में उबाल है। ताजा आरोपों, वायरल ऑडियो और लगातार उठ रहे “वीआईपी एंगल” के सवालों के बीच अब रुद्रपुर की शैल सांस्कृतिक समिति भी खुलकर मैदान में आ गई है। समिति के अध्यक्ष गोपाल सिंह पटवाल ने सरकार को दो टूक चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि जल्द से जल्द इस मामले की सीबीआई जांच नहीं कराई गई, तो समिति सड़क से लेकर सदन तक आंदोलन करने को बाध्य होगी।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


गोपाल सिंह पटवाल ने कहा कि अंकिता भंडारी हत्याकांड अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रहा, बल्कि यह उत्तराखंड की आत्मा, महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की साख से जुड़ गया है। “आज पूरा उत्तराखंड सीबीआई जांच की मांग कर रहा है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, हर चेहरे पर नकाब उतर चुका है। जनता लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज करा रही है, लेकिन सरकार लगातार धैर्य की परीक्षा ले रही है,” उन्होंने कहा।
पटवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सरकार ने समय रहते निष्पक्ष जांच का रास्ता नहीं चुना, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने चेताया कि जनाक्रोश को हल्के में लेना सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।
“यह कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं है। यह एक बेटी को न्याय दिलाने की लड़ाई है। अगर दोषियों में कोई प्रभावशाली या तथाकथित वीआईपी शामिल है, तो उसका नाम सामने आना ही चाहिए,” उन्होंने कहा।
शैल सांस्कृतिक समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस पूरे संघर्ष में अंकिता भंडारी के परिवार के साथ मजबूती से खड़ी है और जब तक पीड़ित परिवार को पूर्ण न्याय नहीं मिल जाता, तब तक समिति चुप नहीं बैठेगी। पटवाल ने कहा कि सीबीआई जांच केवल एक मांग नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जनता की नैतिक अपेक्षा है।
समिति के अनुसार, अगर सीबीआई जांच में और देरी की गई, तो रूद्रपुर में आंदोलन को  विराट स्वरूप दिया जाएगा। इसमें सांस्कृतिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक सभी माध्यमों से विरोध दर्ज कराया जाएगा।
अध्यक्ष गोपाल सिंह पटवाल ने सरकार से अपील की कि वह जनता के धैर्य की परीक्षा न ले और तत्काल सीबीआई जांच की घोषणा कर अंकिता भंडारी को सच्चा न्याय दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
स्पष्ट है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड अब केवल फाइलों का मामला नहीं रहा। यह उत्तराखंड के जनमानस, सामाजिक संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं की सामूहिक चेतना का सवाल बन चुका है—और इस चेतना को अनदेखा करना सरकार के लिए आसान नहीं


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