कारगिल विजय दिवस पर विशेष संपादकीय लेख 📝 शीर्षक: “कारगिल के शूरवीरों को नमन: देशभक्ति का अमिट अध्याय और युवाओं के लिए प्रेरणा”

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26 जुलाई 2025, रुद्रपुर – जब देश की सीमाएं खतरे में थीं, तब हिमालय की ऊँचाइयों पर लहू की गर्मी से बर्फ पिघली थी। और वहीं से उभरा था भारतीय सेना का एक स्वर्णिम अध्याय — कारगिल विजय। आज, जब हम 26वां कारगिल विजय दिवस मना रहे हैं, यह महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश के प्रति अटूट निष्ठा और बलिदान की गाथा का पुनः स्मरण है। रुद्रपुर की पुलिस लाइन में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम उसी गौरव और कृतज्ञता का प्रत्यक्ष प्रमाण रहा।

शहीदों को नमन, जीवित वीरों का सम्मान

रुद्रपुर में शहीद स्मारक स्थल पर आयोजित इस कार्यक्रम में जनपद के शीर्ष अधिकारी—जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया, एसएसपी मणिकांत मिश्रा, मेयर विकास शर्मा, सीडीओ दिवेश शाशनी, एसपी क्राइम निहारिका तोमर, एडीएम पंकज उपाध्याय, एसडीएम मनीष बिष्ट, और अन्य प्रशासनिक व सैन्य अधिकारी उपस्थित रहे। कारगिल में शहीद हुए जनपद के हवलदार पदम राम और राइफलमैन अमित नेगी को पुष्पांजलि अर्पित की गई और युद्ध में घायल हुए मान सिंह मेहता को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।

यह केवल सम्मान नहीं था — यह एक संदेश था कि जो मातृभूमि के लिए लड़े, वे केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा हैं।


शौर्य का इतिहास: कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि?कर्नल सीपी कोठारी द्वारा प्रस्तुत विस्तृत विवरण ने युवाओं को एक बार फिर स्मरण कराया कि 1999 का कारगिल युद्ध, पाकिस्तान की कायरतापूर्ण घुसपैठ का उत्तर था। भारतीय सेना ने 30,000 से अधिक सैनिकों के साथ भाग लिया, 527 वीर शहीद हुए जिनमें 75 उत्तराखंड से थे और 2 रुद्रपुर से। देश के 1363 सैनिक घायल हुए, किंतु दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया गया।

यह जीत केवल भूगोल की नहीं थी, यह उस आत्मबल की जीत थी जो हिमालय से ऊँचा और समुद्र से गहरा था।


युवा पीढ़ी के लिए राष्ट्रभक्ति का पाठ

कार्यक्रम में आयोजित चित्रकला, निबंध व भाषण प्रतियोगिताएं और क्रॉस कंट्री दौड़ न केवल उत्साहवर्धन के आयोजन थे, बल्कि आने वाली पीढ़ी को शहीदों के जीवन से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी रहे।

  • निबंध में सोनिया ध्यानी, भाषण में महिता, चित्रकला में वंशिका वर्मा, और रेस में अजरा बी पाशा व सोलित कुमार जैसे युवा प्रतिभागियों ने न केवल अपनी कला का प्रदर्शन किया, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपनी भावनाओं को भी प्रकट किया।

यही वह बीज हैं जिन्हें आज बोने की आवश्यकता है — ताकि कल भारत का प्रत्येक नागरिक देश के लिए एक सिपाही बने, चाहे कलम से हो या कर्म से।


भारतीय सेना: देश का स्वाभिमान?भारतीय सेना सिर्फ एक सैन्यबल नहीं है, वह राष्ट्र की आत्मा का रक्षक है। कारगिल में सैनिकों ने जिस साहस और समर्पण का प्रदर्शन किया, वह बताता है कि सेना केवल युद्ध नहीं लड़ती, वह इतिहास रचती है।

जब कारगिल की चोटियों पर कैप्टन विक्रम बत्रा की आवाज गूंजी — “ये दिल मांगे मोर!” — तब यह केवल विजय की घोषणा नहीं थी, वह भारत के हर नागरिक से यह अपेक्षा थी कि देशप्रेम की यह ज्वाला कभी बुझने न पाए।


संपादकीय दृष्टिकोण: राष्ट्रभक्ति सिर्फ तारीख नहीं, एक जीवन दृष्टि है?रुद्रपुर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसे आयोजन केवल औपचारिकता नहीं, एक चेतना का विस्तार हैं। जिलाधिकारी द्वारा शहीदों व सैनिकों की समस्याओं को प्राथमिकता देने का आश्वासन, केवल एक प्रशासनिक बयान नहीं बल्कि राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव था।

इस दिन यह आवश्यक है कि हम कारगिल को केवल किताबों या भाषणों तक सीमित न रखें। हर माता-पिता, हर शिक्षक, हर संस्था और हर नेता की जिम्मेदारी है कि कारगिल का बलिदान केवल स्मृति नहीं, संस्कार

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी”भारत की मिट्टी वीरों की भूमि है, और कारगिल दिवस इसका गौरवशाली उदाहरण। आइए, आज के दिन हम संकल्प लें—

  • कि हम भारत को केवल ‘इंडिया’ नहीं, एक राष्ट्र-आत्मा के रूप में देखें,
  • कि हर नागरिक राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने हिस्से की ईंट रखे,
  • और कि भारतीय सेना के त्याग को केवल सलामी नहीं, संस्कार बनाएँ।

जय हिंद। वंदे मातरम्।

यहाँ कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई 2025) के अवसर पर निम्नलिखित पूर्व सैनिकों और वीरजवानों के श्रद्धापूर्ण और प्रेरणादायक बयान प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिन्हें समाचार लेख, स्मारिका, पोस्टर या प्रेस विज्ञप्ति में उपयोग किया जा सकता है:


सूबेदार मेजर मोहन सिंह भंडारी सेनि), गढ़वाल राइफल्स स्थान: जवाहर नगर उधम सिंह नगर,उत्तराखंड

बयान:कारगिल केवल एक युद्ध नहीं था, वह हमारी पीढ़ी की परीक्षा थी — और हमने वह परीक्षा लहू से पास की। आज जब देश 26वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है, हम यह संकल्प लें कि भारत की सीमाएं जितनी मजबूत हैं, उतनी ही हमारी राष्ट्रभक्ति भी हो। शहीदों के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके सपनों का भारत बनाएं — एक अखंड, सशक्त, आत्मनिर्भर राष्ट्र।”


सूबेदार मेजर राजेन्द्र सिंह भंडारी (सेनि), गढ़वाल रेजीमेंट बिंदु खट्टा लाल कुआं जवाहर नगर

उत्तराखंड

बयान:

“कारगिल युद्ध में हमने दुश्मन को पहाड़ों से खदेड़ा, लेकिन असली युद्ध आज भी जारी है — भ्रष्टाचार, विभाजन और बेरोजगारी के खिलाफ। जो साथी कारगिल में नहीं लौट सके, वे हमसे यही अपेक्षा रखते हैं कि हम देश के भीतर भी उतने ही निष्ठावान सिपाही बनें। कारगिल शौर्य की प्रतीक है, पर उससे भी बड़ा प्रतीक है — एकजुट भारत की भावना।”


सूबेदार मेजर हीरा सिंह बिष्ट (सेनि), 5 गढ़वाल राइफल्स

बिंदु खाता नैनीताल, उत्तराखंड

बयान:“आज का युवा मोबाइल की स्क्रीन पर राष्ट्रवाद खोज रहा है, पर असली राष्ट्रवाद कारगिल की चोटियों में लिखा गया है। हमें शहीदों की कुर्बानी को केवल एक दिन नहीं, हर दिन की प्रेरणा बनाना होगा। यह विजय दिवस हमें हर उस जवान की याद दिलाता है जिसने कहा — ‘पहले देश, फिर हम’।”

हवलदार द्वारिका प्रसाद ढोडियाल (सेनि), पौड़ी गढ़वाल

कोलांडा पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

बयान:

“मैंने अपने जवान साथियों को अपने सामने वीरगति को प्राप्त होते देखा है। उनका अंतिम शब्द था — ‘जय हिंद’। यह शब्द मेरे जीवन का मंत्र बन गया है। आज हम चैन की नींद सोते हैं, क्योंकि किसी ने अपना खून बहाया था। युवाओं को बताना होगा कि आजादी और शांति मुफ्त नहीं मिलती — वह सैनिकों के बलिदान से सजी है।”


पुष्कर सिंह गढ़िया (सेनि), कारगिल युद्ध प्रतिभागी

: जवाहर नगर, रुद्रपुर, उत्तराखंड

बयान:

“मुझे आज भी याद है जब हमने ‘टाइगर हिल’ को फतह किया था। हमारे जख्म भर गए, पर उन क्षणों की गर्वध्वनि आज भी दिल में गूंजती है। मैं आज की पीढ़ी से कहना चाहता हूँ — अपने देश को जानो, पहचानो और उसकी रक्षा के लिए हर मोर्चे पर खड़े रहो, चाहे वह सीमांत हो या समाज का आंतरिक मोर्चा।”


इन सभी वक्तव्यों में न केवल अनुभव की सच्चाई है, बल्कि उस आत्मबल की झलक भी है, जिसने कारगिल की बर्फीली ऊँचाइयों पर भारत का तिरंगा फहराया था।



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