

जुमलों से नहीं, जमीन से जुड़े फैसले चाहिए
अजय भट्ट का बयान एक चेतावनी

उत्तराखंड की धरती, जिसे कभी देवभूमि कहा जाता था, आज एक नए और दर्दनाक नाम से जानी जा रही है—“घोस्ट विलेज” यानी भूतिया गांव। यह नाम किसी फिल्मी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिसे खुद सत्ताधारी दल के सांसद अजय भट्ट ने संसद के पटल पर रखा। जब सत्ता के भीतर बैठा प्रतिनिधि ही इस विफलता को स्वीकार कर रहा हो, तो सवाल उठना लाज़मी है—आखिर जिम्मेदार कौन है?
लोकसभा के शून्यकाल में जब अजय भट्ट ने यह स्वीकार किया कि उत्तराखंड में 1700 से अधिक गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, तो यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं था, बल्कि यह उस विकास मॉडल की पोल खोलता बयान था, जिस पर वर्षों से भारतीय जनता पार्टी अपनी पीठ थपथपा रही है।
विकास के दावों के बीच उजड़ता उत्तराखंड
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “वाइब्रेंट विलेज” योजना की बात करते हैं, सीमावर्ती गांवों को सशक्त बनाने का दावा किया जाता है, दूसरी ओर मध्य हिमालय के गांव वीरान होते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या विकास केवल सीमाओं तक सीमित है? क्या पहाड़ के भीतर बसे गांव इस देश का हिस्सा नहीं हैं?
अगर 2011 की जनगणना के अनुसार 1048 गांव गैर-आबाद थे और 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1700 पार कर गई, तो यह केवल पलायन नहीं, बल्कि नीति निर्माण की असफलता का जीवंत प्रमाण है। यह बताता है कि योजनाएं कागजों पर तो बनीं, लेकिन जमीन पर उनका असर शून्य रहा।
“लखपति दीदी” बनाम खाली होते घर
बीजेपी सरकार उत्तराखंड की महिलाओं को “लखपति दीदी” बनाने के सपने दिखा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि जिन गांवों में महिलाएं रहती थीं, वे गांव ही खाली हो गए। जिन आंगनों में लोकगीत गूंजते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा है।
यह कैसी विडंबना है कि सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का दावा कर रही है, जबकि उनके परिवार ही रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। क्या “लखपति दीदी” केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह गया है? क्या इसका उद्देश्य महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं, बल्कि उन्हें राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाना है?
हिंदू-मुस्लिम की राजनीति और असली मुद्दों से दूरी
सबसे बड़ा कटाक्ष यही है कि जब राज्य के गांव उजड़ रहे हैं, तब राजनीति का केंद्र “हिंदू-मुस्लिम” बना हुआ है। चुनाव आते ही धार्मिक मुद्दे हवा में उछाले जाते हैं, लेकिन गांवों में पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
अजय भट्ट का यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से इस बात की पुष्टि करता है कि सरकार की प्राथमिकताएं कहीं और हैं। अगर सच में पलायन रोकना प्राथमिकता होती, तो आज 1700 गांव भूतिया न बनते।
जंगलों में बदलते गांव और बढ़ता खतरा
जो गांव कभी संस्कृति के केंद्र थे, आज वे जंगली जानवरों का ठिकाना बन चुके हैं। बाघ, तेंदुआ, भालू, सुअर—इनका आतंक बढ़ता जा रहा है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी है।
खाली होते गांव सीमाओं की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकते हैं। जहां पहले मानव बसावट थी, वहां अब वीरानी है। यह स्थिति किसी भी राज्य के लिए चिंताजनक है, खासकर उस उत्तराखंड के लिए, जिसकी सीमाएं चीन और नेपाल से लगती हैं।
सवाल सरकार से, जवाब कौन देगा?
जब खुद सत्ताधारी सांसद संसद में खड़े होकर नई योजना की मांग कर रहे हैं, तो यह सवाल उठता है कि पिछले वर्षों में क्या किया गया?
क्या सरकार को पहले से इस समस्या का अंदाजा नहीं था?
क्या कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई?
क्या केवल चुनावी घोषणाएं ही विकास का पैमाना बन गई हैं?
अगर हर समस्या के लिए “नई योजना” की जरूरत पड़ रही है, तो पुरानी योजनाओं का क्या हुआ?
“डबल इंजन” की हकीकत
बीजेपी अक्सर “डबल इंजन सरकार” का नारा देती है—केंद्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार। दावा किया जाता है कि इससे विकास तेजी से होता है। लेकिन उत्तराखंड के भूतिया गांव इस दावे की सच्चाई उजागर करते हैं।
अगर डबल इंजन इतना प्रभावी है, तो फिर पलायन क्यों नहीं रुका? क्यों गांव खाली होते चले गए? क्यों युवाओं को रोजगार के लिए अपने घर छोड़ने पड़े?
उत्तराखंड की आत्मा पर संकट
उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान है। यहां के गांवों में परंपराएं, लोकगीत, त्योहार और सामूहिक जीवन की एक अनूठी झलक मिलती थी।
आज जब ये गांव खाली हो रहे हैं, तो केवल घर नहीं उजड़ रहे, बल्कि पूरी संस्कृति खत्म हो रही है। “झोड़ा”, “चांचरी” जैसे लोकनृत्य अब केवल किताबों और मंचों तक सीमित होते जा रहे हैं।
समाधान क्या है?
समस्या का समाधान केवल नई योजना बनाना नहीं है, बल्कि एक व्यापक और ईमानदार नीति की जरूरत है:
स्थानीय रोजगार के अवसर – गांवों में ही उद्योग, कृषि आधारित रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए।
स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा – गांवों में बेसिक सुविधाएं मजबूत हों ताकि लोग वहां रहने के लिए प्रेरित हों।
इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास – सड़क, इंटरनेट, बिजली जैसी सुविधाएं हर गांव तक पहुंचे।
रिवर्स माइग्रेशन नीति – जो लोग शहरों में जा चुके हैं, उन्हें वापस गांव लाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाए।
लेकिन सबसे जरूरी है—राजनीतिक इच्छाशक्ति।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां आम जनता नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता ही “सबसे बड़े पलायनकर्ता” साबित हुए हैं। विधायक, मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री विकास के नाम पर योजनाएं बनाते रहे, लेकिन उनका लाभ पहाड़ तक नहीं पहुंचा। नतीजा यह हुआ कि गांव खाली होते गए और नेता खुद देहरादून, दिल्ली या बड़े शहरों में बसते चले गए।
भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी ने विकास को कागजों तक सीमित कर दिया। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दे नजरअंदाज होते रहे। जो बजट गांवों के लिए था, वह ठेकेदारों और सत्ता के गठजोड़ में गुम हो गया।
आज हालत यह है कि उत्तराखंड के गांव भूतिया बन चुके हैं, और जिन पर इन्हें बसाने की जिम्मेदारी थी, वही सत्ता के सुख में डूबे हैं। यह केवल विफलता नहीं, बल्कि जनभावनाओं के साथ विश्वासघात है।
जुमलों से नहीं, जमीन से जुड़े फैसले चाहिए
अजय भट्ट का बयान एक चेतावनी है—सिर्फ विपक्ष के लिए नहीं, बल्कि खुद बीजेपी के लिए भी। यह बताता है कि जमीनी हकीकत कितनी भयावह हो चुकी है।
अब समय आ गया है कि सरकार “हिंदू-मुस्लिम” की राजनीति से ऊपर उठकर असली मुद्दों पर ध्यान दे। क्योंकि अगर गांव ही नहीं बचेंगे, तो न संस्कृति बचेगी, न पहचान, और न ही वह उत्तराखंड, जिस पर हम गर्व करते हैं।




