भाषा सशक्त, तेवर स्पष्ट और 2027 के संकेत के साथ:उत्तराखंड की राजनीति में फिर लौट रहा है ‘क्रांति का स्वर’उत्तराखंड क्रांति दल की सक्रियता से राष्ट्रीय दलों में हलचल, 2027 को लेकर बन रहा सकारात्मक माहौल

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भाषा सशक्त, तेवर स्पष्ट और 2027 के संकेत के साथ:
उत्तराखंड की राजनीति में फिर लौट रहा है ‘क्रांति का स्वर’
उत्तराखंड क्रांति दल की सक्रियता से राष्ट्रीय दलों में हलचल, 2027 को लेकर बन रहा सकारात्मक माहौल
देहरादून/गढ़वाल/कुमाऊं।उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) की धमक सुनाई देने लगी है। लंबे समय तक हाशिये पर रखे गए इस क्षेत्रीय दल ने जिस तरह राज्य के ज्वलंत मुद्दों को मुखरता से उठाया है, उससे राष्ट्रीय दलों में खलबली मचना स्वाभाविक है। अंकिता भंडारी हत्याकांड, प्रेमचंद अग्रवाल प्रकरण, राज्य आंदोलनकारियों की लंबित मांगें, आपदाओं में सरकारी उदासीनता, स्थाई राजधानी का सवाल, 1950 का भूमि कानून लागू न होना, जंगलों का अंधाधुंध दोहन, और पर्वतीय क्षेत्रों में वन्यजीवों का बढ़ता आतंक—इन तमाम मुद्दों पर उक्रांद ने सड़क से सदन तक संघर्ष की भूमिका निभाई है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


पहाड़ जल रहे हैं, सरकार मौन है
आज पहाड़ों में हालात यह हैं कि बाघ, तेंदुआ और भालू ग्रामीणों के लिए मौत का कारण बनते जा रहे हैं। खेती उजड़ रही है, गांव खाली हो रहे हैं, लेकिन सरकार संवेदनशील नीति बनाने में विफल नजर आती है। दूसरी ओर, विकास के नाम पर कंक्रीट संस्कृति थोपकर उत्तराखंड की लोक परंपराओं, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक विरासत को कमजोर किया जा रहा है। पारंपरिक मेलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप और उनका राजनीतिकरण भी जनता के आक्रोश का कारण बन रहा है।
बाहरी दबदबा और स्थानीयों का उत्पीड़न
भूमि, रोजगार और संसाधनों पर बाहरी भू-माफियाओं का कब्जा बढ़ता जा रहा है। अपने हक की बात करने वाले स्थानीय युवाओं पर पुलिस केस दर्ज होना आम हो गया है। ऐसे समय में उक्रांद स्थानीय अस्मिता की आवाज बनकर उभरा है।
गढ़वाल में उक्रांद पूरे फॉर्म में, कुमाऊं में भी हलचल
हालांकि उत्तराखंड क्रांति दल का जन्म कुमाऊं से हुआ, लेकिन मौजूदा समय में गढ़वाल क्षेत्र में इसकी सक्रियता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। गढ़वाल के गांव-गांव में युवा शक्ति संगठित हो रही है। कुमाऊं में भी हलचल बढ़ी है, हालांकि वहां अभी गढ़वाल जैसी तीव्रता नहीं दिख रही—लेकिन राजनीतिक संकेत साफ हैं।
इतिहास से मिटाया गया उक्रांद का योगदान
यह एक कटु सत्य है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, और राज्य की जननी कही जाने वाली उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका को योजनाबद्ध तरीके से हाशिये पर डाल दिया गया। पाठ्यक्रमों से लेकर सरकारी दस्तावेजों तक, उक्रांद का नाम लगभग गायब कर दिया गया—जबकि राज्य निर्माण की वैचारिक नींव इसी दल ने रखी थी।
“अगर उक्रांद नहीं रहा, तो तुम्हारी आवाज कौन बनेगा?”
आज जब राज्य की सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतनाएं संकट में हैं, तब सवाल वही है जो कालिया फिल्म के डायलॉग की तरह गूंजता है—

युवा नेतृत्व बना ताकत
उक्रांद की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा नेतृत्व है।
काशी सिंह ए री ,नारायण सिंह जंतवाल ,उक्रांद ने चुने अपने नए केंद्रीय अध्यक्ष, श्री सुरेंद्र कुकरेती, पुष्पेश त्रिपाठी, शांति प्रसाद भट्ट , आशीष नेगी, आशुतोष नेगी,और गढ़वाल क्षेत्र के कई ऊर्जावान युवा नेता आज जन-सरोकारों को लेकर लगातार मैदान में हैं। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल के प्रति एक सकारात्मक माहौल बनता दिख रहा है।

उक्रांद में नई क्रांति की आहट
उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) ने अपने नए केंद्रीय अध्यक्ष के रूप में श्री सुरेंद्र कुकरेती को चुनकर स्पष्ट संकेत दे दिया है कि पार्टी एक बार फिर अपने मूल तेवर और राज्य आंदोलन की चेतना को जीवित करने के मूड में है। सुरेंद्र कुकरेती का नाम उन नेताओं में शुमार है, जिन्होंने संगठन को जमीनी संघर्ष, वैचारिक स्पष्टता और अनुशासित नेतृत्व का रास्ता दिखाया है।
इस नई टीम में आशीष नेगी और आशुतोष नेगी जैसे युवा चेहरे संगठन में नई ऊर्जा और आधुनिक राजनीतिक समझ लेकर आए हैं, वहीं शांति प्रसाद भट्ट जैसे वरिष्ठ और संघर्षशील नेता उक्रांद की वैचारिक रीढ़ को मजबूती प्रदान करते हैं। ये सभी नेता सही मायनों में “क्रांतिकारी परंपरा” के वाहक माने जा सकते हैं।
भुवन जोशी (हल्द्वानी) ने कुमाऊं क्षेत्र में संगठन को नई पहचान दी है, जबकि सुशील उनियाल ने एक ब्रांड फायर नेता के रूप में पार्टी को आक्रामक तेवर और जनसंघर्ष की धार दी है। प्रताप सिंह चौहान जैसे अनुभवी नेता संगठनात्मक संतुलन और रणनीतिक सोच के प्रतीक हैं।

उत्तराखंड क्रांति दल में उर्मिला रावत और पंकज वैश्य जैसे नेताओं की भूमिका तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है। उर्मिला रावत ने संगठन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, सामाजिक सरोकार और जनआंदोलनों को मजबूती देने का कार्य किया है। उनकी स्पष्टवादिता और जमीनी जुड़ाव उन्हें एक सशक्त नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करता है। वहीं पंकज वैश्य को यूकेडी के फेयर नेता के रूप में जाना जाता है, जिनकी पहचान ईमानदार राजनीति, साफ छवि और सिद्धांतों से समझौता न करने वाले व्यक्तित्व के रूप में है। दोनों नेता उक्रांद की वैचारिक शुचिता और जनविश्वास को मजबूत करते हुए पार्टी को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।


इनके अलावा केंद्रीय कार्यकारिणी में कई अन्य समर्पित कार्यकर्ता और नेता शामिल हैं, जिन्होंने वर्षों तक बिना सत्ता और सुविधा के उक्रांद को जीवित रखा। यह नई टीम केवल नामों का समूह नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता, रोजगार, पलायन और संसाधनों के अधिकार की एक नई राजनीतिक क्रांति का संकेत है। अब देखना होगा कि यह जोश जमीनी बदलाव में कितना तब्दील हो पाता है।


2027: विकल्प की तलाश और उक्रांद की वापसी
जनता अब राष्ट्रीय दलों के खोखले वादों से ऊब चुकी है। पहाड़, पहचान और अधिकार—इन सवालों पर अगर कोई दल निरंतर और ईमानदारी से खड़ा दिख रहा है, तो वह है उत्तराखंड क्रांति दल।
2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा को बचाने का चुनाव बनता जा रहा है—और इस लड़ाई में उक्रांद एक बार फिर निर्णायक भूमिका में नजर आ रहा है।


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