नई दिल्ली। विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए बनाए गए UGC के 2026 के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जनवरी 2026 में इन नियमों के अमल पर रोक लगाते हुए कहा था कि नियमों की भाषा प्रथम दृष्टया अस्पष्ट है तथा इनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता व्यक्त की कि नियमों के कुछ प्रावधान समाज को विभाजित करने वाले व्यापक प्रभाव पैदा कर सकते हैं। अदालत ने शिक्षा संस्थानों में ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें सभी विद्यार्थियों के साथ समानता और निष्पक्षता का व्यवहार हो।
UGC के नियमों में क्या था विवाद?
UGC के 2026 के नियमों में उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए इक्विटी समितियों सहित कई व्यवस्थाएं प्रस्तावित की गई थीं। विवाद विशेष रूप से उस प्रावधान को लेकर सामने आया, जिसमें ‘जाति आधारित भेदभाव’ की परिभाषा में SC, ST और OBC समुदायों के संदर्भ को प्रमुखता दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि इस व्यवस्था में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों या शिक्षकों को भी जातिगत भेदभाव की स्थिति में समान स्पष्ट सुरक्षा मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के UGC Regulations को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया तथा 2012 के नियमों को फिलहाल प्रभावी रखने का निर्देश दिया। अदालत ने केंद्र और UGC से जवाब भी मांगा।
अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि भेदभाव से निपटने के लिए बनाए जाने वाले नियम स्पष्ट, संतुलित और दुरुपयोग से सुरक्षित होने चाहिए।
हालांकि सोशल मीडिया पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत के नाम से कई अन्य टिप्पणियां भी वायरल हो रही हैं—जैसे किसी विशेष जाति को लेकर सवाल, IAS-IPS-CJI बनने के बाद भी स्वयं को शोषित मानने संबंधी कथन या किसी समुदाय पर टिप्पणी। इन सभी कथनों की आधिकारिक न्यायालयी रिकॉर्ड से स्वतंत्र पुष्टि किए बिना उन्हें CJI की टिप्पणी के रूप में प्रकाशित करना उचित नहीं होगा।
अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह UGC के इन नियमों पर पुनर्विचार कर रही है।
मुद्दा अब केवल आरक्षण का नहीं, नियमों की निष्पक्षता का भी है
UGC विवाद ने एक महत्वपूर्ण बहस सामने रखी है—शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की वास्तविक शिकायतों के लिए प्रभावी सुरक्षा जरूरी है, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए जिसमें किसी भी वर्ग के विद्यार्थी या शिक्षक को भेदभाव का सामना होने पर शिकायत और संरक्षण का समान अवसर मिले।
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अदालत UGC की नई व्यवस्था की परिभाषाओं, दायरे और संभावित दुरुपयोग की न्यायिक जांच कर रही है। अंतिम कानूनी स्थिति आगे की सुनवाई और अदालत के आदेशों से तय होगी।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
