

उत्तराखंड के वित्तीय वर्ष 2025–26 के आर्थिक सर्वेक्षण में राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर कई सकारात्मक दावे किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य की कुल अर्थव्यवस्था 3.81 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 4.30 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद जताई गई है। वहीं प्रति व्यक्ति आय भी 2.73 लाख रुपये से बढ़कर 3.60 लाख रुपये सालाना होने का अनुमान है। लेकिन इन चमकते आंकड़ों के बीच कई ऐसे सवाल भी खड़े हो रहे हैं, जो उत्तराखंड की जमीनी सच्चाई को लेकर गंभीर बहस पैदा करते हैं।
गुरुवार को सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में प्रमुख सचिव आर. मीनाक्षी सुन्दरम ने आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट की जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 2024–25 में राज्य की सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) 3,81,889 करोड़ रुपये रही, जबकि वर्ष 2021–22 में यह 2.54 लाख करोड़ रुपये थी। यानी तीन वर्षों में जीएसडीपी में डेढ़ गुना से ज्यादा का उछाल दर्ज किया गया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर राज्य की अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से बढ़ रही है, तो फिर उत्तराखंड के हजारों युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन क्यों कर रहे हैं? अगर प्रति व्यक्ति आय 3.60 लाख रुपये तक पहुंचने वाली है, तो फिर गांवों में बेरोजगारी, खाली होते घर और बढ़ते “भूतिया गांव” किस कहानी की ओर इशारा करते हैं?
रिपोर्ट में बताया गया कि वर्ष 2021–22 में राज्य में प्रति व्यक्ति आय 1,94,670 रुपये थी, जो वर्ष 2024–25 में बढ़कर 2,73,921 रुपये हो गई। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि यह 3.60 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण को इस बार नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के सहयोग से तैयार किया गया है।
प्रमुख सचिव ने यह भी बताया कि राज्य की आर्थिक विकास दर अब 8.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले वर्षों के मुकाबले अधिक है। वर्ष 2022 में विकास दर 4.71 प्रतिशत थी, जबकि वर्ष 2025 में यह बढ़कर 7.23 प्रतिशत हो गई थी।
लेकिन यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि यदि विकास दर लगातार बढ़ रही है, तो फिर राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के अवसर आज भी इतने कमजोर क्यों दिखाई देते हैं?
आर्थिक सर्वेक्षण में पर्यटन सेक्टर को उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा इंजन बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य गठन के समय जहां उत्तराखंड में 4,803 होटल थे, वहीं अब उनकी संख्या बढ़कर 10,509 हो गई है। इसके अलावा होम स्टे की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2022 में जहां 3,955 होम स्टे थे, अब यह संख्या बढ़कर 6,161 तक पहुंच गई है।
पर्यटकों की संख्या में भी बड़ा उछाल दिखाया गया है। वर्ष 2001 में उत्तराखंड आने वाले घरेलू पर्यटकों की संख्या 1.05 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 6.01 करोड़ तक पहुंच गई है। विदेशी पर्यटकों की संख्या भी 54,701 से बढ़कर 1,92,533 तक पहुंच गई है। चारधाम यात्रा में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जहां यात्रियों की संख्या 10 लाख से बढ़कर 56 लाख से अधिक बताई गई है।
सरकार का दावा है कि पर्यटन के बढ़ते ढांचे ने युवाओं को रोजगार के नए अवसर दिए हैं। हेली सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए हेलीपोर्ट की संख्या 2 से बढ़ाकर 7 कर दी गई है, जबकि हेलीपैड 60 से बढ़कर 118 हो गए हैं।
लेकिन यहां भी सवाल उठ रहे हैं। क्या पर्यटन से होने वाली कमाई वास्तव में गांवों तक पहुंच रही है, या फिर यह सीमित क्षेत्रों और कुछ खास व्यवसायियों तक ही सिमट कर रह गई है? क्या होम स्टे की बढ़ती संख्या वास्तव में स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार दे रही है, या यह भी कागजी आंकड़ों का हिस्सा भर बनकर रह जाएगी?
उत्तराखंड हिमालयन पर्यटन सहकारी संघ लिमिटेड के अध्यक्ष विक्की रावत का कहना है कि होम स्टे सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई प्रोत्साहन दिए हैं। कैपिटल सब्सिडी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाया गया है और लोन पर लगने वाले ब्याज पर भी 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जा रही है। साथ ही होम स्टे की ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए भी प्लेटफार्म उपलब्ध कराया जा रहा है।
फिर भी असली सवाल वही है — क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तव में उत्तराखंड के दूरदराज के गांवों तक पहुंच रहा है, या फिर विकास के आंकड़े केवल रिपोर्टों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ही सीमित हैं?
आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े निश्चित रूप से उत्साहजनक दिखाई देते हैं, लेकिन उत्तराखंड की असली तस्वीर तब साफ होगी जब इन आंकड़ों की रोशनी गांवों तक पहुंचेगी। जब पलायन रुकेगा, जब युवाओं को अपने ही गांव में रोजगार मिलेगा, और जब पहाड़ों के खाली घर फिर से आबाद होंगे।
तब शायद आर्थिक सर्वेक्षण की यह चमक वास्तविक विकास की कहानी बन सकेगी। अभी के लिए यह सवाल जरूर खड़ा होता है—
क्या उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था सच में मजबूत हो रही है, या फिर आंकड़ों का यह उजाला जमीनी अंधेरे को ढकने की कोशिश है?




