

उत्तरायणी कौतिक–2026 : लोकसंस्कृति, स्मृति और सामूहिक चेतना का उत्सव
रुद्रपुर। शैल सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में आयोजित उत्तरायणी (घुघुतिया त्यार) कौतिक–2026 इस वर्ष केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, सामाजिक एकजुटता और सामूहिक चेतना का जीवंत उत्सव बनकर उभरा। मकर संक्रांति और उत्तरायणी के पावन अवसर पर आयोजित इस कौतिक ने पर्वतीय समाज की स्मृतियों, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को एक बार फिर जनमानस के केंद्र में ला दिया।
कार्यक्रम में कुमाऊँ–गढ़वाल की लोकपरंपराओं का प्रभावशाली प्रदर्शन देखने को मिला। लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक प्रस्तुतियों के माध्यम से कलाकारों ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता की दौड़ में भी लोकसंस्कृति की जड़ें मजबूत हैं। घुघुतिया त्यार की परंपरा—प्रकृति और जीव-जगत के प्रति सह-अस्तित्व की भावना—को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
लोक कलाकारों ने बांधा समां
सुविख्यात लोकगायक एवं स्थानीय कलाकार विद्यालय के विद्यार्थियों बच्चों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां रखी।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सफल आयोजन के पीछे समर्पित टीम
कार्यक्रम का कुशल निर्देशन हरीश दनाई ने किया, आयोजन के मुख्य संयोजक दिनेश बम की नेतृत्व क्षमता और समन्वय से यह कौतिक सुव्यवस्थित और स्मरणीय बन सका।
गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति
कार्यक्रम की अध्यक्षता विधायक शिव अरोड़ा ने मुख्य अतिथि माननीय सांसद अजय भट्ट, महापौर विकास शर्मा, , पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, डॉ किशोर चंदोला,डॉ. अमिता उप्रेती, डी.एस. बिष्ट, नागेंद्र शर्मा, भरत लाल शाह, कमलेंद्र सेमवाल,गोपाल सिंह पटवाल, संजय ठुकराल,रजत बिष्ट, बी,डी भट्ट, शालिनी बोहरा, एडवोकेट, कुलबीर ढिल्लो,सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।
शैल सांस्कृतिक समिति के पदाधिकारियों—महासचिव एडवोकेट दिवाकर पांडे, उपाध्यक्ष सतीश ध्यानी, धीरज पांडे,मोहन उपाध्याय, कोषाध्यक्ष डी.के. दनाई , महेश कांडपाल सहित सभी सदस्यों ने आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई।
महिला सहभागिता और नई पीढ़ी की भागीदारी रही।
रुद्रपुर विधायक शिव अरोड़ा ने शैल सांस्कृतिक समिति के उत्तरायणी कौतिक कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए समिति के सांस्कृतिक प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु ₹25 लाख की आर्थिक सहायता की घोषणा की। साथ ही उत्तरायणी पर्व की शुभकामनाएं देते हुए लोकसंस्कृति के संरक्षण का आह्वान किया। विधायक अरोड़ा ने नगर के प्रवेश द्वार पर राजा रुद्र चंद्र की भव्य प्रतिमा स्थापना के लिए भी सभी से सहयोग की अपील की, जिससे रुद्रपुर की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव को सुदृढ़ किया जा सके।
रुद्रपुर के महापौर विकास शर्मा ने शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को सशक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण घोषणा की है। उन्होंने कहा कि रुद्रपुर के प्रवेश द्वार पर कुमाऊँ के प्रतापी शासक राजा रूद्र चंद्र की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाएगी, जिससे नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी। इसके साथ ही महापौर ने शैल परिषद भवन के निर्माण के लिए भी घोषणा की, जिसे सांस्कृतिक, सामाजिक और साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाया जाएगा। उनकी यह पहल रुद्रपुर की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक सार्थक कदम मानी जा रही है।
कौतिक में महिलाओं की सशक्त भागीदारी देखने को मिली। तनुजा बुधौरी, विनीता पांडे, सुधा पटवाल, दीप जोशी, लीला दनाई, नीलम कांडपाल, भावना मेहरा सहित अनेक महिलाओं की सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में नारी शक्ति केंद्रीय भूमिका निभाती है।
उत्तरायणी कौतिक–2026 केवल लोकसंस्कृति का उत्सव नहीं रहा, बल्कि सेवा और संवेदना का जीवंत उदाहरण भी बना। दिनेश भट्ट,गीता भट्ट, गोपाल सिंह पटवाल,डॉ. एल.एम. उप्रेती और डॉ. किशोर चंदोला ने रक्तदान, स्वास्थ्य जांच और जनसेवा के माध्यम से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई। उनके योगदान ने यह संदेश दिया कि संस्कृति तभी सार्थक है, जब वह मानव जीवन की रक्षा और कल्याण से जुड़ती है।

आज जब सामाजिक सरोकार अक्सर भाषणों और मंचों तक सीमित रह जाते हैं, ऐसे समय में गीता भट्ट और दिनेश चंद्र भट्ट जैसे दंपति आशा की किरण बनकर सामने आते हैं। उत्तरायणी कौतिक जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को उन्होंने सेवा का माध्यम बनाया। पूर्व में आयोजित स्वास्थ्य शिविरों में न केवल उन्होंने स्वयं रक्तदान किया, बल्कि दो दर्जन से अधिक लोगों को प्रेरित कर ब्लड बैंक के लिए रक्त संग्रह कराया। यही नहीं, दोनों ने नेत्रदान का संकल्प लेकर जीवन के बाद भी समाज की सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसे दंपति वास्तव में बताते हैं कि संस्कृति, सेवा और संवेदना जब एक साथ चलें, तो समाज सशक्त बनता
कौतिक में महिलाओं की सशक्त भागीदारी देखने को मिली। तनुजा बुधौरी, विनीता पांडे, सुधा पटवाल, दीप जोशी, लीला दनाई, नीलम कांडपाल, भावना मेहरा सहित अनेक महिलाओं की सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में नारी शक्ति केंद्रीय भूमिका निभाती है।
विजडम पब्लिक स्कूल के साथ-साथ अन्य विद्यालयों के बच्चों ने भी अपने-अपने प्रस्तुति मंच पर शानदार कार्यक्रम प्रस्तुत किए। नृत्य, गीत, नाटक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। कार्यक्रम स्थल पर विजडम पब्लिक स्कूल सहित अन्य स्कूलों के स्टॉल भी लगाए गए थे, जिनमें विशेष रूप से विजडम पब्लिक स्कूल का स्टॉल लोगों की भारी भीड़ से घिरा रहा। अभिभावक और दर्शक विजडम पब्लिक स्कूल की शिक्षा व्यवस्था, उपलब्धियों और गतिविधियों के बारे में जानकारी लेने को उत्सुक नजर आए। यह आयोजन विद्यालयों की शैक्षिक-सांस्कृतिक सक्रियता का सशक्त उदाहरण बना।
कार्यक्रम में उपाध्यक्ष के रूप में सतीश ध्यानी एवं मोहन उपाध्याय तथा कोषाध्यक्ष के रूप में डी.के. दनाई उपस्थित रहे।
विशिष्ट रूप से उपस्थित पदाधिकारियों एवं सदस्यों ASI भूपेन्द्र धामी पी.सी. शर्मा, राजेंद्र बोहरा, दिनेश बम, भास्कर जोशी, जगदीश बिष्ट, दिनेश भट्ट, दान सिंह मेहरा, मुकुल उप्रेती, डॉ. एल.एम. उप्रेती, सतीश लोहनी, चंदन बंगारी अवतार सिंह बिष्ट, मोहिनी बिष्ट, डॉ. नंदाबल्लभ पाठक, लीलाम्बर जोशी, एस.के. नैयर, पूरन चंद्र जोशी, संजीव बुधौरी, हरीश दनाई, नरेंद्र रावत, सी.बी. घिंडियाल, एल.डी. जोशी, राजेंद्र बलौदी, प्रकाश जोशी, महेश कांडपाल, डी.एस. मेहरा, त्रिभुवन जोशी, हरीश मिश्रा, के.के. मिश्रा, दयाकिसन बुढ़लाकोटी, त्रिलोचन पनेरू, डी.डी. गुणवन्त, धीरज पांडे, हेम पांडे,एवं भारत जोशी सहित अनेक गणमान्य जन शामिल रहे।
महिला सहभागिता भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। इस अवसर पर तनुजा बुधौरी, विनीता पांडे, सुधा पटवाल, लीला दनाई, नीलम कांडपाल, कांति भागुनी,भावना मेहरा, मंजू दनाई, सुनीता पांडे, तारा जोशी, शोभा मिश्रा, प्रभा मेहरा, शालिनी बोहरा, सरिता उपाध्याय, हेमा पंत, कुमकुम उपाध्याय, रेखा, पूजा, भारती जोशी, भगवती, आशा लोहनी, भगवती मेहरा, बीना लखेड़ा, सुधा जोशी एवं चंद्रा बम की सक्रिय उपस्थिति रही।
कुल मिलाकर, यह उत्तरायणी कौतिक उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकजुटता और जनसेवा की भावना को सुदृढ़ करने वाला आयोजन सिद्ध हुआ, जिसने आने वाली पीढ़ियों को अपनी लोकपरंपराओं और सामाजिक सरोकारों को सहेजने का प्रेरक संदेश दिया।
स्कूली बच्चों और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों ने यह भरोसा भी दिलाया कि लोकसंस्कृति का उत्तराधिकार सुरक्षित हाथों में है।
उत्तरायणी (घुघुतिया त्यार) कौतिक–2026 ने यह सिद्ध किया कि उत्तराखंड की संस्कृति केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी और भविष्य की दिशा है। शैल सांस्कृतिक समिति का यह प्रयास लोकसंस्कृति को सहेजने, समाज को जोड़ने और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।




