जहाँ बसे हम, वहीं सजी उत्तरायणी: प्रवास में भी जीवित उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर

Spread the love

रुद्रपुर उत्तरायणी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा, स्मृति और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है। यह वह पर्व है जो सूर्य के उत्तरायण होने के साथ-साथ पर्वतीय समाज के जीवन में नई ऊर्जा, आशा और सामाजिक एकजुटता का संचार करता है। उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक परिकल्पना में उत्तरायणी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है—यह पर्व परंपरा, प्रकृति और सामूहिक जीवन-दर्शन का जीवंत प्रतीक है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

रुद्रपुर जैसे मैदानी नगर में उत्तरायणी महोत्सव–2026 का तीन अलग-अलग स्थानों पर भव्य आयोजन इस बात का सशक्त प्रमाण है कि पर्वतीय समाज भले ही भौगोलिक रूप से अपने पहाड़ों से दूर हो, किंतु उसकी जड़ें आज भी अपनी संस्कृति, बोली, लोकपरंपराओं और सामूहिक स्मृति में गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह आयोजन उत्तराखंड राज्य की उस मूल भावना को साकार करता है, जिसके लिए राज्य गठन की परिकल्पना की गई थी—अपनी विशिष्ट पहचान, संस्कृति और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ना।

उत्तरायणी: राज्य की सांस्कृतिक चेतना का आधार

उत्तरायणी पर्व उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में केवल धार्मिक या मौसमी परिवर्तन का संकेत नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन मूल्यों का उत्सव है। मकर संक्रांति के साथ जुड़ा यह पर्व पहाड़ों में लोकगीतों, मेलों, कौतिकों और सामाजिक मेल-जोल के माध्यम से मनाया जाता रहा है। यही कारण है कि प्रवास में बसे पर्वतीय समाज ने भी इस पर्व को अपनी पहचान के केंद्र में बनाए रखा है।

रुद्रपुर में उत्तरायणी महोत्सव–2026 का आयोजन उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सशक्त प्रयास है। यह प्रयास यह भी दर्शाता है कि उत्तराखंड की संस्कृति किसी एक स्थान, संस्था या मंच तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर पर जीवंत है।

सुव्यवस्थित आयोजन, अनुशासित प्रस्तुति

पर्वतीय युवा शक्ति समिति द्वारा जयनगर में आयोजित उत्तरायणी महोत्सव–2026 अत्यंत सुंदर, सुव्यवस्थित और गरिमामय रहा। मंचीय संचालन से लेकर दर्शक व्यवस्था तक, हर पहलू में संगठनात्मक परिपक्वता और सामूहिक समर्पण स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि जब समाज स्वयं आगे बढ़कर अपनी संस्कृति के संरक्षण की जिम्मेदारी लेता है, तो परिणाम कितने प्रभावशाली हो सकते हैं।

विशेष रूप से बच्चों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने सभी दर्शकों का मन मोह लिया। लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा में सजे बच्चों को देखकर यह अनुभूति हुई कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित हाथों में है। जब अगली पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ती है, तभी किसी समाज का भविष्य सुरक्षित और सशक्त बनता है।

14 जनवरी 2026 को स्थानीय लोक कलाकारों द्वारा दी गई प्रस्तुतियाँ उत्तराखंड की लोकधुनों और भावनात्मक गहराई से परिपूर्ण रहीं। ढोल-दमाऊं की थाप, झोड़ा-चांचरी की लय और लोकगीतों के शब्दों ने प्रवासी पर्वतीय समाज को कुछ क्षणों के लिए ही सही, अपने गांव-घर, आंगन और पहाड़ी ढलानों की स्मृतियों से जोड़ दिया।

तीन स्थान, एक भावना

इस वर्ष रुद्रपुर में उत्तरायणी महोत्सव का आयोजन तीन अलग-अलग स्थानों पर हुआ—

  • शैल सांस्कृतिक समिति द्वारा 13 और 14 जनवरी को रुद्रपुर में दो दिवसीय आयोजन
  • पर्वतीय युवा शक्ति समिति द्वारा जयनगर में उत्तरायणी महोत्सव
  • पर्वतीय समाज समिति द्वारा शांति विहार कॉलोनी में उत्तरायणी कार्यक्रम

यह संयोग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का स्पष्ट संकेत है। यह इस बात का प्रमाण है कि पर्वतीय समाज अब केवल एक आयोजन या एक मंच तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को मोहल्लों, कॉलोनियों और सामाजिक इकाइयों तक विस्तार देना चाहता है।

शैल सांस्कृतिक समिति वर्षों से एक ही बैनर के तले उत्तरायणी कौतिक का सफल आयोजन करती आ रही है। समिति ने यह सिद्ध किया है कि निरंतरता और प्रतिबद्धता के साथ किया गया सांस्कृतिक कार्य समाज में गहरी जड़ें जमाता है। 13 और 14 जनवरी को आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम ने रुद्रपुर के सांस्कृतिक परिदृश्य को एक बार फिर जीवंत कर दिया।

जयनगर में सांस्कृतिक चेतना का विस्तार: कुंवर सिंह नेगी का योगदान

जयनगर क्षेत्र में उत्तरायणी आयोजन को निरंतरता देने का श्रेय कुंवर सिंह नेगी को जाता है। वर्ष 2023 से उनके संपादन और मार्गदर्शन में जयनगर में उत्तरायणी कार्यक्रम का आयोजन होता आ रहा है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने का सतत प्रयास है।

कुंवर सिंह नेगी ने यह दिखाया कि व्यक्तिगत समर्पण और सामाजिक सहयोग से किस प्रकार एक क्षेत्र विशेष में सांस्कृतिक परंपरा को मजबूत किया जा सकता है। जयनगर का उत्तरायणी आयोजन आज एक पहचान बन चुका है, जो स्थानीय समाज को एक सूत्र में बांधता है।

शांति विहार कॉलोनी: सामूहिक आयोजन की मिसाल

इस वर्ष शांति विहार कॉलोनी में पर्वतीय समाज समिति के बैनर तले उत्तरायणी कार्यक्रम की शुरुआत एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहल है। इस आयोजन का सफल संचालन गिरीश चंद्र जोशी के नेतृत्व में पर्वतीय समाज समिति के अध्यक्ष, श्री गिरीश चंद्र जोशी, उपाध्यक्ष इंदर सिंह रौतेला, सचिवं नवीन खेतवाल, कोषाध्यक्ष संजय सिंह अधिकारी, कार्यकारिणी अध्यक्ष श्री कल्याण सिंह परिहार जी, सामूहिक सहभागिता से संभव हुआ। शांति विहार में आयोजित कार्यक्रम ने यह सिद्ध किया कि जब समाज सामरिक और संगठित रूप से आगे आता है, तो सीमित संसाधनों में भी भव्य और सार्थक आयोजन किए जा सकते हैं।

यह पहल दर्शाती है कि अब पर्वतीय समाज अपनी कॉलोनियों और स्थानीय स्तर पर भी संस्कृति के संरक्षण के लिए संगठित हो रहा है। यह प्रयास न केवल सांस्कृतिक, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रवास में संस्कृति का संघर्ष और संकल्प

रुद्रपुर आज केवल उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों से आए लोगों का नगर नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से आए लोगों का साझा शहर बन चुका है। इसके बावजूद, यदि किसी समुदाय की संख्या और सांस्कृतिक सक्रियता सबसे अधिक दिखाई देती है, तो वह पर्वतीय समाज है। इसका कारण स्पष्ट है—पर्वतीय समाज जहां भी जाता है, अपने साथ अपनी संस्कृति, बोली, भाषा, खान-पान, लोकगीत और पर्व-त्योहार अवश्य ले जाता है।

उत्तरायणी महोत्सव का तीन स्थानों पर आयोजित होना इस बात का प्रमाण है कि पर्वतीय समाज ने प्रवास को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्तार का माध्यम बनाया है। यह समाज जानता है कि यदि उसकी संस्कृति जीवित रहेगी, तभी उसकी पहचान सुरक्षित रहेगी।

सांस्कृतिक संरक्षण का सामाजिक मॉडल

इन आयोजनों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं। ये कार्यक्रम सामाजिक संवाद, पीढ़ियों के बीच सेतु और सांस्कृतिक शिक्षा के केंद्र बनते जा रहे हैं। बच्चों को मंच देना, बुजुर्गों को सम्मान देना और युवाओं को संगठन की जिम्मेदारी सौंपना—यह एक ऐसा सामाजिक मॉडल है, जिससे समाज आत्मनिर्भर और आत्मगौरव से भरपूर बनता है।

उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना केवल एक भौगोलिक इकाई तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की अवधारणा पर आधारित थी। उत्तरायणी जैसे आयोजन इस परिकल्पना को व्यवहारिक रूप से साकार करते हैं।

उत्तरायणी: केवल पर्व नहीं, चेतना

उत्तरायणी यह सिखाती है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन जड़ों से कटना आवश्यक नहीं। सूर्य उत्तरायण होता है, ऋतु बदलती है, पर परंपरा बनी रहती है। ठीक उसी तरह पर्वतीय समाज भौगोलिक रूप से भले ही पहाड़ों से दूर हो, पर उसकी चेतना आज भी पहाड़ों में ही बसती है।

तीन-तीन स्थानों पर उत्तरायणी महोत्सव का आयोजन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि पर्वतीय समाज जहां भी रहेगा, अपनी संस्कृति की छतरी ताने रखेगा। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता और सबसे बड़ी ताकत है।

उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक परिकल्पना का सशक्त उदाहरण

उत्तरायणी महोत्सव–2026 केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक परिकल्पना को सार्थक करने का सशक्त उदाहरण है। पर्वतीय युवा शक्ति समिति, पर्वतीय समाज समिति, शैल सांस्कृतिक समिति, गोपाल सिंह पटवाल,कुंवर सिंह नेगी और गिरीश चंद्र जोशी जैसे समर्पित व्यक्तियों और संगठनों ने यह सिद्ध कर दिया है कि संस्कृति को बचाने के लिए केवल भाषण नहीं, बल्कि निरंतर कर्म, संगठन और सामूहिक चेतना की आवश्यकता होती है।

भले हम कहीं भी रहें—शहर में, मैदान में या प्रवास में—यदि उत्तराखंड की संस्कृति जीवित है, तो उत्तराखंड की पहचान सुरक्षित है। उत्तरायणी महोत्सव–2026 इसी सत्य की सशक्त उद्घोषणा है।


Spread the love