एफआईआर के बाद रुद्रपुर में भाजपा का हंगामा!शुद्धीकरण पर एफआईआर से भाजपा में उबाल, हल्द्वानी कांड ने खोल दी जाति की राजनीति की परतें!खरगे की मौजूदगी से ‘अशुद्ध’ हुआ मैदान? एफआईआर के बाद भाजपा के तेवर तीखे, मनुस्मृति पर छिड़ी बहस

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शुद्धीकरण पर एफआईआर से भाजपा में उबाल
हल्द्वानी कांड ने खोल दी जाति की राजनीति की परतें
हल्द्वानी से बेंगलुरु तक पहुंचा शुद्धीकरण विवाद अब महज भाजपा-कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है कि 21वीं सदी के लोकतांत्रिक भारत में किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर किसी सार्वजनिक स्थान को शुद्ध-अशुद्ध मानने की सोच के लिए कोई जगह है या नहीं।
आठ अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा हुई। आरोप है कि दस अगस्त को इसी स्थान पर भाजपा से जुड़े लोगों ने कथित रूप से ‘शुद्धीकरण अनुष्ठान’ किया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

शिकायतकर्ता टीआर रामप्पा ने इस आयोजन को जातिगत सोच से जोड़ते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत के आधार पर बेंगलुरु में महेंद्र भट्ट समेत अन्य लोगों के खिलाफ ‘शून्य’ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।
मामला सामने आते ही भाजपा की राजनीतिक प्रतिक्रिया तीखी हो गई। प्रदर्शन और नारेबाजी में राहुल गांधी को लेकर व्यक्तिगत आरोपों से लेकर कांग्रेस विरोधी नारों तक राजनीतिक माहौल गर्म हो गया। मगर असली सवाल अब भी वहीं खड़ा है—हल्द्वानी के रामलीला मैदान में आखिर ‘शुद्धीकरण’ की जरूरत क्यों पड़ी?
यदि किसी व्यक्ति की जाति के कारण उसकी मौजूदगी को किसी स्थान की ‘अशुद्धता’ से जोड़ा गया है तो यह सवाल केवल मल्लिकार्जुन खरगे का नहीं है। यह देश के करोड़ों दलितों, आदिवासियों और वंचित वर्गों की सामाजिक गरिमा का सवाल है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता और गरिमा का अधिकार देता है। ऐसे में जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को कमतर समझने की मानसिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यही वजह है कि हल्द्वानी की घटना ने मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद पर बहस को फिर से हवा दे दी है। दलित चिंतन में मनुस्मृति को लंबे समय से जातिगत ऊंच-नीच की व्यवस्था के प्रतीक के रूप में देखा गया है। आधुनिक भारतीय संविधान ने जन्म आधारित सामाजिक श्रेणीकरण के स्थान पर समान नागरिकता का सिद्धांत स्वीकार किया है।
यहां एक राजनीतिक विडंबना भी दिखाई देती है। भाजपा खुद को विकास, राष्ट्रवाद और आधुनिक भारत की राजनीति का प्रतिनिधि बताती है। ऐसे में यदि उसके किसी नेता या कार्यकर्ता पर जातिगत ‘शुद्ध-अशुद्ध’ जैसी अवधारणा को बढ़ावा देने का आरोप लगता है तो पार्टी को राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
क्या वास्तव में ऐसा कोई अनुष्ठान हुआ था?
यदि हुआ था तो उसका उद्देश्य क्या था?
किसके निर्देश पर हुआ?
उसमें कौन-कौन शामिल था?
और क्या आयोजकों का मानना था कि खरगे की जाति के कारण मैदान को शुद्ध करने की आवश्यकता थी?
इन सवालों के जवाब जांच से सामने आने चाहिए।
दूसरी ओर भाजपा के सामने भी राजनीतिक चुनौती है। यदि आरोप तथ्यहीन हैं तो पार्टी को जांच के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखना चाहिए और आरोपों को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से खारिज कराना चाहिए। कांग्रेस के खिलाफ ‘राहुल गांधी चोर है’ या ‘कांग्रेस मुर्दाबाद’ जैसे नारे इस मूल सवाल का उत्तर नहीं देते।
किसी व्यक्ति पर राजनीतिक आरोप लगाना लोकतंत्र का हिस्सा है, मगर उसकी जाति के आधार पर उसकी गरिमा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर अलग विषय है।
हल्द्वानी का यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड स्वयं सामाजिक विविधता और अनेक समुदायों की साझी संस्कृति का प्रदेश है। यहां पहाड़ से लेकर तराई तक अलग-अलग सामाजिक समूह मिलकर राज्य की पहचान बनाते हैं। ऐसे प्रदेश में जातिगत श्रेष्ठता और अस्पृश्यता की किसी भी धारणा पर सार्वजनिक बहस होना जरूरी है।
भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह अवसर है कि वे जाति की राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक समानता पर स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण सामने रखें।
कांग्रेस को भी यह बताना होगा कि वह दलित सम्मान को केवल भाजपा विरोधी राजनीति का मुद्दा बनाएगी या अपने संगठन और व्यवहार में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगी।
भाजपा को भी यह स्पष्ट करना होगा कि उसके लिए संविधान सर्वोच्च है और जातिगत ऊंच-नीच की किसी भी सोच का उसके राजनीतिक दर्शन में कोई स्थान है या नहीं।
क्योंकि मामला केवल एक मैदान का नहीं है।
मामला उस मानसिकता का है, जिसमें किसी इंसान की मौजूदगी को उसके जन्म से जोड़कर ‘पवित्र’ या ‘अपवित्र’ ठहराया जाता है।
हल्द्वानी का कथित शुद्धीकरण यदि जांच में सही पाया जाता है तो यह उत्तराखंड की राजनीति के लिए आईना होगा। यह आईना बताएगा कि आधुनिक राजनीतिक नारों के बीच सामाजिक सोच कितनी बदली है।
और यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो वह भी उतनी ही स्पष्टता से सामने आना चाहिए।
लोकतंत्र में आरोप से सजा तक का रास्ता कानून तय करता है। मगर सामाजिक बहस का रास्ता समाज तय करता है।
आज सवाल यही है—
क्या भारत जाति से संचालित सामाजिक मानसिकता की ओर लौटेगा, या संविधान की समानता को अपना भविष्य बनाएगा?
हल्द्वानी का रामलीला मैदान इस समय केवल एक राजनीतिक स्थल नहीं रह गया है। वह सामाजिक बराबरी की उस बहस का प्रतीक बन चुका है, जिसका सामना भारतीय समाज को लंबे समय से करना है।
अब जरूरत नारों की कम और जवाबों की ज्यादा है।
“खरगे आए तो मैदान अशुद्ध? एफआईआर के बाद भाजपा का हंगामा, हल्द्वानी ने पूछ लिया जाति का सबसे बड़ा सवाल”.


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