बिजली 24 घंटे देने का दावा, महंगे बिलों से जनता बेहाल; सरकार की उपलब्धि पर उठे सवालरोशनी बढ़ी या जेब पर बोझ? 25 साल की बिजली खरीद के बीच महंगी बिजली पर सरकार घिरी

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उत्तराखंड ,उत्तराखंड सरकार ने 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली खरीद के लिए अदाणी पावर लिमिटेड के साथ 25 वर्ष तक बिजली आपूर्ति समझौते की दिशा में कदम बढ़ाया है। दर 5.746 रुपये प्रति यूनिट बताई गई है। सरकार का तर्क है कि इससे प्रदेश की बढ़ती ऊर्जा जरूरत पूरी होगी, बिजली खरीद की लागत में स्थिरता आएगी और उद्योग, व्यापार व पर्यटन को दीर्घकालीन ऊर्जा उपलब्धता सुनिश्चित होगी।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


सरकार की इस पहल को विकास के नजरिये से देखा जा सकता है, मगर असली सवाल बिजली की उपलब्धता से आगे का है—उत्तराखंड के आम उपभोक्ता को यह बिजली किस कीमत पर मिलेगी और उसकी जेब पर इसका वास्तविक असर कितना पड़ेगा?
आज सरकार चौबीस घंटे बिजली उपलब्ध कराने को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। बिजली की उपलब्धता निश्चित रूप से आवश्यक है, मगर किसी परिवार के घर में रोशनी पहुंचने के साथ उस रोशनी का बिल भी परिवार की आय के अनुरूप रहना चाहिए। एक ओर सरकार दीर्घकालीन बिजली खरीद को उपलब्धि बता रही है, दूसरी ओर स्मार्ट मीटर, बढ़े हुए बिल और बिजली दरों को लेकर उपभोक्ताओं के बीच लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे माहौल में सरकार को केवल बिजली की उपलब्धता का आंकड़ा सामने रखने के बजाय बिजली की अंतिम उपभोक्ता कीमत, फिक्स्ड चार्ज, सरचार्ज और बिलिंग व्यवस्था की पूरी तस्वीर जनता के सामने रखनी चाहिए।
यह भी गंभीर प्रश्न है कि यदि 25 साल के लिए बिजली खरीद समझौता किया जा रहा है तो आने वाले वर्षों में इसकी कुल वित्तीय जिम्मेदारी कितनी होगी? 1320 मेगावाट की इतनी बड़ी क्षमता के दीर्घकालीन करार का राज्य की बिजली व्यवस्था, यूपीसीएल की वित्तीय स्थिति और उपभोक्ताओं की दरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
सरकार का यह तर्क कि सस्ती या स्थिर खरीद लागत का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा, तभी विश्वसनीय माना जाएगा जब उपभोक्ताओं के बिजली बिल में इसका प्रत्यक्ष असर दिखाई दे। सिर्फ बिजली देना विकास का प्रमाण नहीं है; ऐसी बिजली उपलब्ध कराना विकास है जिसकी कीमत आम परिवार, किसान, दुकानदार और छोटे उद्योग की पहुंच में रहे।
उत्तराखंड ऊर्जा उत्पादन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण राज्य है। जलविद्युत की अपार संभावनाओं वाले प्रदेश में बाहर से दीर्घकालीन कोयला आधारित बिजली खरीद के साथ यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि राज्य अपनी स्थानीय ऊर्जा क्षमता का अधिकतम उपयोग किस तरह कर रहा है। पर्यावरणीय प्रभाव, कोयला परिवहन, उत्पादन लागत और भविष्य की बिजली मांग का स्वतंत्र आकलन भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा होना चाहिए।
सरकार को उपलब्धि का दावा करने से पहले हिसाब देना चाहिए
आज मध्यवर्गीय परिवार महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान, रोजगार और रोजमर्रा के खर्चों के दबाव से जूझ रहा है। ऐसे परिवार के लिए बिजली का बिल महज एक सरकारी आंकड़ा नहीं, बल्कि मासिक बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि बिजली की उपलब्धता बढ़ती है और उसी अनुपात में घरेलू खर्च भी बढ़ता है तो सरकार की उपलब्धि का मूल्यांकन केवल ‘कितने घंटे बिजली मिली’ से करना अधूरा होगा।
स्मार्ट मीटर को लेकर उपभोक्ताओं की शिकायतें भी इसी व्यापक बहस से जुड़ती हैं। यदि किसी उपभोक्ता को पुराने मीटर की तुलना में अचानक अधिक बिल मिलता है तो उसकी शिकायत का पारदर्शी तकनीकी परीक्षण होना चाहिए। सरकार और ऊर्जा निगम को हर ऐसे मामले में मीटर की जांच, खपत के आंकड़े और बिल की गणना का आधार सार्वजनिक रूप से समझाना चाहिए।
जनता को बिजली चाहिए, मगर ऐसी बिजली चाहिए जिसकी कीमत उसके घर का बजट बिगाड़े बिना चुकाई जा सके।
सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि अदाणी पावर से प्रस्तावित 5.746 रुपये प्रति यूनिट की खरीद दर के बाद ट्रांसमिशन, वितरण, नियामकीय शुल्क, अन्य शुल्क और उपभोक्ता स्तर पर अंतिम दर क्या बनेगी। यही वह आंकड़ा है जिससे जनता को असली तस्वीर समझ आएगी।
उत्तराखंड में विकास का अर्थ केवल बड़े बिजली समझौते, स्मार्ट मीटर और चौबीस घंटे आपूर्ति की घोषणा तक सीमित रखना उचित दृष्टिकोण नहीं होगा। विकास का वास्तविक पैमाना यह है कि प्रदेश का आम नागरिक पर्याप्त बिजली पाए, भरोसेमंद सेवा पाए और उसका बिजली बिल उसकी आय के अनुपात में रहे।
सरकार यदि इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है तो उसे जनता के सामने पूरा आर्थिक हिसाब भी रखना चाहिए। वरना बिजली की रोशनी में विकास का दावा तो चमकेगा, मगर बढ़ते बिलों का बोझ मध्यवर्गीय परिवारों की जेब पर भारी पड़ता रहेगा।
उत्तराखंड की जनता को केवल रोशनी का वादा नहीं, सस्ती, पारदर्शी और जवाबदेह बिजली व्यवस्था चाहिए। यही वास्तविक जनहित है और यही विकास की कसौटी भी होनी चाहिए।


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