विकास के दावे बनाम जमीनी सच्चाई: उत्तराखंड में ‘चार साल बेमिसाल’ या सवालों का जाल?

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हल्द्वानी के एमबी इंटर कॉलेज मैदान में आयोजित “जन-जन की सरकार, चार साल बेमिसाल” कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विकास के बड़े-बड़े दावे पेश किए। मंच से आंकड़ों की बारिश हुई—लाखों करोड़ के निवेश, हजारों नौकरियां, महिलाओं का सशक्तिकरण और जीरो टॉलरेंस की नीति।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


लेकिन इन दावों के बीच विपक्ष और जमीनी हकीकत कई असहज सवाल खड़े कर रही है।
सरकार के दावे: आंकड़ों में विकास की तस्वीर
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में 3.76 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश समझौते (MoUs) हुए, जिनमें से 1 लाख करोड़ से ज्यादा परियोजनाएं धरातल पर उतर चुकी हैं।
20,000 से अधिक रोजगार सृजित
लखपति दीदी योजना के तहत 2.65 लाख महिलाएं सशक्त
30,000 से ज्यादा सरकारी नौकरियां
स्टार्टअप 700 से बढ़कर 1700
हेलीपोर्ट 2 से 12, हेलीपैड 60 से 112
बिजली उत्पादन में तीन गुना वृद्धि
साथ ही, नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उत्तराखंड को सतत विकास लक्ष्यों में देश में पहला स्थान मिलने का दावा भी किया गया।
जीरो टॉलरेंस और सख्त कानून: सरकार का आक्रामक रुख
सीएम धामी ने साफ कहा कि अब भ्रष्टाचार और नकल माफिया पर सख्त कार्रवाई हो रही है:
100 से अधिक नकल माफिया जेल में
200 से ज्यादा भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई
सख्त नकल विरोधी कानून लागू
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी मंच से कहा—
“अब कोई भी कानून से ऊपर नहीं है, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो।”
पर्यटन, पलायन और अर्थव्यवस्था पर जोर
सरकार का दावा है कि:
शीतकालीन पर्यटन से रोजगार के नए अवसर
होमस्टे और होटल सेक्टर में वृद्धि
रिवर्स पलायन से गांवों में आबादी लौट रही
राज्य का बजट 1 लाख करोड़ पार
प्रति व्यक्ति आय में 41% वृद्धि
लेकिन विपक्ष के सवाल: “विकास किसका और किसके लिए?”
सरकारी दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह विकास वास्तव में उत्तराखंड के युवाओं और स्थानीय लोगों तक पहुंच रहा है?
1. रोजगार पर बड़ा आरोप
विपक्ष का आरोप है कि:
राज्य में होने वाले बड़े इवेंट्स के टेंट, ठेके और व्यवस्थाएं दिल्ली, गुजरात, हरियाणा और बिहार के ठेकेदारों को दी जा रही हैं
स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा
सवाल: अगर निवेश आ रहा है, तो स्थानीय बेरोजगारी क्यों कायम है?
2. “घोटालों की विरासत” बनाम “नए आरोप”
सीएम ने कांग्रेस शासन पर कई घोटाले गिनाए:
पटवारी भर्ती घोटाला
दारोगा भर्ती में धांधली
एनएच और शराब घोटाले
लेकिन विपक्ष पलटवार करते हुए कहता है कि:
उद्यान विभाग में घोटाले
सरकारी योजनाओं में अनियमितताएं
जमीन और ठेकों में पारदर्शिता पर सवाल
सवाल: क्या “जीरो टॉलरेंस” केवल भाषणों तक सीमित है?
3. पलायन बनाम “रिवर्स पलायन” का दावा
सरकार कहती है कि गांव आबाद हो रहे हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है:
पहाड़ों में अभी भी स्कूल, अस्पताल और रोजगार की कमी
कई गांव आज भी खाली या आधे खाली
“पहाड़ धड़क रहे हैं”—यह केवल भावनात्मक वाक्य नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।
4. यूसीसी, धर्मांतरण और जमीन कब्जा—राजनीति या नीति?
सरकार ने:
समान नागरिक संहिता (UCC)
धर्मांतरण विरोधी कानून
अतिक्रमण पर कार्रवाई
को अपनी उपलब्धि बताया।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये मुद्दे विकास के मूल सवालों से ध्यान भटकाने के लिए भी इस्तेमाल हो रहे हैं।
जमरानी बांध: 50 साल बाद उम्मीद या नई परीक्षा?
50 वर्षों से लंबित जमरानी बांध परियोजना को अब 3700 करोड़ की लागत से आगे बढ़ाया जा रहा है।
सरकार इसे कुमाऊं के विकास की रीढ़ बता रही है, लेकिन
लोगों को इंतजार है कि यह परियोजना कब जमीन पर पूरी तरह दिखेगी।
राजनीतिक संदेश: “विकास की राजनीति”
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कहा—
“हम राजनीति के लिए राजनीति नहीं, बल्कि विकास के लिए राजनीति करते हैं।”
यह बयान सीधे तौर पर विपक्ष को संदेश देने के साथ-साथ 2027 के चुनावी संकेत भी देता है।
दावों और सवालों के बीच खड़ा उत्तराखंड
उत्तराखंड आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां:
एक तरफ बड़े निवेश, योजनाएं और दावे हैं
दूसरी तरफ रोजगार, पारदर्शिता और स्थानीय भागीदारी के सवाल
असली परीक्षा अब आंकड़ों की नहीं, बल्कि जमीनी असर की है।
अगर विकास का लाभ उत्तराखंड के युवाओं, किसानों और पहाड़ के गांवों तक नहीं पहुंचा, तो “चार साल बेमिसाल” का दावा
“चार साल सवालों के जाल” में बदल सकता है।


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