शास्त्रसम्मत है 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ – पंडित त्रिलोचन पनेरू कृष्णात्रेयनव! संवत्सर 2083 ‘रौद्र’: परंपरा, तर्क और समय का संकेत

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रुद्रपुर/विशेष।जब पूरी दुनिया ग्रेगोरियन कैलेंडर के नए साल के शोर में खो जाती है, तब सनातन संस्कृति का वास्तविक नववर्ष—चैत्र शुक्ल प्रतिपदा—एक गहरे आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संदेश के साथ हमारे सामने आता है। वर्ष 2083, जिसे ‘रौद्र’ संवत्सर नाम दिया गया है, केवल तिथि परिवर्तन नहीं बल्कि समय के स्वभाव का संकेत भी है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


इस बार नववर्ष और नवरात्रि के प्रारंभ को लेकर एक सामान्य जिज्ञासा समाज में देखी गई—जब 19 मार्च को अमावस्या है, तो नवरात्रि कैसे शुरू?
यहीं सनातन परंपरा की गहराई सामने आती है। विद्वान पंडित त्रिलोचन पनेरू कृष्णात्रेय ने शास्त्रों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब प्रतिपदा तिथि सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती, तब अमावस्या युक्त प्रतिपदा को ही मान्य किया जाता है। यह निर्णय भावनाओं पर नहीं, बल्कि निर्णय सिंधु और धर्म सिंधु जैसे ग्रंथों की ठोस व्यवस्था पर आधारित है।
परंपरा बनाम भ्रम: समाज को क्या समझना होगा?आज का समाज सोशल मीडिया और आधे-अधूरे ज्ञान के आधार पर परंपराओं पर प्रश्न उठाता है, जो स्वस्थ विमर्श का संकेत हो सकता है, लेकिन जब यह प्रश्न अज्ञान और भ्रम से प्रेरित हो, तो यह संस्कृति के मूल को कमजोर करता है।
नवरात्रि का यह प्रारंभ हमें यह याद दिलाता है कि सनातन धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि गणित, खगोल और तर्क का अद्भुत संगम है।
‘रौद्र’ संवत्सर: क्या सचमुच उथल-पुथल का संकेत?
संवत्सर का नाम ‘रौद्र’ है—जो अपने आप में एक चेतावनी जैसा प्रतीत होता है। शास्त्रों के अनुसार इस वर्ष—
सत्ता और शासकों के बीच टकराव
सामाजिक असंतोष
आर्थिक और प्राकृतिक संतुलन का मध्यम स्तर
ये संकेत केवल ज्योतिषीय भविष्यवाणी नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का भी प्रतिबिंब हैं। दुनिया पहले ही युद्ध, आर्थिक मंदी और सामाजिक तनाव के दौर से गुजर रही है—ऐसे में यह संवत्सर हमें सतर्क और सजग रहने का संदेश देता है।
गुरु राजा, मंगल मंत्री: संतुलन का वर्ष
इस वर्ष देव गुरु बृहस्पति राजा हैं—जो ज्ञान, धर्म और संतुलन के प्रतीक हैं। वहीं मंगल मंत्री हैं—जो शक्ति, संघर्ष और साहस का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह संयोजन स्पष्ट करता है कि—  समय हमें ज्ञान और शक्ति, दोनों का संतुलन साधने की चुनौती दे रहा है।
यदि समाज केवल शक्ति की ओर झुकेगा, तो संघर्ष बढ़ेगा।
यदि केवल ज्ञान की बात होगी और कर्म नहीं होगा, तो ठहराव आएगा।
नवरात्रि: केवल पूजा नहीं, आत्मशुद्धि का अवसर
नवरात्रि को अक्सर लोग केवल व्रत और पूजा तक सीमित कर देते हैं, जबकि इसका वास्तविक अर्थ है—
आत्मसंयम
आंतरिक शक्ति का जागरण
नकारात्मकता पर विजय
मां दुर्गा का पालकी पर आगमन और हाथी पर प्रस्थान इस वर्ष शुभ संकेत अवश्य देता है, लेकिन यह शुभता तभी फलित होगी जब समाज अपने भीतर की असुर प्रवृत्तियों को पहचाने।
  शास्त्रसम्मत है 19 मार्च से नवरात्रि प्रारंभ – पंडित त्रिलोचन पनेरू कृष्णात्रेय
पंडित त्रिलोचन पनेरू कृष्णात्रेय ने स्पष्ट किया कि 19 मार्च 2026 को अमावस्या होने के बावजूद नवरात्रि का प्रारंभ पूर्णतः शास्त्रसम्मत है। उन्होंने बताया कि जब प्रतिपदा तिथि सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती या अत्यंत अल्प समय के लिए रहती है, तब अमावस्या युक्त प्रतिपदा को ही मान्य किया जाता है। निर्णय सिंधु और धर्म सिंधु में भी यही विधान वर्णित है। प्रातः 06:53 के बाद अमावस्या समाप्ति के पश्चात कलश स्थापना और नवरात्रि आरंभ करना विधिसम्मत है। श्रद्धालु निःसंकोच इस दिन पूजन कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए।


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