

साथ ही गुरुवार का व्रत रखा जाता है।


सनातन शास्त्रों में निहित कि देवी मां तुलसी की पूजा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। भगवान मधुसूदन और मां तुलसी की पूजा करने से घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है। अगर आप भी जीवन में मनचाहा वरदान पाना चाहते हैं, तो गुरुवार के दिन भक्ति भाव से भगवान विष्णु और मां तुलसी की पूजा करें।
ब्रह्मज्ञान, भक्ति और शक्ति – श्रीकृष्ण का सनातन संदेश✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में खड़ा था, तो उसके हाथ से गांडीव छूट गया था। सामने अपने ही बंधु-बांधव, गुरु और सखा खड़े थे। यह केवल युद्ध का संकट नहीं था—यह मानव मन के सबसे बड़े द्वंद्व का प्रतीक था। इसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने ‘ब्रह्म ज्ञान’ का उपदेश दिया, जो आज भी समूची मानवता के लिए मार्गदर्शन का शाश्वत स्रोत है।
ब्रह्मज्ञान: आत्मा और परमात्मा की एकता का बोध
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा— “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।”
यह श्लोक केवल अमर आत्मा का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है। यही आत्मा ब्रह्म का अंश है—अनंत, अविनाशी और नित्य।
ब्रह्म ज्ञान का सार यही है कि जब मनुष्य अपने भीतर स्थित दिव्यता को पहचान लेता है, तब उसका मोह मिट जाता है, और वह कर्म करते हुए भी निष्काम रहता है। वही अवस्था “स्थितप्रज्ञ” की है—जहाँ मन, बुद्धि और आत्मा ब्रह्म के साथ एकरूप हो जाते हैं।
भक्ति: हृदय का विज्ञान, मन की शुद्धि का मार्ग
वेद और उपनिषद बताते हैं कि ज्ञान और भक्ति एक ही सत्य की दो धाराएँ हैं।
जहाँ ज्ञान आत्मा की अनुभूति कराता है, वहीं भक्ति उस अनुभूति को मधुर बनाती है।
श्रीकृष्ण ने कहा—
केवल भक्ति के द्वारा ही मनुष्य मुझे वास्तव में जान सकता है।
भक्ति कोई याचना नहीं है—यह समर्पण है। जब मनुष्य अहंकार, क्रोध, लोभ, और भय से मुक्त होकर अपने को ईश्वर के चरणों में अर्पित करता है, तभी भक्ति जाग्रत होती है। भक्ति का अर्थ है—ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण, जो ज्ञान को भी जीवंत बना देता है।
भक्ति से शक्ति: आंतरिक ऊर्जा का जागरण
भक्ति केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं; यह एक आत्मिक ऊर्जा है, जो मनुष्य को साहस, धैर्य और निष्ठा से भर देती है।
अर्जुन जब भ्रम में डगमगा गया, तो श्रीकृष्ण की वाणी ने उसमें भक्ति और विश्वास का संचार किया। उसी क्षण अर्जुन का मोह नष्ट हुआ और उसने कहा—
यह वही क्षण था जब भक्ति ने शक्ति का रूप धारण किया—जहाँ श्रद्धा ने आत्मविश्वास को जन्म दिया, और अर्जुन पुनः अपने धर्म-कर्म के पथ पर अग्रसर हुआ।
आज के युग में जब मनुष्य भ्रम, लालच, और भौतिकता की भीड़ में खो गया है, तब श्रीकृष्ण का यह संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है।
भक्ति बिना ज्ञान अधूरा है, और ज्ञान बिना भक्ति निष्ठुर।
जब दोनों का संगम होता है, तभी मनुष्य ब्रह्मज्ञान की उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ कर्म भी पूजा बन जाता है और जीवन भी साधना।
वेदों की दृष्टि से ब्रह्मज्ञान
ऋग्वेद कहता है—
“एकों सत् विप्रा बहुधा वदन्ति।”
अर्थात् सत्य एक ही है, ऋषि उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। यही वेदांत का मूल है—सबमें एक ही ब्रह्म का वास है।
उपनिषद कहते हैं—
“तत्वमसि” (तू वही है)।
जब मनुष्य यह पहचान लेता है कि वह ब्रह्म का ही अंश है, तब उसका भय समाप्त हो जाता है, और वही ज्ञान उसे मुक्त करता है।
सनातन धर्म का सार – ज्ञान, भक्ति और कर्म का संतुलन
गीता, वेद और उपनिषद हमें यही सिखाते हैं कि धर्म केवल कर्मकांड नहीं—यह जीवन जीने की कला है।
श्रीकृष्ण का संदेश हमें यह बताता है कि जीवन का वास्तविक युद्ध बाहर नहीं, भीतर है।
ब्रह्मज्ञान से विवेक उत्पन्न होता है, भक्ति से स्थिरता, और कर्म से अर्थपूर्ण जीवन।
जब ये तीनों मिलते हैं—तो मनुष्य ईश्वर के साथ नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर बन जाता है—कर्तव्य, करुणा और प्रेम का प्रतीक।
यही है सनातन धर्म का शाश्वत रहस्य, और यही है वह “ब्रह्म ज्ञान” जिसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में प्रदान किया था—जहाँ मृत्यु भी मोक्ष बन गई और युद्ध भी योग।
तुलसी माता के नाम
1.ॐ श्री तुलस्यै नमः
2.ॐ नन्दिन्यै नमः
3.ॐ देव्यै नमः
4.ॐ शिखिन्यै नमः
5.ॐ धारिण्यै नमः
6.ॐ धात्र्यै नमः
7.ॐ सावित्र्यै नमः
8.ॐ सत्यसन्धायै नमः
9.ॐ कालहारिण्यै नमः
10.ॐ गौर्यै नमः
11.ॐ देवगीतायै नमः
12.ॐ द्रवीयस्यै नमः
13.ॐ पद्मिन्यै नमः
14.ॐ सीतायै नमः
15.ॐ रुक्मिण्यै नमः
16.ॐ प्रियभूषणायै नमः
17.ॐ श्रेयस्यै नमः
18.ॐ श्रीमत्यै नमः
19.ॐ मान्यायै नमः
20.ॐ गौर्यै नमः
21.ॐ गौतमार्चितायै नमः
22.ॐ त्रेतायै नमः
23.ॐ त्रिपथगायै नमः
24.ॐ त्रिपादायै नमः
25.ॐ त्रैमूर्त्यै नमः
26.ॐ जगत्रयायै नमः
27.ॐ त्रासिन्यै नमः
28.ॐ गात्रायै नमः
29.ॐ गात्रियायै नमः
30.ॐ गर्भवारिण्यै नमः
31.ॐ शोभनायै नमः
32.ॐ समायै नमः
33.ॐ द्विरदायै नमः
34.ॐ आराद्यै नमः
35.ॐ यज्ञविद्यायै नमः
36.ॐ महाविद्यायै नमः
37.ॐ गुह्यविद्यायै नमः
38.ॐ कामाक्ष्यै नमः
39.ॐ कुलायै नमः
40.ॐ श्रीयै नमः
41.ॐ भूम्यै नमः
42.ॐ भवित्र्यै नमः
43.ॐ सावित्र्यै नमः
44.ॐ सरवेदविदाम्वरायै नमः
45.ॐ शंखिन्यै नमः
46.ॐ चक्रिण्यै नमः
47.ॐ चारिण्यै नमः
48.ॐ चपलेक्षणायै नमः
49.ॐ पीताम्बरायै नमः
50.ॐ प्रोत सोमायै नमः
51.ॐ सौरसायै नमः
52.ॐ अक्षिण्यै नमः
53.ॐ अम्बायै नमः
54.ॐ सरस्वत्यै नमः
55.ॐ सम्श्रयायै नमः
56.ॐ सर्व देवत्यै नमः
57.ॐ विश्वाश्रयायै नमः
58.ॐ सुगन्धिन्यै नमः
59.ॐ सुवासनायै नमः
60.ॐ वरदायै नमः
61.ॐ सुश्रोण्यै नमः
62.ॐ चन्द्रभागायै नमः
63.ॐ यमुनाप्रियायै नमः
64.ॐ कावेर्यै नमः
65.ॐ मणिकर्णिकायै नमः
66.ॐ अर्चिन्यै नमः
67.ॐ स्थायिन्यै नमः
68.ॐ दानप्रदायै नमः
69.ॐ धनवत्यै नमः
70.ॐ सोच्यमानसायै नमः
71.ॐ शुचिन्यै नमः
72.ॐ श्रेयस्यै नमः
73.ॐ प्रीतिचिन्तेक्षण्यै नमः
74.ॐ विभूत्यै नमः
75.ॐ आकृत्यै नमः
76.ॐ आविर्भूत्यै नमः
77.ॐ प्रभाविन्यै नमः
78.ॐ गन्धिन्यै नमः
79.ॐ स्वर्गिन्यै नमः
80.ॐ गदायै नमः
81.ॐ वेद्यायै नमः
82.ॐ प्रभायै नमः
83.ॐ सारस्यै नमः
84.ॐ सरसिवासायै नमः
85.ॐ सरस्वत्यै नमः
86.ॐ शरावत्यै नमः
87.ॐ रसिन्यै नमः
88.ॐ काळिन्यै नमः
89.ॐ श्रेयोवत्यै नमः
90.ॐ यामायै नमः
91.ॐ ब्रह्मप्रियायै नमः
92.ॐ श्यामसुन्दरायै नमः
93.ॐ रत्नरूपिण्यै नमः
94.ॐ शमनिधिन्यै नमः
95.ॐ शतानन्दायै नमः
96.ॐ शतद्युतये नमः
97.ॐ शितिकण्ठायै नमः
98.ॐ प्रयायै नमः
99.ॐ धात्र्यै नमः
100.ॐ श्री वृन्दावन्यै नमः
101.ॐ कृष्णायै नमः
102.ॐ भक्तवत्सलायै नमः
103.ॐ गोपिकाक्रीडायै नमः
104.ॐ हरायै नमः
105.ॐ अमृतरूपिण्यै नमः
106.ॐ भूम्यै नमः
107.ॐ श्री कृष्णकान्तायै नमः
108.ॐ श्री तुलस्यै नमः




