प्रशासनिक चूक या सियासी विस्फोट? दरऊ प्रकरण ने खोली व्यवस्था की परतें

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रुद्रपुर का दरऊ ग्राम पंचायत प्रकरण अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, राजनीतिक जवाबदेही और कानून-व्यवस्था के व्यापक सवालों के केंद्र में आ गया है। किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद एडीओ पंचायत की जांच में ग्राम प्रधान नाजिया खान के जेल में होने की पुष्टि होना प्रशासन के लिए असहज स्थिति पैदा करता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
जेल में प्रधान, बाहर चलता रहा बजट
मामले की जड़ में सबसे गंभीर आरोप यह है कि दरऊ की महिला ग्राम प्रधान नाजिया खान के पौड़ी जेल में निरुद्ध रहने के बावजूद उनके डिजिटल हस्ताक्षर से 16 बार सरकारी धन का लेन-देन हुआ। विधायक बेहड़ ने प्रेस वार्ता में लगभग 10,39,585 रुपये की निकासी का दावा किया था। एडीओ पंचायत द्वारा जिला जेल पौड़ी से पत्राचार कर प्रधान के जेल में होने की पुष्टि के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि आखिर ब्लॉक और पंचायत स्तर पर निगरानी तंत्र क्या कर रहा था?
ग्राम विकास अधिकारी एके मेलकानी की भूमिका पर भी प्रथम दृष्टया संदेह जताया गया है। सीडीओ देवेश शाशनी के अनुसार रिपोर्ट परीक्षणाधीन है और दोषी पाए जाने पर शीघ्र कार्रवाई की जाएगी।
यहां प्रश्न केवल एक प्रधान या एक अधिकारी का नहीं, बल्कि उस तंत्र का है जो डिजिटल हस्ताक्षर और वित्तीय स्वीकृतियों की निगरानी का दावा करता है। यदि प्रधान जेल में थीं, तो उनके अधिकृत हस्ताक्षर कैसे सक्रिय रहे? क्या सिस्टम में कोई ऑटो-फ्लैग तंत्र नहीं है?
बीमारी का पत्र या साजिश की पटकथा?
दो फरवरी को जारी वह पत्र भी जांच के घेरे में है, जिसमें प्रधान के पैर में फ्रैक्चर बताकर उनके पति गफ्फार खान को प्रतिनिधि के रूप में कार्यभार सौंपने की बात कही गई थी। यदि उस समय प्रधान जेल में थीं, तो यह पत्र किसने तैयार किया? किसने हस्ताक्षर सत्यापित किए? और किस प्रशासनिक स्तर पर इसे स्वीकार किया गया?
यह केवल दस्तावेजी हेरफेर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ छल है। ग्राम पंचायत की स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं कि वह जवाबदेही से मुक्त हो जाए।
हथियार सप्लाई का साया
मामले को और संवेदनशील बनाता है वह एंगल, जिसमें प्रधान के पति गफ्फार खान का नाम असलहा तस्करी से जुड़े प्रकरण में सामने आया। बहेड़ी में पकड़े गए तस्करों द्वारा पुलिस पूछताछ में दिए गए कथित बयान ने इस मामले को पंचायत घोटाले से आगे बढ़ाकर कानून-व्यवस्था के दायरे में ला खड़ा किया है।
यदि किसी जनप्रतिनिधि के परिवार का नाम आपराधिक गतिविधियों से जुड़ता है और उसी दौरान पंचायत निधि के दुरुपयोग की आशंका भी उठती है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है।
प्रशासन की परीक्षा
जिलाधिकारी के पाले में अब गेंद है। एडीओ पंचायत की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद कार्रवाई की उम्मीदें बढ़ी हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि पंचायत स्तर पर निगरानी व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं।
यदि एक ग्राम प्रधान के जेल में होने की सूचना महीनों तक प्रशासनिक अभिलेखों में दर्ज नहीं होती, तो यह महज “चूक” नहीं कही जा सकती। यह या तो जानबूझकर की गई चुप्पी है या फिर सिस्टम की गहरी कमजोरी।
राजनीति बनाम पारदर्शिता
विधायक तिलक राज बेहड़ ने इस मुद्दे को आक्रामक तरीके से उठाया है और धरने की चेतावनी भी दी है। सवाल यह है कि क्या यह राजनीतिक संघर्ष है या वास्तव में पारदर्शिता की लड़ाई? जवाब कार्रवाई से ही मिलेगा।
यदि दोषियों पर कठोर कार्रवाई होती है, तो यह संदेश जाएगा कि शासन व्यवस्था किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार या मिलीभगत को बर्दाश्त नहीं करेगी। लेकिन यदि मामला ठंडे बस्ते में गया, तो यह पंचायत लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करेगा।
दरऊ प्रकरण अब एक ग्राम पंचायत की सीमा से बाहर निकल चुका है। यह उस भरोसे की परीक्षा है, जिस पर ग्रामीण भारत की लोकतांत्रिक संरचना टिकी है। प्रशासन को न केवल दोषियों को चिन्हित करना होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि या अधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर और वित्तीय प्रक्रियाओं का दुरुपयोग न कर सके।
सवाल अब केवल “कौन दोषी” का नहीं, बल्कि “सिस्टम कितना ईमानदार” है।


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