अंकिता की चीख, सत्ता की चुप्पी और वीआईपी का साया: उत्तराखंड की अस्मिता के कठघरे में राजसत्ता”

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उत्तराखंड की शांत वादियों में गूंजने वाली एक बेटी की चीख आज भी सत्ता के गलियारों में अनसुनी है। अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक जघन्य अपराध नहीं, बल्कि यह उस राजनीतिक-सामाजिक तंत्र का आईना है, जिसमें सत्ता, संरक्षण और प्रभाव के आगे एक साधारण पहाड़ी बेटी की जान तुच्छ साबित कर दी गई। यह मामला अब केवल न्यायिक प्रक्रिया का विषय नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड राज्य की आत्मा, अस्मिता और नैतिकता की परीक्षा बन चुका है।
अंकिता: एक नाम नहीं, एक प्रश्न
अंकिता भंडारी पहाड़ की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जो सीमित संसाधनों, संघर्ष और सपनों के सहारे जीवन की राह चुनती है। वह किसी वीआईपी की बेटी नहीं थी, न ही किसी सत्ता संरक्षित परिवार से आती थी। लेकिन शायद यही उसकी सबसे बड़ी “गलती” थी।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


उसकी हत्या ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या उत्तराखंड में न्याय भी वर्ग, रसूख और पार्टी कार्ड देखकर मिलता है?
बुलडोज़र से रौंदी गई सच्चाई
इस हत्याकांड की जांच की शुरुआत से ही सवालों के घेरे में रही। जिस वनंतरा रिसॉर्ट में यह अपराध हुआ, उसे साक्ष्य संकलन से पहले बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया।
यह कार्रवाई क्या केवल प्रशासनिक तत्परता थी या फिर सच को मिटाने की जल्दबाज़ी?
जब अपराध स्थल ही मिटा दिया जाए, तो जांच किस आधार पर निष्पक्ष कही जा सकती है?
यही वह बिंदु है जहां सरकार की नीयत पर संदेह गहराता है। यदि सब कुछ साफ था, तो सबूतों को संरक्षित क्यों नहीं किया गया?
विधायक तिलक राज बेहड: सत्ता से सवाल करने की हिम्मत
किच्छा विधायक तिलक राज बेहड ने इस मामले में जो आवाज उठाई, वह केवल विपक्षी राजनीति नहीं, बल्कि लोकतंत्र में ज़िंदा अंतरात्मा की आवाज है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अंकिता को न्याय दिलाना केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की बेटियों के सम्मान और सुरक्षा का प्रश्न है।
उनका यह कहना कि “अगर सरकार और जांच एजेंसियों के पास छिपाने को कुछ नहीं है, तो सीबीआई जांच से डर क्यों?”—सत्ता के चेहरे से नकाब खींचने जैसा है।
यह सवाल आज हर पहाड़ी मां, हर बेटी और हर जागरूक नागरिक पूछ रहा है।
उर्मिला सनावर के खुलासे: तूफान की दस्तक
अभिनेत्री उर्मिला सनावर द्वारा दिए गए बयान और वायरल वीडियो इस पूरे प्रकरण को एक नए मोड़ पर ले आए हैं।
उन्होंने जिस तरह से भाजपा के एक कद्दावर नेता—गट्टू उर्फ दुष्यंत कुमार गौतम, राष्ट्रीय महासचिव (BJP)—का नाम सार्वजनिक किया, उसने सत्ता की नींव हिला दी है।
यह कोई साधारण आरोप नहीं हैं।
ये वे आरोप हैं, जिनमें कहा जा रहा है कि हत्या की रात या अगले दिन वनंतरा रिसॉर्ट में केवल एक नहीं, बल्कि कई वीआईपी मौजूद थे।
यदि यह सच है, तो सवाल यह नहीं कि “वीआईपी कौन था?”
सवाल यह है कि “वीआईपी होने का लाइसेंस किसने दिया?”
सत्ता संरक्षित मौन और बयानबाज़ी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे भयावह है—सत्ता की चुप्पी।
सरकार की ओर से न तो स्पष्ट खंडन, न ठोस कार्रवाई, न ही पारदर्शी पहल।
जब विपक्ष सवाल उठाता है, तो उसे “राजनीतिक लाभ” का आरोप झेलना पड़ता है।
लेकिन क्या एक मरी हुई बेटी की लाश पर राजनीति करना बड़ा अपराध है, या उस लाश पर पर्दा डालना?
विडंबना यह है कि भाजपा के भीतर से भी स्वर उठने लगे हैं। सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा गहन जांच की बात कहना इस बात का संकेत है कि मामला केवल विपक्ष बनाम सत्ता का नहीं, बल्कि सत्य बनाम सत्ता का हो चला है।
एसआईटी या सीबीआई: सवाल भरोसे का
सरकार बार-बार एसआईटी जांच का हवाला देती है, लेकिन जनता का भरोसा टूट चुका है।
एसआईटी उन हाथों में है, जिन पर सत्ता का दबाव होने का आरोप लगता रहा है।
सीबीआई जांच की मांग इसलिए नहीं उठ रही कि विपक्ष को आंदोलन चाहिए, बल्कि इसलिए कि जनता को सच्चाई चाहिए।
सच्चाई, जो केवल निचले कर्मचारियों या छोटे आरोपियों तक सीमित न रहे, बल्कि उन चेहरों तक पहुंचे जो पर्दे के पीछे बैठकर खेल खेलते हैं।
अंकिता की मां: न्याय की प्रतीक
इस पूरे शोर-शराबे के बीच अंकिता की मां सोनी देवी की पीड़ा सबसे बड़ी गवाही है।
उनकी मांग सरल है—सबूत अदालत में रखे जाएं, दोषियों को सजा मिले।
न उन्हें सत्ता चाहिए, न राजनीति—उन्हें सिर्फ न्याय चाहिए।
एक मां का यह सवाल पूरे सिस्टम पर भारी है:
“अगर मेरी बेटी दोषी नहीं थी, तो उसे मारा क्यों गया?”
उत्तराखंड की अस्मिता का सवाल
अंकिता भंडारी हत्याकांड अब किसी एक जिले, एक पार्टी या एक सरकार का मामला नहीं रहा।
यह उत्तराखंड राज्य की अस्मिता से जुड़ गया है।
यह वही राज्य है, जिसने बेटियों की शिक्षा, सम्मान और सुरक्षा को अपनी पहचान बताया।
आज वही राज्य एक बेटी के हत्यारों के सामने असहज नजर आ रहा है।
गूंगे-बहरे नेता और गुणाकार राजनीति
इस प्रकरण ने उन नेताओं की भी पोल खोल दी है, जो हर मंच पर “बेटी बचाओ” के नारे लगाते हैं, लेकिन जब बेटी सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक देती है, तो वे गूंगे-बहरे बन जाते हैं।
यह “गुणाकार नेता” हैं—जो सत्ता से गुणा होते हैं और संवेदना से भाग देते हैं।
इनके लिए न्याय एक भाषण है, और बेटी एक पोस्टर।
आंदोलन की चेतावनी: लोकतंत्र की आखिरी सांस
कांग्रेस द्वारा प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी केवल राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता की आखिरी सांस है।
जब संस्थाएं चुप हो जाती हैं, तब सड़कें बोलती हैं।
यदि समय रहते निष्पक्ष सीबीआई जांच नहीं हुई, तो यह आंदोलन केवल कांग्रेस का नहीं रहेगा—यह हर उस नागरिक का आंदोलन होगा, जो अपनी बेटी को सुरक्षित देखना चाहता है।
प्रधानमंत्री से अपेक्षा
विधायक तिलक राज बेहड द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील एक संवैधानिक उम्मीद है।
देश के प्रधानमंत्री होने के नाते यह केवल उत्तराखंड का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की बेटियों का मामला है।
यदि इस प्रकरण में निष्पक्षता दिखाई गई, तो यह संदेश जाएगा कि सत्ता से बड़ा संविधान है।
और यदि नहीं—तो इतिहास इसे माफ नहीं करेगा।
निष्कर्ष: अंकिता की आत्मा जवाब मांगती है
अंकिता भंडारी की हत्या एक अपराध थी।
उस पर पर्दा डालना उससे भी बड़ा अपराध है।
आज सवाल यह नहीं कि कौन दोषी है,
सवाल यह है कि क्या हम सच के साथ खड़े होने का साहस रखते हैं?
यदि इस देश में वीआईपी कानून से ऊपर हैं, तो लोकतंत्र केवल कागज़ पर है।
और यदि एक पहाड़ी बेटी को न्याय नहीं मिल सकता, तो विकास के सारे दावे खोखले हैं।
अंकिता की आत्मा आज भी पूछ रही है—
“क्या मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैं ताकतवर नहीं थी?”
उत्तराखंड को इस सवाल का जवाब देना होगा।
और वह जवाब न्याय के अलावा कुछ नहीं हो सकता।


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