

जोत सिंह बिष्ट का दांव: अपनी गणना, अपने गांव
देहरादून।पहाड़ के सरोकारों के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखने वाले भाजपा नेता जोत सिंह बिष्ट ने “अपनी गणना, अपने गांव” अभियान की शुरुआत कर प्रवास में रह रहे पहाड़वासियों से अपनी जड़ों से पुनः जुड़ने का आह्वान किया है। वे लगातार लोगों से संवाद कर रहे हैं और उल्लेखनीय यह है कि उनकी बात को गंभीरता से सुना भी जा रहा है। इधर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया शुरू किए जाने से इस अभियान की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

पहाड़ से मैदान की ओर पलायन कोई नया विषय नहीं है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही पहाड़ की जवानी पानी की तरह मैदानों की ओर बहती रही है। उत्तराखंड के पृथक राज्य बनने के बाद यह प्रवृत्ति और तेज हुई। जिन गांवों में कभी सड़क नहीं थी, वहां लोग तमाम कठिनाइयों के बावजूद टिके रहे, लेकिन जैसे ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से सड़कें गांवों तक पहुंचीं, वही सड़कें लोगों को भी अपने साथ मैदानों तक ले आईं।
इसका सीधा असर राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ा। वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन में पहाड़ की आधा दर्जन विधानसभा सीटें कम हो गईं। जबकि उत्तराखंड का गठन ही इस आधार पर हुआ था कि यहां की भौगोलिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल हैं और मैदानी मानकों के आधार पर पहाड़ की आकांक्षाओं की पूर्ति संभव नहीं है। ऐसे में अपेक्षा थी कि परिसीमन में पूर्वोत्तर राज्यों की भांति भौगोलिक क्षेत्रफल को भी आधार बनाया जाएगा, लेकिन न परिसीमन आयोग ने इस तथ्य को पर्याप्त महत्व दिया और न ही समाज की ओर से कोई संगठित प्रतिरोध सामने आया।
अब वर्ष 2027 में प्रस्तावित जनगणना के बाद नए सिरे से परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होगी। यदि एक बार फिर केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया, तो पर्वतीय क्षेत्रों की विधानसभा सीटें और घट सकती हैं। यही वह बिंदु है जहां जोत सिंह बिष्ट की चिंता मुखर होती है। वे गांव-गांव जाकर पहाड़वासियों को “धै” लगा रहे हैं कि भले ही रोज़गार या शिक्षा के लिए मैदान में रहना मजबूरी हो, लेकिन मतदाता पंजीकरण अपने मूल गांव में ही कराया जाए।
जोत सिंह बिष्ट आंकड़ों के साथ अपनी बात रखते हैं। वे बताते हैं कि 1971 की जनगणना के आधार पर उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में से नौ पर्वतीय जिलों को 40 और मैदानी क्षेत्रों को 30 सीटें मिली थीं। लेकिन 2001 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2006 में हुए परिसीमन में पर्वतीय सीटें घटकर 34 रह गईं, जबकि मैदानी सीटें बढ़कर 36 हो गईं। यदि 2027 के बाद परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो पहाड़ की सीटें 34 से घटकर लगभग 25 रह जाएंगी और मैदान की सीटें 45 तक पहुंच सकती हैं।
यह स्थिति केवल राजनीतिक असंतुलन नहीं, बल्कि पर्वतीय राज्य की मूल अवधारणा पर ही प्रश्नचिह्न लगा देगी। पहाड़ का प्रतिनिधित्व घटने का अर्थ है सीमावर्ती क्षेत्रों की आवाज़ का कमजोर होना। उत्तराखंड दो देशों की सीमाओं से सटा हुआ राज्य है और देश की दूसरी रक्षा पंक्ति भी है। ऐसे में सीमावर्ती पहाड़ों से जनप्रतिनिधित्व का कमजोर होना राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी गंभीर चिंता का विषय है।
इसी खतरे को देखते हुए “अपनी गणना, अपने गांव” अभियान शुरू किया गया है। यह चिंता केवल जोत सिंह बिष्ट की नहीं, बल्कि समूचे पर्वतीय समाज की साझा पीड़ा है। फर्क बस इतना है कि जहां अधिकांश लोग राजनीतिक सीमाओं में बंधकर चुप हैं, वहीं जोत सिंह बिष्ट ने बिना किसी राजनीतिक संकोच के यह साहसिक पहल की है।
यह अभियान न तो किसी निजी स्वार्थ से प्रेरित है और न ही किसी तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए। इसका उद्देश्य दूरगामी है—पहाड़ के अस्तित्व, अस्मिता और भविष्य की रक्षा। इस अभियान से डॉ. आर.पी. रतूड़ी, मथुरा दत्त जोशी, वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत, शीशपाल गुसाईं, पुष्कर सिंह नेगी सहित अनेक बुद्धिजीवी और समाजसेवी जुड़े हैं।
पूर्व में इगाश बग्वाल गांव में मनाने के आह्वान पर लोगों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी, लेकिन जब पर्व इगाश दिल्ली में मनाया गया, तो कई लोगों को आत्मग्लानि भी हुई। इस दृष्टि से देखा जाए तो जोत सिंह बिष्ट की अपील भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक और समयोचित है।
जोत सिंह बिष्ट स्पष्ट शब्दों में कहते हैं—
“उत्तराखंड तभी सच्चे अर्थों में मजबूत और समृद्ध बनेगा, जब उसका पहाड़ मजबूत होगा। यदि पहाड़ कमजोर रहा, तो पूरा राज्य कमजोर रहेगा। यह लड़ाई पहाड़ के स्वाभिमान, अस्तित्व और भविष्य की है।”
वास्तव में, “अपनी गणना, अपने गांव” अभियान पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षों से पनप रही असंतुलन की भावना को स्वर देता है और उत्तराखंड की राजनीति में एक नए सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन की आहट भी देता है। अब यह पहाड़वासियों पर निर्भर करता है कि वे इस पुकार को अनसुना करते हैं या अपने भविष्य की गणना स्वयं अपने गांव से लिखते हैं।




