इलाज मांगा… मौत मिली! तीन महीने में तीसरी गर्भवती ने दम तोड़ा — रजत जयंती मना रहे उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था कटघरे में

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टिहरी जिले के घनसाली क्षेत्र में स्वास्थ्य-व्यवस्था की बदहाली ने एक और जिंदगी छीन ली। मंगलवार को भिलंगना ब्लॉक के श्रीकोट गांव की आठ माह की गर्भवती नीतू पंवार (24) की एंबुलेंस में ही मौत हो गई। बेलेश्वर अस्पताल से रेफर किए जाने के बाद करीब ढाई घंटे की यात्रा के दौरान फकोट पहुँचते-पहुँचते उसने दम तोड़ दिया। तीन महीनों में घनसाली की यह तीसरी गर्भवती मौत है — और हर मौत के साथ सरकार के स्वास्थ्य-दावों का मुखौटा लॉकडाउन के मास्क की तरह गिरता जा रहा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

बड़ी विडंबना यह है कि इलाज के लिए रेफर होना मतलब पहाड़ में “मौत के सफर” पर जाना — ज़िंदा अस्पताल पहुँचने तक कोई गारंटी नहीं।


तीन ताबूत… तीन सपने… तीन घर उजड़े

22, 23 और 24 — यह उम्र शादी के सपनों और नई जिंदगी का स्वागत करने की होती है, लेकिन भिलंगना में इन उम्रों ने मौत का मातम देखा।
पहले 22 वर्ष की रवीना कठैत, फिर 23 वर्षीय अनीशा रावत और अब 24 वर्ष की नीतू पंवार… तीनों गर्भवती थीं, तीनों मातृत्व के सपने देख रही थीं, और तीनों अस्पताल की दहलीज तक भी नहीं पहुँच सकीं।

नई किलकारियों का इंतज़ार कर रहे तीन घर अब सन्नाटे में डूबे हैं। यही पहाड़ की सच्चाई है — जहां बच्चा पैदा होना भी दांव का खेल बन चुका है।


“बहू नहीं रही” — पर बेटे को फोन भी नहीं किया गया

नीतू पंवार के ससुर सोबन सिंह की आंखें नम हैं, आवाज़ टूट चुकी है।
उन्होंने बताया — “कुछ दिनों बाद घर में खुशी आने वाली थी। बेटा विदेश में है, नाती-नातिन की खबर सुनने का इंतज़ार कर रहा था… लेकिन हमने अपनी बहू खो दी। बेटे को बताने की हिम्मत नहीं है। वो खुशी लेने आता… अब मातम में आएगा।”

यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं — यह उन सभी पहाड़ी घरों का दर्द है, जहां स्वास्थ्य-सुविधाओं की कमी घर की महिलाएं, बेटियां और बहुएं चुकाती हैं।


रेफर की राजनीति — इलाज नहीं, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का शॉर्टकट

सीएचसी बेलेश्वर के चिकित्सा प्रभारी का बयान है — “रक्तचाप बढ़ा हुआ था, जांच नियमित नहीं हुई थी इसलिए रेफर किया गया।”

पर सवाल यह है —
🔹 जांच कराने की जिम्मेदारी मरीज पर है या स्वास्थ्य प्रणाली पर?
🔹 नियमित जांच क्यों नहीं हुई?
🔹 बेलेश्वर अस्पताल में ऐसी क्या कमी थी जो गंभीर गर्भवती को संभाला नहीं जा सका?
🔹 रेफर करने के बाद एंबुलेंस व्यवस्था और रास्ते में इमरजेंसी सपोर्ट कहाँ था?

“रेफर” अब इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से छुटकारा बन चुका है।


रजत जयंती का जश्न… और पहाड़ की महिलाओं की कब्रगाह

उत्तराखंड राज्य गठन के 25 साल पूरे होने पर शासन-प्रशासन “रजत जयंती” मना रहा है — पर स्वास्थ्य-व्यवस्था की यह तस्वीर शर्म से जमीन गाड़ देने वाली है। पहाड़ में 25 साल बाद भी:

⚠ सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं
⚠ प्रसूति-आपातकाल के लिए ICU नहीं
⚠ ब्लड-स्टोरेज यूनिट नहीं
⚠ हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की मॉनिटरिंग नहीं
⚠ एंबुलेंस में इमरजेंसी केयर नहीं

क्या यह चिकित्सा व्यवस्था है, या “उम्मीद से भरी मांओं को मौत के हवाले करने की सरकारी मशीनरी”?


कब तक महिलाएं ही ‘बलिदान’ देंगी?

स्वराज्य और विकास का मतलब सिर्फ सड़कें, चौराहे और उद्घाटन नहीं होता।
स्वराज्य का असली मतलब है — सुरक्षित नागरिक — और सबसे पहले सुरक्षित माँ।

पहाड़ की गर्भवती महिलाओं की मौतें “दुर्भाग्य” नहीं, बल्कि नीति-विफलता, शासन की प्राथमिकताओं की मौत, और लापरवाह अधिकारियों की लापरवाही का परिणाम हैं।

अब समय आ गया है कि —

❗ लापरवाही के मामलों में सिर्फ नोटिस नहीं — आपराधिक मुकदमा दर्ज हो

❗ मेडिकल अधिकारियों की जवाबदेही तय हो

❗ रेफरल प्रणाली की समीक्षा हो — “रेफर का मतलब मौत” नहीं होना चाहिए

❗ पहाड़ी ब्लॉकों में प्रसूति ICU, ब्लड बैंक और विशेषज्ञों की तैनाती अनिवार्य हो

❗ मातृ मृत्यु की हर घटना की हाई-लेवल जांच हो — रिपोर्ट दफ्तरों में नहीं, जनता में आए


अंत में — यह हमारी लड़ाई है

आज नीतू गई है। कल कौन?
किसकी बहू? किसकी बेटी? किसकी पत्नी?

अगर पहाड़ की महिलाओं के साथ ऐसा ही होता रहा, तो आने वाले वर्षों में मातृ-स्वास्थ्य असफलता उत्तराखंड का सबसे बड़ा मानव त्रासदी अध्याय बन सकती है।

इसलिए सवाल हम उठाएंगे, आवाज़ हम बुलंद करेंगे — ताकि शासन-प्रशासन की ऊंघती संवेदनाएं जागें और “इलाज मांगा तो मौत मिली” जैसी सुर्खियाँ हमारा भविष्य न बनें।



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