सियासी चाय पार्टी से गिरी अटल सरकार, एक वोट ने बदली देश की राजनीति

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रुद्रपुर से भारतीय राजनीति के इतिहास में 17 अप्रैल 1999 का दिन आज भी सबसे नाटकीय घटनाओं में गिना जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली 13 महीने पुरानी एनडीए सरकार लोकसभा में विश्वास मत के दौरान महज एक वोट से गिर गई थी। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा पूर्व पीएम के मीडिया सलाहकार रहे अशोक टंडन ने अपनी किताब ‘अटल संस्मरण’ में उजागर किया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

टंडन के मुताबिक, 1999 में वाजपेयी सरकार के पतन की नींव एक चाय पार्टी में पड़ी थी। 29 मार्च 1999 को बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा आयोजित इस चाय पार्टी में एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पहली बार आमने-सामने आई थीं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसी मुलाकात में सरकार को गिराने पर सहमति बनी।

14 अप्रैल 1999 को जयललिता ने तमिल नववर्ष के दिन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन से मुलाकात कर एनडीए सरकार से समर्थन वापस लेने का पत्र सौंप दिया। इसके बाद राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री वाजपेयी को संसद में बहुमत साबित करने को कहा। हालांकि, वोटिंग से ठीक पहले बसपा प्रमुख मायावती ने अपना रुख बदलते हुए सरकार के खिलाफ मतदान का ऐलान कर दिया, जिससे सत्ता का पलड़ा विपक्ष की ओर झुक गया।

इतना ही नहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता सैफुद्दीन सोज और तत्कालीन ओडिशा मुख्यमंत्री गिरधर गमांग के सरकार के खिलाफ मतदान ने भी वाजपेयी सरकार को बड़ा झटका दिया। यदि गमांग वोट न देते तो सदन में बराबरी की स्थिति बनती और स्पीकर का निर्णायक वोट सरकार के पक्ष में जाता।

सरकार गिरने के बाद राजनीतिक गलियारों में तीसरे मोर्चे की चर्चाएं तेज हो गईं। पूर्व प्रधानमंत्री आई. के. गुजराल ने अपनी आत्मकथा में खुलासा किया है कि सीपीएम नेता हरकिशन सिंह सुरजीत का असली दांव पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का था। हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अंततः किसी भी वैकल्पिक सरकार को समर्थन देने से इनकार कर दिया।

नतीजतन, लोकसभा भंग कर दी गई और देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा। वाजपेयी कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे और बाद में कारगिल युद्ध के बाद हुए चुनावों में भारी जनसमर्थन के साथ फिर सत्ता में लौटे। इस तरह एक चाय पार्टी और एक वोट ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।


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