

रुद्रपुर ,उत्तराखंड के युवा और आम जनता आखिर कब तक लुटते रहेंगे?”

“बाहरियों की नियुक्ति – युवा ठगा, सरकारी दफ्तर गुंडागर्दी का अखाड़ा”
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
उत्तराखंड में नौकरी की जिम्मेदारी किन पर है और फायदा किसे मिल रहा है — ये सवाल आज हर बेरोजगार के गले में फंसी चीख बन चुका है। सरकारी दफ्तरों में नियुक्तियाँ तो हो रही हैं, लेकिन नौकरी बाहरी राज्यों के लोगों को, और ठगा हुआ उत्तराखंड का युवा!
कांग्रेस हो या भाजपा — दोनों ने रोजगार के नाम पर गाल बजाए, पर कुर्सी मिलते ही बैकडोर नियुक्तियों की दुकान खोल दी।
सबसे ताज़ा और बदनाम उदाहरण — रुद्रपुर RTO ऑफिस।
यह दफ्तर अब सरकारी कम और गुंडों का अड्डा ज़्यादा लगने लगा है।
“फिटनेस” के नाम पर लूट का इतना बड़ा खेल चल रहा है कि बिना चढ़ावा गाड़ी फिट नहीं, और बिना पहचान सवाल नहीं।
खास बात यह कि
जो लोग फिटनेस सेंटरों में नियुक्त किए गए हैं,
न योग्य हैं, न स्थानीय — पर दबंगई में पूरा माहिर।
बोलचाल भी सरकारी अफसरों वाली नहीं, सड़क छाप लठैती वाली।
किसी ने आवाज़ उठाई तो बाउंसर गिरोह सीधा उतर आता है —
धमकी, धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और मारपीट तक।
लोग कहते हैं कि खेल सिर्फ रुद्रपुर तक नहीं, लखनऊ तक तार जुड़े हुए हैं, और यह धंधा उन सभी राज्यों में फल-फूल रहा है जहाँ भाजपा की सरकार है।
मतलब नीचे वसूली, ऊपर हिस्सेदारी — और बीच में कानून कागज़ों में कैद।
सबसे बड़ा दर्द —
उत्तराखंड का बेरोजगार युवक नौकरी का इंतज़ार कर रहा है,
और नौकरी के पद बाहरी राज्यों के लोगों से भर दिए जा रहे हैं।
यदि सरकार ने समय रहते इन बाहरी नियुक्तियों, इस फिटनेस माफिया और सरकारी दफ्तरों में फैले बाहुबल तंत्र पर अंकुश नहीं लगाया —
तो सिर्फ गाड़ियाँ ही नहीं, पूरा सिस्टम नॉन-फिट हो जाएगा।
उत्तराखंड जिस सपने के साथ राज्य बना था — पारदर्शिता, न्यायसंगत अवसर, बेरोज़गार युवाओं के लिए सम्मानजनक भविष्य — वह सपना आज खोखला साबित होता दिख रहा है। राज्य के बेरोज़गार युवा वर्षों से तैयारी कर रहे हैं, नियुक्तियों का इंतज़ार कर रहे हैं, और दूसरी ओर सरकार व उसके विभाग आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से बैकडोर नियुक्तियों का खेल खेल रहे हैं। नियमों को ताक पर रखकर कुछ लोगों को रोज़गार और बाकी को बेरोज़गारी का दर्द सौंप दिया गया है।
शुक्रवार को देहरादून प्रेस क्लब में उत्तराखंड बेरोज़गार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल ने जो तथ्य देश के सामने रखे, वह सिर्फ बयान नहीं बल्कि सरकारी तंत्र पर गंभीर आरोप हैं। संघ का आरोप है कि उपनल, पीआरडी और अन्य आउटसोर्सिंग एजेंसियाँ सरकार की ढाल बनकर बैकडोर नियुक्तियों का जरिए बन गई हैं — बिना विज्ञापन, बिना प्रतियोगी परीक्षा, बिना पारदर्शिता, बिना मेरिट।
यह सिर्फ नौजवानों के साथ अन्याय नहीं, बल्कि भारत के संविधान — विशेषकर अनुच्छेद 14 और 16 — का खुला उल्लंघन है।
और इससे भी बड़ा सवाल —
क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मज़ाक उड़ाना यही लोकतंत्र है?
2006 में उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में संविधान पीठ ने साफ़ कहा था कि सरकारी विभागों में अनियमित, अस्थायी या बैकडोर नियुक्तियों को नियमित करना संविधान के अनुरूप नहीं है।
फिर उत्तराखंड सरकार किस कानून के अंतर्गत इन्हें जारी रखे हुए है?
लेकिन भ्रष्टाचार यहीं खत्म नहीं होता —
अगर नियुक्तियों में अन्याय से युवाओं का भविष्य छीना जा रहा है तो सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार आम नागरिक की कमर तोड़ रहा है।
रुद्रपुर RTO ऑफिस इसका सबसे जीवंत प्रमाण है।
जिस विभाग का नाम सुनकर ईमानदारी का भाव आना चाहिए, वहाँ आज “अनुमति प्रैक्टिस” और “फिटनेस माफिया” का साम्राज्य चल रहा है।
जानकारी के अनुसार—
गाड़ियों की फिटनेस पास कराने के नाम पर 3000 से 20000 रुपये तक की वसूली खुलेआम की जा रही है।
जो रकम दी जाए, गाड़ी फिट।
रकम न दो, तो चलती गाड़ी भी रिजेक्ट।
ताज़ा मामला इस भ्रष्टाचार की जड़ को नंगा कर देता है —
एक प्रिंट मीडिया के संपादक अपनी गाड़ी फिटनेस कराने पहुंचे, गाड़ी पूरी तरह फिट थी, दस्तावेज़ों में सब सही।
लेकिन उन्होंने “अपना परिचय” नहीं दिया,
पैसे नहीं दिए…
तो गाड़ी रिजेक्ट।
और वही लाइन में खड़ी कंडम, डगमगाती, धुंआ उड़ाती गाड़ियाँ,
जिनका सड़क पर चलना ही अपराध है,
रकम आते ही फिट घोषित — तुरंत पास!
अगर यह सिस्टम नहीं, खुला वसूली रैकेट है — तो और क्या है?
जब लोगों ने सवाल पूछा कि इतनी मोटी रकम कहाँ जाती है, तो जवाब मिला —
“ऊपर तक जाती है… सत्ता के शिखर तक।”
क्या यह संकेत भर काफी नहीं कि सिस्टम सड़ चुका है?
जहाँ रिश्वत का प्रवाह नीचे से ऊपर और आदेशों का प्रवाह ऊपर से नीचे चल रहा हो, वहाँ आम जनता का न्याय किस डिब्बे में बंद है?
असली नुकसान किसका हो रहा है?
बेरोजगार युवाओं का — जिन्हें सरकारी नौकरी के नाम पर इंतज़ार और अन्याय मिला।
आम नागरिक का — जिसकी खून-पसीने की कमाई RTO के दलाल सिस्टम में डूब रही है।
✔ सड़क सुरक्षा का — क्योंकि फिटनेस के नाम पर अनफिट गाड़ियाँ “पैसों के दम पर” सड़कों पर दौड़ रही हैं, दुर्घटनाओं को न्योता देती हुई।
✔ कानून और संविधान का — जिसे सरकारी विभागों ने अपनी जेब की किताब समझ लिया है।
सबूत, रिपोर्टें और मीडिया की खबरें — सब कुछ मौन तोड़ रहे हैं
रुद्रपुर RTO ऑफिस की वसूली के संबंध में— • पुरानी रिपोर्टें
- जन शिकायतें
- मीडिया कवरेज
- वाहन मालिकों के बयान
सब कुछ मौजूद है।
फिर भी सिस्टम जस का तस —
क्यों?
क्योंकि खाने वाले केवल भीतर नहीं बैठे… ऊपर भी बैठे हैं।
और सरकार?
एक ओर
बेरोज़गार युवाओं को आश्वासन
“भर्ती आएगी… आएगी… जल्द आएगी…”
दूसरी ओर
शांतिपूर्वक जारी बैकडोर नियुक्तियाँ
आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से।
एक ओर
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की घोषणाएँ
दूसरी ओर
RTO में फिटनेस के नाम पर खुला बाजार।
यही क्या राज्य बनने का सपना था?
अब सवाल जनता का — समाधान कौन देगा?
उत्तराखंड बेरोजगार संघ ने जो मांगे रखी हैं, वे अत्यंत तार्किक हैं—
सभी बैकडोर नियुक्तियों पर तत्काल रोक
रिक्त पदों पर UKSSSC और UKPSC के माध्यम से नियमित भर्ती
आउटसोर्सिंग सिस्टम की तत्काल समीक्षा / जांच
और परिवहन विभाग के संदर्भ में—
रुद्रपुर RTO ऑफिस में वसूली की हाई-लेवल जांच
फिटनेस प्रक्रिया का CCTV और ऑनलाइन मॉनिटरिंग के तहत डिजिटलीकरण
🔹 दलाल तंत्र पर सीधी कार्यवाही — केवल खानापूर्ति नहीं
असुरक्षित गाड़ियों का फिटनेस तुरंत रद्द — चाहे पैसे या पहचान कुछ भी हो
अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी —
राज्य इसलिए बना था कि बच्चे पढ़ें और नौकरी दलालों की गोद में जाए?
क्या संविधान किताबों के लिए है और नियुक्तियाँ सिफारिशों के लिए?
✖ क्या RTO सड़क सुरक्षा का दफ्तर है या वसूली का कलेक्शन सेंटर?
उत्तराखंड का युवा आज निराश है,
सिस्टम आज बेपरवाह है,
और सत्ता आज आत्ममुग्ध है।
लेकिन यह भी सत्य है —
जब अन्याय नीति बन जाए, तब प्रतिरोध कर्तव्य बन जाता है।
समय आ गया है कि— युवा, नागरिक, मीडिया, सामाजिक संगठन —
सब एक स्वर में कहें —
नियुक्तियों में पारदर्शिता चाहिए
RTO और हर विभाग में शुचिता चाहिए
कानून का शासन चाहिए — दलालों का नहीं
यदि यह आवाज़ नहीं उठी,
तो कल इतिहास लिखेगा
“उत्तराखंड को भ्रष्टाचार ने नहीं खाया…
बल्कि लोगों की चुप्पी ने लील लिया।”




