

रुद्रपुर उत्तराखंड राजस्थान की कपड़ा नगरी भीलवाड़ा, जिसे एशिया का मैनचेस्टर कहा जाता है, इस समय एक अभूतपूर्व औद्योगिक संकट से गुजर रही है। करीब 80 से 90 हजार करोड़ रुपये के टेक्सटाइल कारोबार पर गहराता संकट देश की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकेत दे रहा है। ईरान-इजरायल युद्ध के चलते कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित हुई है, रेड सी मार्ग महंगा हुआ है और गैस संकट ने उत्पादन की रफ्तार को धीमा कर दिया है। करीब एक सदी पुरानी यह इंडस्ट्री पहली बार इतनी बड़ी चुनौती के सामने खड़ी दिखाई दे रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
भीलवाड़ा में उद्योगपतियों के पास सीमित कच्चा माल बचा है। पॉलिएस्टर फाइबर, केमिकल और गैस की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की जा रही है। यार्न की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक उछाल ने उत्पादन लागत को असामान्य स्तर तक पहुंचा दिया है। कपड़े की प्रति मीटर लागत में 12 से 14 रुपये की बढ़ोतरी उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कमजोर कर रही है।
गैस की कमी ने संकट को और गहरा बना दिया है। भीलवाड़ा के साथ पाली, बालोतरा और बाड़मेर के प्रोसेस हाउस संचालन बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई इकाइयों का उत्पादन रुक चुका है और बड़ी संख्या में वीविंग यूनिट्स पर बंद होने का खतरा मंडरा रहा है।
यह स्थिति केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्रों—रुद्रपुर, हरिद्वार और सितारगंज—तक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। SIDCUL आधारित औद्योगिक ढांचा देश की सप्लाई चेन का अहम हिस्सा है, जहां अनेक उद्योग टेक्सटाइल और उससे जुड़े कच्चे माल पर निर्भर हैं।
उत्तराखंड में कार्यरत इंडो रामा सिंथेटिक्स इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियां पॉलिएस्टर उत्पादन से जुड़ी हैं, जबकि आईटीसी लिमिटेड और हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड जैसे बड़े औद्योगिक समूह पैकेजिंग और फैब्रिक आधारित संसाधनों पर निर्भर हैं। कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर इन उद्योगों की लागत पर पड़ रहा है।
रेड सी मार्ग के महंगा होने से कंटेनर फ्रेट में 2 से 2.5 गुना वृद्धि दर्ज की गई है। इससे आयातित केमिकल और सिंथेटिक फाइबर की आपूर्ति प्रभावित हुई है। उत्पादन की योजना बाधित हो रही है और कई इकाइयों में कच्चे माल का स्टॉक तेजी से घट रहा है।
इस संकट का सबसे संवेदनशील पहलू रोजगार से जुड़ा है। राजस्थान में लाखों लोग टेक्सटाइल उद्योग पर निर्भर हैं। उत्तराखंड में भी हजारों श्रमिक औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत हैं। यदि स्थिति लंबी चली, तो उत्पादन में कटौती के साथ श्रमिकों की आय पर दबाव बढ़ना तय है।
निर्यात क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। मिडिल ईस्ट और यूरोप में बाजार अस्थिर है, जिससे ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं। भुगतान में देरी से उद्योगों की नकदी प्रवाह व्यवस्था कमजोर हो रही है। इसका प्रभाव उन छोटे और मध्यम उद्योगों पर अधिक पड़ रहा है, जो बड़े नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।
यह संकट भारत की औद्योगिक संरचना की एक बड़ी कमजोरी को उजागर करता है—कच्चे माल और वैश्विक आपूर्ति तंत्र पर अत्यधिक निर्भरता। जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अस्थिर होती हैं, तो इसका सीधा असर घरेलू उद्योगों पर पड़ता है।
उत्तराखंड के लिए यह समय सजगता का है। राज्य को अपनी औद्योगिक नीति में विविधता लाने की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर कच्चे माल के उत्पादन और वैकल्पिक संसाधनों के विकास पर ध्यान देना होगा। ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखना भी अत्यंत आवश्यक है, ताकि उद्योगों की निरंतरता बनी रहे।
सरकार के सामने चुनौती स्पष्ट है—उद्योगों को राहत देने के लिए त्वरित निर्णय आवश्यक हैं। गैस आपूर्ति सुनिश्चित करना, लॉजिस्टिक्स लागत को नियंत्रित करना और निर्यातकों को वित्तीय सहयोग देना समय की मांग है।
भीलवाड़ा का संकट एक संकेत है कि वैश्विक अस्थिरता का असर अब देश के हर औद्योगिक क्षेत्र तक पहुंच सकता है। उत्तराखंड जैसे उभरते औद्योगिक राज्यों के लिए यह स्थिति एक परीक्षा की घड़ी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए, तो इस संकट को अवसर में बदला जा सकता है और औद्योगिक आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाए जा सकते हैं।




