

भारत आज के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक ऐसा ढाल बना दिया गया है, जिसके पीछे छिपकर कुछ रचनाकार समाज की जड़ों पर प्रहार करने से भी नहीं चूकते। नेटफ्लिक्स जैसे वैश्विक मंच पर प्रस्तावित/प्रदर्शित फिल्म “घूसखोर पंडित” इसी मानसिकता का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह फिल्म न केवल एक पूरे समुदाय को अपमानित करती है, बल्कि रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर सामाजिक ज़िम्मेदारी से खुलेआम पलायन भी करती है।
प्रश्न यह नहीं कि घूसखोरी पर फिल्म क्यों बनी?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
प्रश्न यह है कि घूसखोरी को जाति से क्यों जोड़ा गया?
यदि विषय भ्रष्टाचार है, तो शीर्षक “घूसखोर अफ़सर”, “घूसखोर सिस्टम” या “घूस का तंत्र” भी हो सकता था। लेकिन जानबूझकर “पंडित” शब्द जोड़ना क्या दर्शाता है?
यह एक व्यक्ति-आधारित अपराध को जाति-आधारित कलंक में बदलने का प्रयास नहीं तो और क्या है?
शास्त्रों की दृष्टि में ‘पंडित’ कौन है?
भारतीय शास्त्रों में पंडित कोई उपनाम नहीं, बल्कि चरित्र और ज्ञान की उपाधि है।
“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।”
— हितोपदेश
अर्थात् विद्या से विनम्रता आती है, और वही व्यक्ति पंडित कहलाने योग्य होता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“पण्डिताः समदर्शिनः।” (गीता 5.18)
सच्चा पंडित वह है जो समदर्शी हो।
अब प्रश्न उठता है—
जो व्यक्ति घूसखोरी जैसे अधर्म में लिप्त हो, वह पंडित कैसे हो सकता है?
तो फिर “घूसखोर पंडित” शब्द स्वयं में ही एक शास्त्र-विरोधी, तर्क-विरोधी और नैतिक रूप से खोखला शीर्षक है।
ब्राह्मण समाज: मज़ाक का पात्र या सांस्कृतिक स्तंभ?
ब्राह्मण समाज ने इस देश को केवल कर्मकांड नहीं दिए—
वेदों की रक्षा की
उपनिषदों का चिंतन दिया
शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद तक राष्ट्रबोध जगाया
आज़ादी की लड़ाई में चंद्रशेखर आज़ाद, बाल गंगाधर तिलक जैसे क्रांतिकारी दिए
लेकिन विडंबना देखिए— आज वही समाज OTT प्लेटफॉर्म्स की सस्ती TRP राजनीति का सबसे आसान निशाना बन गया है।
क्या किसी फिल्म का नाम “घूसखोर मौलवी”, “घूसखोर पादरी” या “घूसखोर सिख” रखने का साहस कोई करेगा?
नहीं—क्योंकि तब उसे संवेदनशीलता, अल्पसंख्यक भावना और वैश्विक आलोचना याद आ जाएगी।
तो फिर ब्राह्मण समाज ही क्यों बार-बार “सेफ टारगेट” बनता है?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संविधान क्या कहता है?
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है,
लेकिन उसी संविधान का अनुच्छेद 19(2) कहता है—
यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और सामाजिक सौहार्द के अधीन है।
जब कोई फिल्म—
एक पूरे समाज को घूसखोर के रूप में चित्रित करे
जातिगत विद्वेष को बढ़ावा दे
सांस्कृतिक अपमान को मनोरंजन बना दे
तो वह अभिव्यक्ति नहीं, उत्तेजना बन जाती है।
नेटफ्लिक्स की चयनात्मक प्रगतिशीलता
नेटफ्लिक्स और उसके जैसे प्लेटफॉर्म्स खुद को लिबरल और प्रोग्रेसिव कहते हैं।
लेकिन उनकी प्रगतिशीलता अक्सर हिंदू प्रतीकों और ब्राह्मण पहचान तक ही सीमित क्यों रहती है?
मंदिर, साधु, पंडित—सब पर व्यंग्य “कला”
लेकिन अन्य धर्मों पर वही व्यंग्य “नफरत”
यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?
कटाक्ष: कहानी नहीं, कलंक बेचने का धंधा
“घूसखोर पंडित” कोई फिल्म नहीं,
यह कलंक की मार्केटिंग है।
यह उस दुकान की तरह है— जहाँ कहानी नहीं, जाति-विरोध बिकता है
जहाँ पटकथा नहीं, पूर्वाग्रह लिखा जाता है
जहाँ सिनेमा नहीं, सामाजिक ज़हर परोसा जाता है
ऐसी फिल्मों का उद्देश्य सुधार नहीं, सनसनी होता है।
सवाल उठाना नहीं, समाज को बांटना होता है।
फिल्म पर रोक क्यों ज़रूरी है?
जातिगत अपमान को वैधता मिलती है
ब्राह्मण समाज की गरिमा को ठेस पहुँचती है
भविष्य में और अधिक उग्र कंटेंट का रास्ता खुलता है
सामाजिक सौहार्द कमजोर होता है
आज यदि इस शीर्षक को स्वीकार कर लिया गया,
तो कल हर अपराध को किसी न किसी जाति से जोड़कर बेचा जाएगा।
निष्कर्ष: सिनेमा समाज का दर्पण हो, हथौड़ा नहीं
भारतीय सिनेमा का दायित्व है— समाज को सोचने पर मजबूर करना,
न कि उसे जातियों में बाँटकर एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना।
“घूसखोर पंडित” जैसे शीर्षक
न विचारोत्तेजक हैं,
न साहसी—
वे केवल सस्ते, सनसनीखेज़ और सामाजिक रूप से गैर-जिम्मेदार हैं।
इसलिए यह माँग न तो असहिष्णु है, न प्रतिगामी—
बल्कि संवैधानिक, शास्त्रीय और नैतिक रूप से पूर्णतः उचित है कि—
इस फिल्म के प्रदर्शन पर तत्काल रोक लगाई जाए,
और रचनाकारों को यह याद दिलाया जाए कि
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,
अपमान की स्वतंत्रता नहीं होती।
जिस देश में भ्रष्टाचार जाति नहीं देखता, वहां “घूसखोर” के आगे “पंडित” जोड़ देना केवल संयोग नहीं, बल्कि सोच का संकेत है। अगर मकसद सिस्टम की सड़ांध दिखाना था, तो नाम घूसखोर अफसर, घूसखोर बाबू या घूसखोर नेता भी हो सकता था। लेकिन आसान रास्ता वही चुना गया—जिससे सनसनी बने, TRP मिले और एक पूरे समाज को कटघरे में खड़ा किया जा सके।
ब्राह्मण समाज सदियों से ज्ञान, शिक्षा और संस्कार का वाहक रहा है, न कि घूसखोरी का प्रतीक। कुछ व्यक्तियों की गलतियों को जाति का टैग पहनाकर परोसना रचनात्मक साहस नहीं, बल्कि वैचारिक आलस्य है। सवाल यह भी है कि क्या ऐसी हिम्मत किसी और सामाजिक पहचान के साथ दिखाई जाती?
नीरज पांडे की मंशा चाहे जो रही हो, लेकिन नाम ही जब पूर्वाग्रह पैदा करे, तो माफी और कंटेंट हटाना नुकसान की भरपाई नहीं करता। भ्रष्टाचार पर प्रहार हो—पर व्यक्ति और व्यवस्था पर, किसी समाज की आस्था पर नहीं। यही ब्राह्मण समाज का साफ़ और तार्किक पक्ष है।




