रुद्रपुर में बदलती सियासत — “हिंदुत्व” की नई पटकथा और राजकुमार ठुकराल का प्रभाव

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रुद्रपुर की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। धार्मिक आयोजनों, राजनीतिक पुनर्संरचना और जनभावनाओं के संगम ने यहां एक नई बहस को जन्म दिया है—क्या “हिंदुत्व” अब केवल एक राजनीतिक दल की पहचान भर रह गया है, या यह एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति बन चुका है, जिसे कोई भी दल अपने तरीके से आत्मसात कर सकता है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल के हालिया राजनीतिक कदमों और उनके लगातार धार्मिक आयोजनों में बढ़ते हस्तक्षेप ने इस प्रश्न को और भी प्रासंगिक बना दिया है। रम्पुरा के कटोरी मंदिर में मां भगवती के विशाल जागरण से लेकर शिवपुर में अखंड महानाम संकीर्तन तक, और फिर कांग्रेस में शामिल होने के बाद संजय नगर में भव्य स्वागत—इन तीनों घटनाओं ने रुद्रपुर की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है।
कटोरी मंदिर में आयोजित जागरण केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि वह एक सामाजिक शक्ति प्रदर्शन भी था। जब राजकुमार ठुकराल ने मुख्य ज्योति प्रज्वलित की, तो यह एक संदेश भी था—उनकी राजनीतिक पहचान चाहे बदले, उनकी धार्मिक छवि अडिग है। पूरी रात चले भजन-कीर्तन और श्रद्धालुओं की भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनता के बीच उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है। कांति कोली, पूरन लाल पप्पू, सियाराम, धर्मपाल, राजू गुप्ता, गोविंद, सुरेश, केरू मंडल, शिव कुमार, तुलाराम, मीलाल भगत, ओमप्रकाश, अरुण, दीपक, कल्लू, विद्या रानी, पप्पू कोली, कमला, कंचन, पुष्पा, किरण, राजरानी, मुन्नी देवी, रामा देवी, सुनीता, मुस्कान, पायल, अन्नू, कुसुम, गीता, राम प्यारी, सीमा, मोर कली, राम कली, उषा, त्रिवेणी, भूरी देवी, शिवानी, कोमल, चंदा, सावित्री, माया देवी, विमला, आशा और शरबती जैसे स्थानीय चेहरों की उपस्थिति ने इस आयोजन को जन-जन का कार्यक्रम बना दिया।
इसके बाद शिवपुर में अखंड महानाम संकीर्तन में उनकी भागीदारी ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। वहां जिला पंचायत सदस्य सुखदेव हाल्दार, क्षेत्र पंचायत सदस्य कमलेश मिस्त्री, अंकित बठला, विजय शिकारी, आनंद शर्मा और अशोक ढाली जैसे जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि ठुकराल केवल धार्मिक आयोजनों में भाग नहीं ले रहे, बल्कि एक सामाजिक नेटवर्क को भी मजबूत कर रहे हैं। यह नेटवर्क भविष्य की राजनीति की आधारशिला बन सकता है।
सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश तब सामने आया जब कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनका संजय नगर में भव्य स्वागत हुआ। ममता रानी, मोनिका ढाली, उमा सरकार, अजीत सिंह, सतनाम सिंह, रवि राय, अरुण दास, विकास मल्लिक, रणजीत तिवारी, देवानंद स्वर्णकार, अर्जुन विश्वास, तरुण विश्वास, संजय दत्त, दीपंकर मंडल, जगदीश दास, चंदन मल्लिक, गोलू, सूरज, जयदेव, पारस, प्रभात, विशाल, श्रीवास मिस्त्री, डॉ. आदित्य राय, विजय विश्वास, गगन गुप्ता, संजय ठुकराल, सुनील चुग, ललित बिष्ट, सतीश कुमार और आनंद शर्मा जैसे कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस अब रुद्रपुर में केवल विपक्ष की भूमिका में नहीं रहना चाहती, बल्कि वह आक्रामक विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है।
यहां सवाल उठता है कि आखिर ठुकराल के इस राजनीतिक परिवर्तन का वास्तविक अर्थ क्या है? 2017 में जब उन्हें टिकट नहीं मिला और भाजपा ने उनसे दूरी बना ली, तब बहुत से लोगों ने उनकी राजनीतिक पारी को समाप्त मान लिया था। लेकिन आज, कांग्रेस में शामिल होने के बाद जिस तरह से उनकी सक्रियता बढ़ी है, वह इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित करती है।
ठुकराल की छवि लंबे समय तक “हिंदू हृदय सम्राट” के रूप में रही है। यह छवि केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में उनकी सक्रिय भागीदारी से निर्मित हुई थी। अब जब वही चेहरा कांग्रेस के मंच पर दिखाई दे रहा है, तो यह भाजपा के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है। क्योंकि अब हिंदुत्व का वह प्रतीक, जिसे भाजपा अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही है, वही प्रतीक कांग्रेस के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है।
रुद्रपुर विधानसभा में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। भाजपा के अंदर एक तरह की बेचैनी है। पार्षदों से लेकर विधायकों तक, और जिला स्तर से लेकर देहरादून तक बैठे नेताओं में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर यह बदलाव किस दिशा में जाएगा। क्या यह केवल एक व्यक्ति की सक्रियता है, या फिर यह एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत है?
यहां यह भी समझना जरूरी है कि हिंदुत्व केवल मंदिरों या धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक भावना है, जिसमें संस्कृति, परंपरा और पहचान शामिल होती है। अगर कांग्रेस इस भावना को नए तरीके से प्रस्तुत करने में सफल होती है, तो यह भाजपा के लिए एक नई चुनौती बन सकती है।
ठुकराल की रणनीति स्पष्ट नजर आती है—वह धार्मिक आयोजनों के माध्यम से जनता से जुड़ाव बनाए रखते हुए, कांग्रेस के संगठन को भी मजबूत कर रहे हैं। यह दोहरी रणनीति उन्हें एक अलग पहचान देती है। एक तरफ वह अपने पारंपरिक समर्थकों को बनाए रख रहे हैं, दूसरी तरफ नए राजनीतिक मंच पर अपनी भूमिका को भी मजबूत कर रहे हैं।
इस पूरी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या रुद्रपुर में हिंदुत्व की परिभाषा बदल रही है? क्या अब यह केवल भाजपा का राजनीतिक एजेंडा नहीं रह गया, बल्कि एक साझा सामाजिक-सांस्कृतिक धारा बन गया है, जिसे कोई भी दल अपनाकर जनता से जुड़ सकता है?
अगर वर्तमान घटनाक्रम को देखा जाए, तो इसका उत्तर “हां” की ओर झुकता नजर आता है। क्योंकि अब हिंदुत्व केवल एक नारे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक व्यवहारिक राजनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
रुद्रपुर की जनता के लिए यह समय महत्वपूर्ण है। उन्हें यह तय करना होगा कि वे किस प्रकार की राजनीति को स्वीकार करना चाहते हैं—वह जो केवल नारों तक सीमित है, या वह जो सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के माध्यम से अपनी पहचान बनाती है।
अंततः, राजकुमार ठुकराल का यह नया राजनीतिक अध्याय केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह रुद्रपुर की बदलती राजनीतिक धारा का प्रतीक है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बदलाव किस दिशा में जाता है—क्या यह केवल एक लहर है, या फिर एक स्थायी परिवर्तन की शुरुआत।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि रुद्रपुर में सियासत की बिसात फिर से बिछ चुकी है, और इस बार खेल के नियम पहले जैसे नहीं हैं।


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