

रुद्रपुर शहर मंगलवार को भक्ति, सेवा और श्रद्धा की अद्भुत भावनाओं से सराबोर हो उठा जब श्री गुरु नानक देव जी महाराज के प्रकाशोत्सव के उपलक्ष्य में निकले महान नगर कीर्तन ने पूरे नगर को गुरुवाणी के मधुर स्वरों से गूंजा दिया। यह केवल एक धार्मिक शोभायात्रा नहीं थी, बल्कि यह सद्भाव, सेवा, अनुशासन और आस्था का जीवंत उत्सव था — जो हमें गुरु नानक देव जी के उपदेशों की प्रासंगिकता आज के समय में पुनः स्मरण कराता है।

नगर कीर्तन का शुभारंभ श्री गुरु नानक हायर सेकेंडरी स्कूल से हुआ, जहाँ अरदास के साथ वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ। सबसे आगे श्री निशान साहिब लिए एक श्रद्धालु और उसके पीछे अनुशासनबद्ध “पाँच प्यारे” — यह दृश्य अपने आप में प्रेरणा देने वाला था। ढोल-नगाड़ों और बैंड की मधुर धार्मिक धुनों के बीच जब संगत ने जयघोष किया — “बोले सो निहाल… सत श्री अकाल!”, तो पूरा रुद्रपुर शहर मानो गुरु की कृपा में नहा उठा।
नगर कीर्तन के मार्ग को फूलों, तोरण द्वारों और रंग-बिरंगी सजावट से सुसज्जित किया गया था। सड़कों पर श्रद्धालु झाड़ू लगाते और जल छिड़कते हुए आगे बढ़ रहे थे — यह दृश्य गुरु नानक देव जी के उस संदेश की याद दिलाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “सेवा ही सच्ची पूजा है।” स्वच्छता, विनम्रता और निःस्वार्थ सेवा की यह परंपरा आज भी समाज के लिए सबसे बड़ा संदेश है।
नगर कीर्तन में शामिल विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों ने अपने पीटी प्रदर्शन और सांस्कृतिक झांकियों से इस आयोजन को और भी जीवंत बना दिया। वहीं गतका पार्टी द्वारा प्रदर्शित पारंपरिक युद्धक कौशल ने श्रद्धालुओं में उत्साह और गर्व की भावना जागृत की। जगह-जगह संगत द्वारा पुष्पवर्षा और प्रसाद वितरण — जैसे फल, हलवा, चना और बिस्कुट — ने समाज में भाईचारे और सेवा की भावना को और गहरा किया।
इस विशाल नगर कीर्तन ने यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति केवल मंदिर या गुरुद्वारों तक सीमित नहीं है — यह तब साकार होती है जब समाज एकजुट होकर प्रेम, समानता और सेवा के मार्ग पर चलता है। गुरु नानक देव जी ने सदियों पहले जो सिखाया था — “नाम जपो, कीरत करो, वंड छको” — वही शिक्षा आज के समाज को भी दिशा देने में सक्षम है।
आज के युग में जब समाज विभाजन, अहंकार और स्वार्थ से जूझ रहा है, तब ऐसे आयोजन मानवता के उत्थान का संदेश लेकर आते हैं। रुद्रपुर में निकला यह नगर कीर्तन केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतना का उत्सव था — जिसने हर व्यक्ति को याद दिलाया कि गुरु की शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 550 वर्ष पूर्व थी।
शहर के हर कोने में गूंज रही गुरुवाणी ने लोगों के हृदयों को शांति और प्रेरणा से भर दिया। श्री गुरु नानक देव जी का यह प्रकाशोत्सव इस बात का प्रमाण बन गया कि श्रद्धा और सेवा का संगम ही सच्ची आध्यात्मिकता है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी




