संस्कृति की मर्यादा और राजनीति से स्पष्ट दूरी

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शैल सांस्कृतिक समिति (शैल परिषद) द्वारा जारी की गई अति महत्वपूर्ण सूचना न केवल एक संगठनात्मक निर्णय है, बल्कि यह आज के दौर में सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए एक आवश्यक और साहसिक उदाहरण भी है। समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका अस्तित्व, पहचान और कार्यक्षेत्र पूरी तरह संस्कृति, लोकपरंपराओं और सामाजिक चेतना तक सीमित है, न कि किसी राजनीतिक विचारधारा या दल विशेष तक।
प्रदेश में अक्सर यह देखने को मिलता है कि सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के नाम और मंच का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है। ऐसे में शैल परिषद का यह निर्णय उसकी निष्पक्षता, विश्वसनीयता और सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखने की दिशा में एक मजबूत कदम है। समिति ने यह भी साफ किया है कि यदि कोई सदस्य व्यक्तिगत रूप से किसी राजनीतिक आयोजन में भाग लेता है, तो वह उसकी निजी जिम्मेदारी होगी, संगठन की नहीं। यह स्पष्ट रेखा खींचना संस्था की परिपक्व सोच को दर्शाता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


यह संपादकीय रूप से कहा जा सकता है कि संस्कृति को राजनीति से दूर रखना आज समय की मांग है। राजनीति बदलती रहती है, लेकिन संस्कृति समाज की आत्मा होती है। शैल सांस्कृतिक समिति का यह संदेश केवल अपने सदस्यों के लिए नहीं, बल्कि उन सभी संगठनों के लिए है जो सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक मंचों पर कमजोर होते देख रहे हैं।
शैल परिषद का यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि संस्था अपनी मूल भावना से कोई समझौता नहीं करना चाहती। निष्पक्षता, पारदर्शिता और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा ही किसी भी सांस्कृतिक संगठन की सबसे बड़ी पूंजी होती है। इस दृष्टि से शैल सांस्कृतिक समिति का यह कदम स्वागतयोग्य और अनुकरणीय कहा जा सकता है।


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