

हल्द्वानी में हुई पत्रकार दीपक अधिकारी पर जानलेवा हमले की घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उत्तराखंड में अपराधी और भूमाफिया किस हद तक बेखौफ हो चुके हैं। यह कोई साधारण झड़प नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला है। जब एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए पीटा जाए और पुल से नीचे फेंक दिया जाए क्योंकि उसने अवैध कब्जे और भ्रष्टाचार को उजागर करने की हिम्मत की — तो यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि सच्चाई पर हमला है, न्याय पर हमला है और जनता के सूचना के अधिकार पर हमला है।


पत्रकार दीपक अधिकारी पर यह हमला हल्द्वानी के उचापुल क्षेत्र में हुआ, जहां सरकारी जमीन पर लंबे समय से अवैध अतिक्रमण चल रहा था। जब पत्रकार ने कैमरे से इस कब्जे को दिखाना चाहा तो बदमाशों ने उस पर धावा बोल दिया। यह दृश्य भयावह था — एक ओर अपराधी गिरोह, दूसरी ओर एक अकेला पत्रकार, और तीसरी ओर पुलिस प्रशासन जो बाद में केवल “मामले की जांच” कहकर चुप्पी साध लेता है।
यह केवल हल्द्वानी की कहानी नहीं है। रुद्रपुर, किच्छा, रामनगर और नैनीताल जिले के कई हिस्सों में भूमाफिया सत्ता के संरक्षण में फल-फूल रहे हैं। सरकारी जमीन, गौचर भूमि, नालों के किनारे और वन भूमि पर कब्जे खुलेआम हो रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या शासन-प्रशासन को इन अवैध गतिविधियों की भनक नहीं है? या फिर सब कुछ “राजनीतिक संरक्षण” के साये में हो रहा है?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार कानून-व्यवस्था के सख्त दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पत्रकारों पर हमले बढ़ रहे हैं। रुद्रपुर में भी हाल ही में कुछ पत्रकारों को भूमाफिया और स्थानीय दलालों से धमकियां मिलीं। अब नैनीताल जिले में यह ताज़ा घटना राज्य की छवि पर गहरी चोट करती है।
जब पत्रकार असुरक्षित होंगे तो सच्चाई कौन लिखेगा? जब मीडिया पर हमले होंगे, तो लोकतंत्र की रक्षा कौन करेगा? उत्तराखंड जैसे शांतिप्रिय और जनांदोलनों की भूमि पर यह स्थिति बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है। राज्य आंदोलनकारियों ने इस पहाड़ को अलग राज्य इसलिए नहीं बनाया था कि यहां अपराधी और भ्रष्ट लोग बेखौफ घूमें और सच्चाई लिखने वालों को कुचल दिया जाए।
उत्तराखंड पुलिस की जिम्मेदारी:
इस घटना में एसएसपी नैनीताल को तत्काल कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। संबंधित थाने के प्रभारी और क्षेत्रीय चौकी इंचार्ज से भी जवाब लिया जाना चाहिए कि पत्रकार की सुरक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं थी? पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी इस मामले में अपने स्तर से विशेष जांच दल (SIT) गठित कर कार्रवाई के निर्देश देने चाहिए ताकि अपराधियों में खौफ बने। केवल एफआईआर दर्ज कर देना या खानापूर्ति करना पर्याप्त नहीं है।
भूमाफियाओं की जड़ें और राजनीतिक संरक्षण:
यह बात अब किसी से छिपी नहीं कि कई जिलों में भूमाफिया स्थानीय नेताओं की शह पर कब्जे कर रहे हैं। प्रशासनिक तंत्र या तो इनसे भयभीत है या फिर मिलीभगत में शामिल। रुद्रपुर में हो या हल्द्वानी में — सरकारी जमीनों की लूट, नालों का पाटना, और फर्जी पट्टे जारी कराना अब एक संगठित उद्योग बन चुका है। जो पत्रकार इस खेल को उजागर करने की कोशिश करता है, वह या तो धमकियों का शिकार होता है या हमले का।
चेतावनी – पत्रकार अब चुप नहीं रहेंगे:
अगर इस घटना के आरोपियों पर 48 घंटे के भीतर कठोर कार्रवाई नहीं होती, तो उत्तराखंड भर के पत्रकार सामूहिक रूप से सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करेंगे। श्रमजीवी पत्रकार यूनियन इस मामले को राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों के समक्ष उठाएगी। यदि जरूरत पड़ी, तो पूरे प्रदेश में “पत्रकार सुरक्षा आंदोलन” शुरू किया जाएगा।
उत्तराखंड के पत्रकार अब चुप नहीं बैठेंगे। दीपक अधिकारी पर हमला दरअसल हर उस कलम पर हमला है जो सच लिखने की हिम्मत करती है। अब यह आंदोलन सिर्फ एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा और लोकतंत्र की रक्षा के लिए होगा।
सरकार के लिए अंतिम चेतावनी:
अगर उत्तराखंड सरकार और पुलिस प्रशासन इस मामले को गंभीरता से नहीं लेता, तो आने वाले दिनों में जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि अपराधी इस राज्य में कानून से ऊपर हैं। यह संदेश सरकार की साख और नैतिक जिम्मेदारी दोनों पर सवाल खड़ा करेगा। मुख्यमंत्री धामी को स्वयं हस्तक्षेप कर इस मामले में उदाहरण पेश करने वाली कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी अपराधी कलम को चोट पहुँचाने की हिम्मत न करे।
पत्रकार दीपक अधिकारी आज घायल हैं, लेकिन उनकी सच्चाई की आवाज़ पूरे उत्तराखंड में गूंज रही है। यह आवाज़ न दबाई जा सकती है, न कुचली जा सकती है। उत्तराखंड की जनता और पत्रकार समुदाय मिलकर इस गुंडागर्दी के खिलाफ एकजुटता से खड़ा होगा। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की रक्षा करना अब केवल पत्रकारों की नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है।
– अवतार सिंह बिष्ट,रुद्रपुर उत्तराखंड,
प्रदेश प्रवक्ता, श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, उत्तराखंड
राज्य आंदोलनकारी




