

उत्तराखंड की राजनीति भी कमाल की है—यहां विचारधारा नहीं, “विचार-धारा बदलने की कला” ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है।
कभी कांग्रेस के खेमे में जो चेहरे “हाथ” मजबूत कर रहे थे, वही आज भाजपा में आकर “कमल” खिला रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मंच बदल गया, लेकिन चेहरे वही हैं—और अब तो हाल यह है कि कैबिनेट में “मूल भाजपाई” खोजने के लिए अलग से गणना करनी पड़ रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
12 सदस्यीय मंत्रिमंडल में केवल 4 नेता ही भाजपा की मूल विचारधारा से निकले हैं, बाकी सभी “राजनीतिक पुनर्जन्म” लेकर आए हुए प्रतीत होते हैं। यह वही उत्तराखंड है, जहां कभी दल-बदल को अवसरवाद कहा जाता था, और आज उसे अनुभव और समावेश का नाम दिया जा रहा है।
व्यंग्य यह भी है कि भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता वर्षों तक झंडा उठाए खड़े रहते हैं, लेकिन मंत्री पद की बारी आती है तो “अनुभवी आयातित नेताओं” की लॉटरी लग जाती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या भाजपा अब खुद अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा कम और कांग्रेस के ‘ट्रांसफर सर्टिफिकेट’ पर ज्यादा करने लगी है?
विधायक विनोद चमोली का यह कहना कि “अब वे सभी भाजपा के ही हैं”, सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन राजनीति की जनता इतनी भोली भी नहीं है। जनता जानती है कि यह विचारधारा का मिलन नहीं, बल्कि सत्ता का संगम है।
धामी मंत्रिमंडल अब पूर्ण जरूर हो गया है, लेकिन यह “पूर्णता” कहीं न कहीं भाजपा की आंतरिक कमी और बाहरी निर्भरता की कहानी भी कहती है।
आखिर में सवाल सीधा है—
क्या यह “डबल इंजन सरकार” है, या फिर “डबल पार्टी बैकग्राउंड सरकार”?




