क्राइम और उत्तराखंड: क्या देवभूमि की पहचान पर लग रहा प्रश्नचिह्न?

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हल्द्वानी। देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में कानून व्यवस्था को लेकर उठते सवाल अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुके हैं। चुनावी वर्ष में लगातार सामने आ रही आपराधिक घटनाओं ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है, जबकि विपक्ष को हमलावर होने का अवसर मिल गया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


देहरादून, तराई क्षेत्र यानी ऊधम सिंह नगर और अब नैनीताल जिला—तीनों क्षेत्रों में घटित घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि अपराध का ग्राफ थमता नजर नहीं आ रहा। काशीपुर निवासी किसान सुखवंत सिंह की हल्द्वानी में आत्महत्या ने पुलिस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए थे। सुसाइड नोट में लगाए गए आरोपों ने ऊधम सिंह नगर पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया था। मामला किसी तरह शांत हुआ, लेकिन अविश्वास की दरार छोड़ गया।
हल्द्वानी में नितिन लोहनी हत्याकांड में सत्तारूढ़ दल से जुड़े एक पार्षद का नाम सामने आने के बाद राजनीतिक तापमान और बढ़ गया। जनवरी में रामनगर के गुलरभट्टी क्षेत्र में समीर नामक युवक की ईंटों से कुचलकर हत्या ने आमजन को झकझोर दिया। दूसरी ओर राजधानी देहरादून में एक माह के भीतर चार हत्याओं ने शहरी सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए।
ऊधम सिंह नगर में ओवरलोड खनन वाहनों का बेलगाम संचालन भी चिंता का विषय बना हुआ है। सड़क हादसों और अवैध खनन की शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई का अभाव पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाता है।
आंकड़ों की तस्वीर क्या कहती है?
नैनीताल जिले के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में दुष्कर्म के 75 और हत्या के 11 मामले दर्ज हुए थे। वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर दुष्कर्म के 107 और हत्या के 15 तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक असुरक्षा का संकेत है। पर्यटन और शिक्षा के लिए प्रसिद्ध इस जिले में बढ़ते गंभीर अपराध राज्य की छवि को भी प्रभावित कर रहे हैं।
विपक्ष के तीखे बयान
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने आरोप लगाया कि अपराधियों और प्रशासन का गठजोड़ हो चुका है और उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने डबल मर्डर की घटना को हृदय विदारक बताते हुए कानून व्यवस्था को विफल करार दिया। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री किच्छा विधायक तिलक राज बहेड़ ने कहा कि पुलिस अधिकारियों का ध्यान जनता की सुरक्षा से अधिक सत्ता संतुष्टि पर केंद्रित है।
सवाल केवल राजनीति का नहीं
यह मुद्दा केवल आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं है। यदि आंकड़े लगातार बढ़ते हैं तो यह शासन-प्रशासन के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है। पुलिस सुधार, खुफिया तंत्र की मजबूती, महिला सुरक्षा के लिए विशेष अभियान, और अवैध गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण—इन सभी मोर्चों पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
उत्तराखंड की पहचान शांत, सुरक्षित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य की रही है। यदि अपराध का ग्राफ इसी प्रकार बढ़ता रहा तो यह केवल कानून व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी चुनौती बन जाएगा।
सरकार के सामने अब दो रास्ते हैं—या तो विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी मानकर खारिज किया जाए, या फिर आंकड़ों की सच्चाई स्वीकार कर कठोर और पारदर्शी कदम उठाए जाएं। चुनावी वर्ष में जनता का फैसला केवल नारों पर नहीं, बल्कि सुरक्षा के वास्तविक अनुभव पर निर्भर करेगा।


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