

✍️ विशेष विश्लेषण:उत्तर भारत की प्राकृतिक सुरक्षा कवच मानी जाने वाली अरावली पहाड़ियों को लेकर देशभर में चिंता गहराती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले के बाद राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली ही नहीं, बल्कि समूचे उत्तर भारत में अरावली को लेकर बहस तेज हो गई है। फैसले के तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को खनन के लिए खोले जाने की व्याख्या ने पर्यावरणविदों और स्थानीय समाज को झकझोर दिया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
इस फैसले का सीधा असर हरियाणा और राजस्थान के करीब 6 जिलों के 100 से अधिक गांवों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। अकेले नूंह (मेवात) जिले के आसपास 40 से अधिक गांव, जबकि नूंह से सटे तिजारा, खैरथल, किशनगढ़वास, अलवर, जुरहेड़ा, नगर, पहाड़ी, गोपालगढ़ और कामां क्षेत्र के 60 से ज्यादा गांव संकट की जद में आ गए हैं।
मेवात आरटीआई मंच का विरोध
मामले को लेकर मेवात आरटीआई मंच ने सख्त रुख अपनाते हुए नायब तहसीलदार के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, राज्यपाल, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को ज्ञापन भेजा है। मंच के अध्यक्ष सुबोध कुमार जैन ने बताया कि क्षेत्र में 13 ऐसे गांव हैं, जहां पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है, जिससे खनन का खतरा सीधा उनके अस्तित्व पर मंडरा रहा है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर पर भी संकट
फिरोजपुर झिरका तहसील के नूंह, तावडू, बसई मेव, पुन्हाना और उप-तहसील इंडरी के कई गांवों के साथ-साथ क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरें—मंदिर, मस्जिद, दरगाहें और किले—भी इस फैसले के बाद खतरे में आ सकती हैं। खनन शुरू होने पर केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान भी मिटने की आशंका जताई जा रही है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: अरावली कमजोर तो हिमालय भी असुरक्षित
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली केवल एक पहाड़ी श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु संतुलन प्रणाली की रीढ़ है।
अरावली थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है
मानसून की नमी को उत्तर भारत में बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है
भूजल recharge और हवा की गति को नियंत्रित करती है
यदि अरावली में बड़े पैमाने पर खनन होता है तो:
उत्तर भारत में मरुस्थलीकरण बढ़ेगा
गर्म और शुष्क हवाएं सीधे गंगा–यमुना के मैदानों तक पहुंचेंगी
इससे हिमालयी क्षेत्र में असामान्य वर्षा, बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं
उत्तराखंड पर संभावित प्रभाव
वैज्ञानिक चेतावनी है कि अरावली के कमजोर होने से:
मानसून का पैटर्न बिगड़ेगा
उत्तराखंड में अतिवृष्टि और अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं
पहले से संवेदनशील हिमालयी ढांचा और अधिक अस्थिर होगा
अर्थात, अरावली पर खनन का असर प्रत्यक्ष भले न दिखे, लेकिन उसका दबाव हिमालय झेलेगा।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण: प्रकृति से छेड़छाड़, भविष्य से विश्वासघात
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में पर्वतों को केवल भू-आकृति नहीं, बल्कि जीवंत सत्ता माना गया है।
जैसे हिमालय को देवात्मा कहा गया, वैसे ही अरावली को धरती की प्राचीन तपस्वी श्रृंखला माना जाता है।
पर्यावरण चिंतकों का कहना है—
“अरावली का खनन करना केवल पत्थर निकालना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों से उनकी सांसें छीनने जैसा है।”
प्रकृति के साथ यह व्यवहार धर्म, विज्ञान और नैतिकता—तीनों के विरुद्ध माना जा रहा है।
पुनर्विचार की मांग तेज
पर्यावरण विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों की एकजुट मांग है कि सुप्रीम कोर्ट इस फैसले पर पुनर्विचार करे। उनका कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है, लेकिन प्राकृतिक सुरक्षा कवच को तोड़कर किया गया विकास आत्मघाती सिद्ध होगा।
अरावली पर संकट केवल मेवात, हरियाणा या राजस्थान का मुद्दा नहीं है। यह उत्तराखंड सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी है। यदि आज अरावली को नहीं बचाया गया, तो कल हिमालय को बचाना और भी कठिन हो जाएगा।
प्रकृति चेतावनी दे रही है—अब भी समय है, निर्णय बदलिए।
भ्रम बनाम तथ्य;अरावली पर्वत की नई परिभाषा को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम तथ्यहीन है। सरकार का उद्देश्य खनन को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि अवैध खनन पर सख्त रोक लगाना है। वर्तमान में अरावली के बेहद सीमित क्षेत्र में ही खनन की अनुमति है और एनसीआर में यह पूरी तरह प्रतिबंधित है। सुप्रीम कोर्ट की सहमति, वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय आकलन और क्षतिपूर्ति की शर्तें स्पष्ट करती हैं कि संरक्षण सर्वोपरि है। दुर्लभ खनिज मिलने पर ही, वह भी नियंत्रित और जिम्मेदार तरीके से निर्णय लिया जाएगा।




