

मध्य–पूर्व में जारी इस भीषण संघर्ष के बीच जब Donald Trump ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” पर राष्ट्र को संबोधित किया, तो उनका संदेश स्पष्ट था—अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। ट्रंप ने साफ कहा कि इस सैन्य अभियान के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं: ईरान की मिसाइल क्षमता को निष्क्रिय करना, उसकी नौसेना को कमजोर करना और यह सुनिश्चित करना कि वह कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
आतंक के नेटवर्क पर प्रहार
ट्रंप ने ईरान को “आतंक फैलाने वाला देश” बताते हुए आरोप लगाया कि वह वर्षों से मध्य-पूर्व में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को हथियार, धन और रणनीतिक सहायता देता रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगियों का तर्क है कि यदि किसी देश की नीतियां क्षेत्रीय अस्थिरता, प्रॉक्सी युद्ध और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बनें, तो उसे रोकना अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बन जाती है।
अमेरिका और Israel का कहना है कि यह कार्रवाई किसी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और सामूहिक सुरक्षा का कदम है। इजरायल लंबे समय से ईरान समर्थित समूहों से खतरे का सामना करता रहा है, वहीं अमेरिका अपने सैनिकों और दूतावासों पर संभावित हमलों को लेकर सतर्क रहा है। ऐसे में दोनों देशों के लिए यह संघर्ष अस्तित्व और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन गया है।
परमाणु खतरे की आशंका
ट्रंप ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि ईरान का मिसाइल कार्यक्रम केवल पारंपरिक सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि संभावित परमाणु हथियारों की सुरक्षा कवच के रूप में विकसित किया जा रहा था। अमेरिका का दावा है कि यदि लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें और परमाणु क्षमता एक साथ आ जातीं, तो यह केवल मध्य-पूर्व ही नहीं, बल्कि यूरोप और अमेरिका के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता था।
अमेरिका की रणनीति का आधार यह सिद्धांत रहा है कि “रोकथाम” (deterrence) तब प्रभावी होती है जब खतरे को प्रारंभिक चरण में ही निष्क्रिय कर दिया जाए। ट्रंप ने इसी तर्क के साथ कार्रवाई को उचित ठहराया।
सैन्य कार्रवाई और संदेश
ट्रंप के अनुसार, अब तक ईरान के 10 युद्धपोत तबाह किए जा चुके हैं। उन्होंने अपने पूर्व निर्णय का उल्लेख करते हुए Qasem Soleimani के खिलाफ की गई कार्रवाई को भी आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कदम बताया। उनके शब्दों में, “जब अमेरिका पर खतरा मंडराता है, तो हम इंतजार नहीं करते।”
इस अभियान के दौरान शहीद हुए चार अमेरिकी सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए ट्रंप ने कहा कि उनकी कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए बलिदान देने वालों के सम्मान में मिशन को जारी रखना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।
व्हाइट हाउस से संदेश
White House के ईस्ट रूम में दिए गए इस भाषण के दौरान ट्रंप ने अमेरिकी सैनिकों की वीरता की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका केवल युद्ध नहीं लड़ रहा, बल्कि एक ऐसे भविष्य की रक्षा कर रहा है जिसमें तानाशाही और आतंक के लिए कोई स्थान न हो।
अपने संबोधन के दौरान उन्होंने वेस्ट विंग में प्रस्तावित नए बॉलरूम का जिक्र भी किया, जिसकी अनुमानित लागत 400 मिलियन डॉलर बताई गई। यह उल्लेख ऐसे समय आया जब दुनिया युद्ध की गंभीरता पर चर्चा कर रही थी—जो दर्शाता है कि अमेरिकी प्रशासन घरेलू और वैश्विक दोनों मोर्चों पर सक्रिय है।
तानाशाही शासन के अंत की बात
अमेरिका और इजरायल का तर्क है कि ईरान में मौजूदा कठोर शासन व्यवस्था क्षेत्रीय शांति के लिए बाधा है। उनका मानना है कि यदि ईरान में लोकतांत्रिक और जवाबदेह व्यवस्था स्थापित होती है, तो मध्य-पूर्व में स्थायी शांति की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि, यह भी सच है कि किसी भी सैन्य कार्रवाई के दीर्घकालिक परिणाम जटिल होते हैं। शासन परिवर्तन का लक्ष्य जितना आकर्षक लगता है, उसकी प्रक्रिया उतनी ही संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण होती है। फिर भी, अमेरिका और इजरायल अपने कदम को आतंकवाद और संभावित परमाणु खतरे के विरुद्ध आवश्यक और न्यायोचित ठहरा रहे हैं।
“ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” केवल एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन, वैश्विक सुरक्षा और क्षेत्रीय राजनीति का नया अध्याय है। अमेरिका और इजरायल इसे आत्मरक्षा और विश्व शांति के लिए उठाया गया साहसिक कदम बता रहे हैं। वहीं आलोचकों की नजर में यह संघर्ष एक व्यापक भू-राजनीतिक टकराव की शुरुआत भी हो सकता है।
इतिहास गवाह है—जब तानाशाही शासन और उग्र विचारधाराएं वैश्विक स्थिरता को चुनौती देती हैं, तो टकराव अपरिहार्य हो जाता है। अब यह देखना होगा कि यह अभियान मध्य-पूर्व को स्थायी शांति की ओर ले जाता है या एक नए संघर्ष चक्र की शुरुआत करता है।




