कुमाऊनी भाषा की गौरवगाथा को समर्पित – रुद्रपुर में 17वां राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन 7 से 9 नवम्बर तक, तैयारियां जोरों पर

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रुद्रपुर।,भाषा किसी समाज की आत्मा होती है और संस्कृति उसकी पहचान। इसी भावना को साकार करने जा रहा है “17वां राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन”, जो इस बार रुद्रपुर में ऐतिहासिक रूप से आयोजित हो रहा है। यह सम्मेलन जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), रामपुर रोड, सोनिया होटल के सामने, रुद्रपुर (उधम सिंह नगर) में आगामी 7, 8 और 9 नवम्बर 2025 को आयोजित होगा। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य कुमाऊनी भाषा के संवर्धन, संरक्षण, और उसके प्रयोग को बढ़ावा देना है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपने भाषायी गौरव से जुड़ी रहें।


संरक्षक और मार्गदर्शक

सम्मेलन के संरक्षक के रूप में डा. हयात सिंह रावत, जो उत्तराखंड भाषा संस्थान के सदस्य और कुमाऊनी मासिक पत्रिका ‘पहरू’ के संस्थापक संपादक हैं, अपने अमूल्य अनुभव और दिशा से आयोजन को गरिमा प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि “कुमाऊनी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना है, जिसे बचाना और संवारना हमारा दायित्व है।”


मुख्य संयोजक और संयोजक मंडल

सम्मेलन के मुख्य संयोजक डा. बी. एस. बिष्ट, पूर्व कुलपति, पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, हैं — जिन्होंने लंबे समय से भाषा, शिक्षा और क्षेत्रीय अस्मिता के विषयों पर उल्लेखनीय कार्य किया है।
उनके साथ सह संयोजक के रूप में डा. ललित मोहन उप्रेती, पूर्व निदेशक स्वास्थ्य सेवाएं, उत्तराखंड, अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इन दोनों विद्वानों की जोड़ी सम्मेलन की योजनाओं, सत्रों और कार्यशालाओं को सुव्यवस्थित रूप से दिशा दे रही है।


प्रचार-प्रसार समिति: शब्दों से समाज को जोड़ने की धड़कन

प्रचार-प्रसार समिति इस सम्मेलन की ऊर्जा का केंद्र है। इस समिति में सम्मिलित हैं—
डा. के. सी. चंदोला (प्रबंध निदेशक, चंदोला होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, रुद्रपुर), अवतार सिंह बिष्ट (वरिष्ठ पत्रकार, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स), श्री महेश चंद्र पंत, श्री ललित मोहन पांडे, श्री संदीप यादव (टीवी 100) तथा श्री रजत बिष्ट (अध्यक्ष, छात्र संघ, शहीद भगत सिंह महाविद्यालय, रुद्रपुर)
यह समिति भाषा सम्मेलन की जानकारी को जन-जन तक पहुँचाने, सोशल मीडिया, प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में प्रसार करने, तथा रचनात्मक सामग्री तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।


आवास व्यवस्था: अतिथियों के स्वागत में समर्पण

सम्मेलन के दौरान देशभर से आने वाले भाषाविदों, शोधकर्ताओं और सांस्कृतिक प्रतिनिधियों के लिए आवास व्यवस्था की जिम्मेदारी श्री योगेश वर्मा और श्री हेम पंत (मो. 9368846300) को सौंपी गई है। उन्होंने बताया कि सभी मेहमानों के ठहरने, भोजन और आवागमन के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं ताकि उन्हें रुद्रपुर की गर्मजोशी और कुमाऊनी आतिथ्य का अनुभव मिल सके।


प्रबंध एवं स्वागत समिति: आयोजन की रीढ़

सम्मेलन की सफलता का वास्तविक आधार इसकी प्रबंध एवं स्वागत समिति है, जिसमें कुमाऊनी समाज के सभी प्रमुख शिक्षाविद, समाजसेवी, सांस्कृतिक कार्यकर्ता और प्रशासनिक अधिकारी सक्रिय हैं। इस समिति में शामिल हैं—
श्री लक्ष्मी चंद्र पंत, श्रीमती अजंता बिष्ट (प्रधानाचार्य, डायट रुद्रपुर), श्री भरत लाल शाह, श्री गोपाल सिंह पटवाल, श्री दिवाकर पांडे, श्री दिनेश बम (शैल सांस्कृतिक समिति), श्री गिरीश चंद्र जोशी (पर्वतीय समाज समिति), श्री रविंद्र आर्य, डा. नवीन उपाध्याय, श्री गजेंद्र सिंह बिष्ट (पर्वतीय उत्थान समिति), श्री आर. पी. शर्मा (पूर्व अपर पुलिस अधीक्षक), श्री आनंद सिंह धामी, श्री के. एस. नेगी, श्री योगेश वर्मा, श्री शंभु दत्त पांडे (शैलेय), श्री पी. सी. शर्मा, श्री दयाल चंद्र पांडे, श्री बी. डी. भट्ट, श्री रजत सिंह बिष्ट, श्री चेतन भट्ट (छात्र संघ), श्री आलोक मिश्रा (डायट), श्री नारायण सिंह खोलिया, श्री हरीश चंद्र उपाध्याय, श्री योगेश बिष्ट, डा. विमला बिष्ट, श्री खड़क सिंह कार्की और श्री त्रिलोचन पनेरू

इन सभी सदस्यों ने सम्मेलन स्थल की व्यवस्थाओं, पंजीकरण, भोजन, स्वागत-सत्कार, तकनीकी सत्रों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जिम्मेदारी अपने-अपने स्तर पर संभाली है।


सम्मेलन की विशेषताएं

इस तीन दिवसीय सम्मेलन में भाषा वैज्ञानिक, लोककवि, इतिहासकार, शिक्षाविद और सांस्कृतिक कार्यकर्ता एक मंच पर एकत्र होंगे। कुमाऊनी भाषा के साहित्यिक स्वरूप, व्याकरण, लोकधुन, लोकगीत, और आधुनिक प्रयोगों पर विचार-विमर्श होगा।
सम्मेलन में “कुमाऊनी भाषा और नई पीढ़ी”, “भाषाई अस्मिता और राज्य की भूमिका”, तथा “डिजिटल युग में कुमाऊनी का भविष्य” जैसे विषयों पर सत्र आयोजित किए जाएंगे।
इसके साथ ही कुमाऊनी लोकगीत, झोड़ा-छपेली, लोकनृत्य, और पारंपरिक संगीत की प्रस्तुति भी होगी, जिससे भाषा और संस्कृति का जीवंत संगम बनेगा।


रुद्रपुर की भूमिका और प्रतीकात्मक महत्व

रुद्रपुर जैसे औद्योगिक और सांस्कृतिक नगर में इस सम्मेलन का आयोजन इस बात का प्रतीक है कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाएँ केवल पर्वतीय सीमाओं में सीमित नहीं, बल्कि मैदानों में भी जीवंत हैं।
यह सम्मेलन न केवल भाषा संरक्षण का प्रयास है बल्कि “कुमाऊनी अस्मिता” को सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम भी है।


समापन विचार

संरक्षक डा. हयात सिंह रावत के शब्दों में – “भाषा की मर्यादा बनाए रखना, उसकी अभिव्यक्ति के माध्यमों को सशक्त करना और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना ही असली आंदोलन है।”
मुख्य संयोजक डा. बी. एस. बिष्ट ने भी कहा कि “यह सम्मेलन केवल तीन दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि कुमाऊनी चेतना की पुनर्स्थापना का अभियान है।”
डा. ललित मोहन उप्रेती ने युवाओं से अपील की कि वे अपने घरों और विद्यालयों में कुमाऊनी भाषा बोलने का साहस और गर्व विकसित करें।


कुल मिलाकर, रुद्रपुर में होने वाला यह 17वां राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन कुमाऊनी समाज के लिए एक नया अध्याय लिखने जा रहा है। यह आयोजन केवल भाषा का उत्सव नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा के पुनर्जागरण की घोषणा है।


(संपादकीय लेख – अवतार सिंह बिष्ट, राज्य आंदोलनकारी एवं संपादक, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, उत्तराखंड)


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