

छात्रा ने एचओडी पर मानसिक प्रताड़ना और फेल करने की धमकी का आरोप भी लगाया था।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
पिता ने बताया कि रात नौ बजे तन्वी ने उनसे एक घंटा फोन पर बात की थी, वह बुरी तरह टूटी हुई थी, लेकिन ऐसा नहीं लगा कि वह आत्महत्या कर लेगी। उन्होंने बेटी को दिलासा दी कि चिंता न करे, वह सुबह अंबाला से तड़के चल देंगे और देहरादून पहुंचने के बाद उसके साथ मेडिकल कालेज के मैनेजमेंट में डा प्रियंका की शिकायत करेंगे। उन्हें अंदाजा नहीं लगा कि कि तन्वी इतनी हताश है कि सुबह का इंतजार नहीं कर करेगी।
बदहवासी में अस्पताल की पार्किंग में पहुंचे पिता
रात 11:15 बजे तन्वी ने मां को मैसेज किया कि वह 12:30 बजे तक घर आ जाएगी, लेकिन फिर उसने फोन उठाना बंद कर दिया। पिता अनहोनी की आशंका से अंबाला से देहरादून के लिए निकल पड़े। तड़के तीन बजे बदहवासी में अस्पताल की पार्किंग में पहुंचे। वहां तन्वी की कार नहीं मिली तो उसे तलाशने बाहर निकल पड़े।
पहले काली माता मंदिर से आगे पेट्रोल पंप पर डीजल भरवाने गए, क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि रात कहां कहां जाना पड़ेगा, लेकिन पंप से निकलते ही बेटी की कार रोड किनारे देखी। उसमें अपनी लाडली को बेसुध देख उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने पत्थर से शीशा तोड़कर उसे बाहर निकाला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। करीब सवा तीन बजे अस्पताल की इमरजेंसी में ले गए, लेकिन प्राण नहीं बचे थे।
कार की फारेंसिक टीम ने की जांच
सीओ (सदर) अंकित कंडारी ने बताया कि मामले में जांच की जा रही है। जिस कार में तन्वी ने आत्महत्या की, उसकी फारेंसिक टीम ने गहन जांच की है। सीट पर बिखरी दवाओं, इंजेक्शन व उसके हाथ में लगे केनुला को सीज करके साइंटिफिक जांच के लिए भेजा गया है।
पिता की तहरीर पर मुकदमा दर्ज करके अग्रिम कानूनी कार्यवाही की जा रही है। गुरुवार को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को शव सौंप दिया गया। माता-पिता व रिश्तेदार दोपहर में शव लेकर अंबाला के लिए निकल गए थे।
मेरी बेटी डाक्टर बनकर लोगों की सेवा करना चाहती थी। हमने उसे हर सुख-सुविधा दी, करोड़ों की फीस भरी, लेकिन उसे सिस्टम की प्रताड़ना और लालच ने मार डाला। दोषी को सजा मिलनी चाहिए, जिससे कि बच्चों के भविष्य का सपना देख रहे किसी और परिवार के ऐसा दुख न देखना पड़े। – डॉ. ललित मोहन, मृतका के पिता
संपादकीय इस दर्दनाक प्रकरण ने एक बार फिर शिक्षा संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तन्वी की मौत केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस तंत्र की विफलता का आईना है जहाँ शिक्षा का उद्देश्य मार्गदर्शन से हटकर दबाव और भय का पर्याय बनता जा रहा है। पिता डा. ललित मोहन के आरोप बेहद चिंताजनक हैं—90 लाख रुपये जैसी भारी फीस देने के बावजूद यदि एक छात्रा को मानसिक उत्पीड़न, परिणाम खराब करने की धमकियों और आर्थिक संकेतों का सामना करना पड़े, तो यह शिक्षा व्यवस्था की नैतिकता पर सीधा प्रश्नचिह्न है।
परिजनों द्वारा लगाए गए आरोप, विशेषकर विभागाध्यक्ष डा. प्रियंका के व्यवहार और मूल्यांकन में कथित हेरफेर, यह संकेत देते हैं कि संस्थान के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही का गंभीर अभाव है। वहीं पूर्व विभागाध्यक्ष डा. तरन्नुम शकील के साथ तन्वी के सकारात्मक संबंधों का टूटना भी इस मामले को और संदिग्ध बनाता है।
यदि ये आरोप सत्य हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि एक आपराधिक कृत्य है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच के साथ-साथ संबंधित संस्थान और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और तन्वी को इस तरह टूटने पर मजबूर न होना पड़े।




