

देहरादून के क्लेमेनटाउन क्षेत्र में वर्ष 2022 में दिनदहाड़े हुई कोठी ध्वस्तीकरण और लूटपाट की घटना एक बार फिर चर्चा में है। इस प्रकरण में राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने तत्कालीन एसएसपी जन्मेजय खंडूड़ी और तत्कालीन थानाध्यक्ष नरेंद्र गहलावत के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति उत्तराखंड शासन के गृह विभाग को भेज दी है।
यह मामला क्लेमेनटाउन सोसाइटी एरिया, सुभाषनगर निवासी कुसुम कपूर की शिकायत पर दर्ज हुआ था। कुसुम कपूर के पति एयर कमोडोर वी.के. कपूर का निधन हो चुका है और वह अपनी मानसिक रूप से दिव्यांग अविवाहित पुत्री टीना कपूर के साथ कोठी में रहती थीं। बताया गया कि यह संपत्ति जर्मनी में रहने वाली अतान्जे साजमा मलिक के नाम है, जिसे उनके पति महेंद्र मलिक ने पूर्व में खरीदा था।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
शिकायत के अनुसार सात जनवरी 2022 को जब कुसुम कपूर इलाज के लिए नोएडा गई थीं, उसी दौरान अमित यादव ने मोना रंधावा के साथ मिलकर करीब 30 से 40 हथियारबंद लोगों के साथ कोठी पर कब्जा कर लिया। आरोप है कि बदमाशों ने वहां मौजूद कर्मचारियों को बंधक बना लिया, घरेलू सामान, दस्तावेज, गहने और सैन्य सेवा से जुड़े सम्मान ट्रकों में भरकर ले गए और तीन-चार जेसीबी मशीनों से पूरी कोठी को ध्वस्त कर दिया।
परिजनों ने तत्काल क्लेमेनटाउन थाने को सूचना दी, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने घटना को गंभीरता से नहीं लिया। छह दिन बाद हल्की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। जब यह मामला मीडिया और सोशल मीडिया में उछला तो तत्कालीन पुलिस महानिदेशक के निर्देश पर डकैती की धारा जोड़ी गई और विवेचना हरिद्वार स्थानांतरित की गई, जिसके बाद आरोपियों की गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू हुई।
प्राधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एन.एस. धानिक और अन्य सदस्यों ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद निष्कर्ष निकाला कि पुलिस अधिकारियों की घोर लापरवाही के कारण पीड़ित परिवार को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से भारी क्षति उठानी पड़ी तथा उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ।
घटना के बाद कोठी टूटने से परिवार सड़क पर आ गया था। बाद में नेवी के अधिकारियों ने मानवीय आधार पर उन्हें नेशनल हाइड्रोग्राफिक कार्यालय में अस्थायी आवास उपलब्ध कराया। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि न्याय की गुहार लगाने पर थानाध्यक्ष ने उल्टा उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की धमकी दी थी।
प्राधिकरण ने यह भी माना कि तत्कालीन एसपी क्राइम विशाखा अशोक भडाने और तत्कालीन सीओ नरेंद्र पंत की ओर से भी जांच में लापरवाही बरती गई, हालांकि उनके खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति नहीं की गई।
यह पूरा प्रकरण एक बार फिर सवाल खड़ा करता है कि यदि कानून के रखवाले ही गंभीर घटनाओं में समय पर कार्रवाई न करें तो आम नागरिक की सुरक्षा और न्याय की उम्मीद किससे की जाए। उत्तराखंड जैसे शांत प्रदेश में ऐसी घटनाएं और प्रशासनिक उदासीनता शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
देहरादून के क्लेमेनटाउन में दिनदहाड़े कोठी तोड़े जाने और लूटपाट जैसी गंभीर घटना में पुलिस की भूमिका बेहद संदिग्ध और लापरवाह नजर आई। घटना की सूचना मिलने के बावजूद तत्कालीन थानाध्यक्ष ने मौके पर पहुंचकर प्रभावी कार्रवाई नहीं की और छह दिन तक मुकदमा दर्ज करने में भी टालमटोल की गई। इतना ही नहीं, पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के बजाय उन्हें ही धमकाने के आरोप भी सामने आए। यदि मामला मीडिया में न उछलता तो शायद जांच भी शुरू न होती। यह प्रकरण बताता है कि पुलिस की निष्क्रियता और उदासीनता किस तरह पीड़ितों के मानवाधिकारों का हनन कर सकती है और कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।




