

पंतनगर राज्य गठन के 25 वर्ष बाद पहली बार जब उत्तराखंड के दस विश्वविद्यालय एक मंच पर खेल महाकुंभ में जुटे, तब उम्मीद थी कि यह आयोजन युवा ऊर्जा, पारदर्शिता और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बनेगा। लेकिन Govind Ballabh Pant University of Agriculture and Technology में आयोजित चार दिवसीय उत्तराखंड अंतर-विश्वविद्यालयी खेल प्रतियोगिता का समापन विवादों की गूंज के साथ हुआ। चैंपियनशिप ट्रॉफी के वितरण को लेकर उठा विवाद इस कदर बढ़ा कि अल्मोड़ा के खिलाड़ियों ने अपने जीते हुए मेडल तक लौटा दिए और देर रात तक धरने पर बैठे रहे।
यह केवल एक ट्रॉफी का मामला नहीं रहा, बल्कि पारदर्शिता, निष्पक्षता और खेल भावना पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
किसे मिली ट्रॉफी, क्यों उठा विवाद?
समापन समारोह में आयोजन समिति ने समग्र प्रदर्शन के आधार पर Shri Dev Suman Uttarakhand University को प्रतिष्ठित चांसलर ट्रॉफी प्रदान की। रनर-अप ट्रॉफी Kumaon University को दी गई।
लेकिन इसी निर्णय के खिलाफ Soban Singh Jeena University की टीम ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। खिलाड़ियों और कोच का आरोप था कि उनकी टीम ने 27 से 29 मेडल जीते, जिनमें 14 स्वर्ण पदक शामिल थे और कुल अंक 110 रहे। इसके बावजूद ट्रॉफी किसी अन्य विश्वविद्यालय को दे दी गई, जिसने उनके अनुसार “चार या पांच” मेडल ही जीते थे।
खिलाड़ियों ने इसे भेदभाव करार दिया और आयोजन समिति पर पक्षपात का आरोप लगाया।
कार रोकी, मेडल लौटाए, धरना दिया
विवाद इतना बढ़ा कि खिलाड़ियों ने आयोजन समिति के सचिव एवं छात्र कल्याण निदेशक डॉ. आनंद सिंह जीना की कार रोककर विरोध जताया। काफी समझाइश के बाद भी खिलाड़ी शांत नहीं हुए।
शाम तक वार्ता चलती रही, लेकिन जब कोई ठोस समाधान नहीं निकला तो खिलाड़ियों ने अपने सभी मेडल डीन स्टूडेंट वेलफेयर को सौंप दिए और “चीटर-चीटर” के नारे लगाते हुए धरने पर बैठ गए। सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप करना पड़ा। अंततः रात साढ़े नौ बजे के करीब खिलाड़ी निराश होकर लौटे।
खेल के मैदान में यह दृश्य राज्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण माना जा रहा है।
आयोजन की पृष्ठभूमि
यह खेल महोत्सव उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर आयोजित हुआ, जिसमें 722 खिलाड़ियों—412 पुरुष और 310 महिला प्रतिभागियों—ने भाग लिया। एथलेटिक्स, कबड्डी, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, फुटबॉल और बैडमिंटन जैसी प्रतियोगिताएं चार दिनों तक चलीं।
उद्घाटन समारोह राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह द्वारा किया गया। समापन अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान ने खेलों को व्यक्तित्व विकास का सशक्त माध्यम बताया।
पुरुष 400 मीटर रिले में पंतनगर विश्वविद्यालय प्रथम, Hemwati Nandan Bahuguna Uttarakhand Medical Education University द्वितीय और Doon University तृतीय स्थान पर रहे।
महिला वर्ग में Uttarakhand Sanskriti University प्रथम, एसएसजे विश्वविद्यालय द्वितीय और कुमाऊं विश्वविद्यालय तृतीय स्थान पर रहा।
इन सब उपलब्धियों के बीच ट्रॉफी विवाद ने पूरे आयोजन की सकारात्मकता को ढक लिया।
अंक प्रणाली पर सवाल
आयोजन समिति का कहना है कि ट्रॉफी “ओवरऑल प्रदर्शन” के आधार पर दी गई। डॉ. आनंद सिंह जीना ने स्पष्ट किया कि मार्किंग की प्रक्रिया पारदर्शी थी और ज्यूरी की सहमति से परिणाम घोषित हुए।
लेकिन एसएसजे विश्वविद्यालय के कोच लियाकत अली खान का आरोप है कि अंक प्रणाली स्पष्ट नहीं की गई। यदि कुल पदकों और स्वर्ण पदकों की संख्या अधिक है, तो ट्रॉफी किसी अन्य टीम को कैसे दी जा सकती है?
यही वह बिंदु है, जहां से विवाद ने तूल पकड़ा। यदि अंक निर्धारण के मानदंड पहले से सार्वजनिक और लिखित रूप में साझा किए जाते, तो शायद यह स्थिति पैदा नहीं होती।
खेल भावना पर आघात
खेल का मूल उद्देश्य प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग, अनुशासन और सौहार्द का विकास है। जब खिलाड़ी मेडल लौटाने पर मजबूर हो जाएं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संस्थागत असंतुलन का संकेत भी है।
अल्मोड़ा के खिलाड़ियों का कहना है कि उन्होंने कठिन परिश्रम से पदक जीते। यदि उन्हें लगता है कि न्याय नहीं हुआ, तो उनका आक्रोश स्वाभाविक है। दूसरी ओर, आयोजन समिति का पक्ष है कि निर्णय ज्यूरी के नियमों के अनुरूप लिया गया।
इस टकराव ने युवा खिलाड़ियों के मन में अविश्वास की रेखा खींच दी है।
पारदर्शिता क्यों जरूरी?
राज्य स्तर के खेल आयोजन केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भविष्य की प्रतिभाओं की पहचान का मंच होते हैं। यहां की निष्पक्षता खिलाड़ियों के मनोबल और करियर दोनों को प्रभावित करती है।
यदि अंक प्रणाली, पदक तालिका और समग्र स्कोरिंग का विस्तृत विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो, तो किसी भी विवाद की संभावना न्यूनतम हो सकती है।
इस मामले में प्रशासन की सबसे बड़ी कमी संवाद की रही। देर शाम तक वार्ता चलने के बावजूद कोई संयुक्त प्रेस बयान जारी नहीं किया गया, जिससे अफवाहों को बल मिला।
सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका
राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग को इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। यदि कहीं तकनीकी त्रुटि हुई है तो उसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना चाहिए। यदि निर्णय सही है, तो उसका तथ्यात्मक आधार दस्तावेजों सहित सामने रखा जाना चाहिए।
खेल आयोजन की गरिमा तभी बनी रह सकती है, जब पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो।
आगे की राह
इस विवाद से सबक लेकर कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं—
अंक निर्धारण प्रणाली का पूर्व प्रकाशन
स्वतंत्र पर्यवेक्षक की नियुक्ति
डिजिटल स्कोर बोर्ड और लाइव अपडेट
विवाद निवारण समिति का गठन
समापन से पहले सभी टीमों को अंक तालिका की प्रति उपलब्ध कराना
यदि ये उपाय लागू होते हैं, तो भविष्य में इस प्रकार की स्थिति से बचा जा सकता है।
निष्कर्ष
पंतनगर का यह खेल महोत्सव राज्य की खेल संस्कृति के लिए ऐतिहासिक अवसर था। लेकिन ट्रॉफी विवाद ने इसकी चमक को धुंधला कर दिया।
अल्मोड़ा के खिलाड़ियों द्वारा मेडल लौटाना केवल विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था से निराशा का प्रतीक है। वहीं आयोजन समिति का दावा है कि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ।
सच्चाई चाहे जो हो, यह घटना बताती है कि खेल केवल मैदान में नहीं जीते जाते—वे विश्वास, पारदर्शिता और निष्पक्षता से भी जीते जाते हैं।
अब आवश्यकता है कि संबंधित विश्वविद्यालय और प्रशासन इस विवाद का समाधान संवाद और तथ्यों के आधार पर करें, ताकि उत्तराखंड के युवाओं का विश्वास बहाल हो सके और भविष्य के खेल आयोजन किसी विवाद के नहीं, बल्कि उपलब्धियों के लिए याद किए जाएं।




