

भराड़ीसैंण में स्थायी राजधानी को लेकर यूकेडी का प्रदर्शन, पुलिस ने रोका,भराड़ीसैंण। उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) ने मंगलवार को गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। यूकेडी के युवा नेता एवं प्रकोष्ठ अध्यक्ष पंकज सिंह एवं अन्य कार्यकर्ता भराड़ीसैंण विधानसभा घेराव करने जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें बैरियर पर रोक दिया। इस दौरान कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच नारेबाजी हुई।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर (उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)
यूकेडी कार्यकर्ताओं ने कहा कि राज्य गठन को 25 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अब तक गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पहाड़ की योजनाएं आज भी धरातल पर नहीं उतर रही हैं। यूकेडी ने स्पष्ट किया कि जब तक गैरसैंण को राजधानी का दर्जा नहीं मिलता और पहाड़ के विकास से जुड़ी योजनाएं लागू नहीं होतीं, तब तक उनका आंदोलन सड़कों पर जारी रहेगा।
प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने बदरीनाथ मास्टर प्लान को निरस्त करने, नदी किनारे हो रहे अतिक्रमण पर रोक लगाने, नशे के बढ़ते प्रकोप को खत्म करने, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने जैसी मांगें भी उठाईं। यूकेडी नेताओं ने कहा कि पहाड़ की जनता आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, जबकि राजधानी देहरादून तक सीमित रह गई है।
प्रदर्शन में पंकज सिंह के साथ राम सिंह धामी, भानु प्रताप सिंह मेहरा, प्रदीप गड़तोड़ी सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे। सभी ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और चेतावनी दी कि यदि जल्द ही गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित नहीं किया गया तो आंदोलन और उग्र किया जाएगा।
भराड़ीसैंण की वादियों में एक बार फिर वही पुरानी आवाज गूंज उठी—स्थायी राजधानी गैरसैंण की मांग। उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के युवा नेता पंकज सिंह के नेतृत्व में मंगलवार को जब कार्यकर्ता विधानसभा घेराव के लिए बढ़े तो पुलिस ने उन्हें बैरियर पर रोक दिया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं—“गैरसैंण को राजधानी बनाओ”, “बदरीनाथ मास्टर प्लान निरस्त करो”, “नदी-किनारे से अतिक्रमण हटाओ”, “नशे के खिलाफ ठोस नीति बनाओ” और “शिक्षा-स्वास्थ्य को प्राथमिकता दो।”
प्रश्न यह है कि आखिर 25 साल बाद भी यूकेडी को सड़कों पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी?✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर (उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)
उत्तराखंड की जननी—यूकेडी
कोई भी चाहे जितना राजनीतिक चश्मा पहन ले, लेकिन यह ऐतिहासिक सत्य है कि उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना यदि कहीं आकार लेती है तो उसका मूल स्त्रोत उत्तराखंड क्रांति दल है। वर्ष 1979 में स्थापित यह संगठन आज भी उस जनभावना का प्रतीक है जिसने राज्य निर्माण की नींव रखी। काशी सिंह ऐरी, जो पांच बार विधायक रहे और लंबे समय तक केंद्रीय अध्यक्ष की भूमिका निभाई, सही कहते हैं कि—
“उत्तराखंड क्रांति दल समाप्त होने का अर्थ होगा उत्तराखंड राज्य की आत्मा का अंत।”
यूकेडी केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि उस चेतना का नाम है जिसने गढ़वाल-कुमाऊं की घाटियों से उठकर दिल्ली की सत्ता को झकझोरा और अलग राज्य का मार्ग प्रशस्त किया।
जनता ने क्यों नकारा?
यह भी कटु सत्य है कि राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की जनता ने यूकेडी को चुनावों में नकारा। भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही, जबकि यूकेडी हाशिए पर चली गई। जनता ने शायद यह मान लिया कि बड़े दल ही विकास कर पाएंगे। लेकिन 25 साल बाद तस्वीर साफ है—
- न तो गैरसैंण राजधानी बन पाई,
- न ही पलायन थमा,
- न बेरोजगारी घटी,
- और न ही शिक्षा-स्वास्थ्य की स्थिति सुधरी।
ऐसे में सवाल उठता है कि जिन वादों और आदर्शों के लिए राज्य बना था, उनका प्रहरी कौन है?
आंदोलन की प्रासंगिकता
आज जब यूकेडी कार्यकर्ता गैरसैंण की सड़कों पर बैठते हैं तो यह केवल विरोध नहीं बल्कि स्मरण है उस संकल्प का, जिसके लिए हजारों युवाओं ने अपने प्राण न्यौछावर किए। यह आंदोलन बताता है कि पहाड़ की जनता की वास्तविक आकांक्षाएं अब भी अधूरी हैं।
गैरसैंण स्थायी राजधानी केवल एक प्रशासनिक मसला नहीं, बल्कि यह पहाड़ की अस्मिता और आत्मसम्मान का प्रश्न है।
असली राजनीतिक दल
भले ही चुनावी गणित में यूकेडी कमजोर दिखाई दे, लेकिन यह दल ही उत्तराखंड की आत्मा को जीवित रखे हुए है। सत्ता में बैठे दल शायद भूल जाते हैं कि जनभावनाओं से खिलवाड़ का परिणाम लंबा टिकाऊ नहीं होता। यूकेडी का अस्तित्व ही इस राज्य की परिकल्पना को जीवित रखता है। जिस दिन यह पार्टी समाप्त हो जाएगी, उसी दिन से उत्तराखंड की पहचान और उसके निर्माण का अध्याय भी मुरझाने लगेगा।
आज जब यूकेडी के कार्यकर्ता गैरसैंण के बैरियर पर रोके जाते हैं, तो यह केवल राजनीतिक टकराव नहीं बल्कि एक आदर्श और यथार्थ का संघर्ष है। सरकारें बदलती रहेंगी, नारे और घोषणाएं आती-जाती रहेंगी, लेकिन उत्तराखंड क्रांति दल का यह संघर्ष हमें बार-बार याद दिलाता रहेगा कि यह राज्य केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि जनहित और जनसंघर्ष की पूर्ति के लिए बना था।
काशी सिंह ऐरी के शब्दों में—
“यूकेडी का अस्तित्व ही उत्तराखंड की आत्मा का अस्तित्व है।”




