

रुद्रपुर। उधमसिंह नगर कार्निवाल सरस आजीविका मेला-2026 के भव्य मंच से जब पुष्कर सिंह धामी एक के बाद एक विकास योजनाओं की घोषणा कर रहे थे, तब गांधी पार्क के भीतर एक अलग ही तस्वीर दिखाई दे रही थी। मंच पर 295.21 करोड़ रुपये की 61 परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास, भविष्य की विकास योजनाओं का खाका और सरकार की उपलब्धियों का विस्तृत बखान था—लेकिन दर्शक दीर्घा में आधे से अधिक सीटें खाली दिखाई देना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह वही गांधी पार्क था, जहाँ त्रिशूल चौक से निकली शिव बारात, पुष्पवर्षा, कांवड़ियों का स्वागत और भव्य सांस्कृतिक प्रस्तुति ने माहौल को उत्सवमय बना दिया था। परंतु जब मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ, तो अंदरखाने चल रहा असंतोष पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाई देता नजर आया।
यूजीसी को लेकर ‘इनसाइड रिएक्शन’
सूत्रों के अनुसार, यूजीसी (समान नागरिक संहिता) को लेकर सामान्य श्रेणी के मतदाताओं के बीच एक शांत लेकिन गहरा असंतोष पनप रहा है। सड़कों पर प्रदर्शन नहीं, नारेबाजी नहीं, लेकिन कार्यक्रम स्थल के भीतर खाली पड़ी कुर्सियाँ एक मौन संदेश दे रही थीं।
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि यह खुला विरोध नहीं बल्कि ‘इनडोर रेजिस्टेंस’ है—एक ऐसा संकेत जो सीधे सत्ता तक पहुँच सकता है। सामान्य श्रेणी का वोट बैंक, जिसे अब तक भारतीय जनता पार्टी का मजबूत आधार माना जाता रहा है, उसमें आंतरिक असहमति के संकेत पहली बार इतने स्पष्ट दिखे।
विकास बनाम सामाजिक संतुलन
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राज्य के तीव्र विकास, अवैध मदरसों पर कार्रवाई, नकल विरोधी कानून, औद्योगिक निवेश, एम्स सैटेलाइट सेंटर और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार का उल्लेख किया।
परंतु राजनीतिक हलकों में चर्चा इस बात की रही कि क्या विकास की रफ्तार सामाजिक समीकरणों की चिंता को पीछे छोड़ रही है?
कार्यक्रम में मौजूद कुछ वरिष्ठ नागरिकों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि “सामान्य वर्ग के भीतर यूजीसी को लेकर असमंजस है। लोग खुलकर नहीं बोल रहे, पर अपनी नाराज़गी दर्ज करवा रहे हैं।”
2027 की पृष्ठभूमि में संकेत
राजनीतिक दृष्टि से यह कार्यक्रम केवल विकास का उत्सव नहीं था, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों की पूर्वपीठिका भी माना जा रहा है। सामान्य मतदाता का वोट पारंपरिक रूप से एकतरफा नहीं जाता। यह वर्ग यदि नाराज होता है तो चुपचाप दूरी बना लेता है।
दिलचस्प यह है कि यह असंतोष कांग्रेस की ओर झुकाव के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि एक प्रकार की ‘चेतावनी’ के रूप में उभर रहा है—“नीतियों पर पुनर्विचार करें, संवाद बढ़ाएं।”
क्या सरकार लेगी संकेत?
गांधी पार्क का यह दृश्य—एक ओर घोषणाओं की तालियाँ, दूसरी ओर खाली सीटों की खामोशी—शायद आने वाले समय की राजनीति का संकेत है।
यदि यह संदेश समय रहते सुना गया, तो सामाजिक संतुलन और विकास की गति साथ-साथ चल सकती है। अन्यथा, 2027 में यही मौन असहमति मतपेटी के भीतर आवाज बन सकती है।
रुद्रपुर का यह ऐतिहासिक कार्यक्रम केवल विकास योजनाओं के लिए नहीं, बल्कि उस अदृश्य विरोध के लिए भी याद रखा जाएगा, जिसने बिना शोर किए अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी।




