

सितारगंज क्षेत्र में फर्जी दस्तावेजों के सहारे प्रमाणपत्र बनवाने के मामले अभी ठंडे भी नहीं पड़े थे कि अब आधार जैसे अति संवेदनशील पहचान दस्तावेज से जुड़ा एक सनसनीखेज खुलासा सामने आ गया है। मंडी परिसर स्थित बाल विकास कार्यालय में संचालित आधार केंद्र पर फिंगरप्रिंट की फर्जी मोहर के जरिए आधार कार्ड अपडेट किए जाने का मामला न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
गांव बरुआबाग निवासी गुरप्रीत सिंह की शिकायत पर की गई प्रशासनिक छापेमारी में जो तथ्य सामने आए, वे साफ तौर पर यह दर्शाते हैं कि आधार जैसी राष्ट्रीय पहचान प्रणाली को स्थानीय स्तर पर किस तरह मज़ाक बना दिया गया है। अधिकृत संचालक विक्रम सिंह की शह पर मो. फैजान द्वारा फर्जी फिंगरप्रिंट मोहर के सहारे आधार अपडेट करना सीधे-सीधे जालसाजी और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ की श्रेणी में आता है।
छापेमारी के दौरान यह भी उजागर हुआ कि केंद्र पर न तो शुल्क सूची चस्पा थी और न ही निर्धारित दरों का पालन किया जा रहा था। यानी आम जनता को लूटने का यह एक संगठित अड्डा बन चुका था। दो लैपटॉप और फर्जी उपकरणों की बरामदगी यह संकेत देती है कि यह गतिविधि लंबे समय से निर्बाध रूप से चल रही थी—और प्रशासन या संबंधित विभाग आंख मूंदे बैठा रहा।
तहसीलदार हिमांशु जोशी द्वारा केंद्र को सील करना और एफआईआर की प्रक्रिया शुरू करना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ निचले स्तर के ऑपरेटरों पर कार्रवाई कर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच पाएगा? आखिर इतने समय तक यह गोरखधंधा कैसे चलता रहा?
यह मामला स्पष्ट करता है कि आधार केंद्रों की नियमित निगरानी, ऑडिट और सख्त दंडात्मक कार्रवाई अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। अन्यथा, आम नागरिकों की पहचान ही खतरे में पड़ती रहेगी और व्यवस्था केवल कागज़ी कार्रवाई तक सिमट कर रह जाएगी।




