संपादकीय | बाजपुर की सीलिंग भूमि: कानून, राजनीति और शिक्षा के बीच फंसा सच

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बाजपुर तहसील के केलाखेड़ा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बिजपुरी में प्रशासन द्वारा सीलिंग भूमि पर कब्जा लेकर नोटिस चस्पा करना केवल एक राजस्व कार्रवाई भर नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासनिक इच्छाशक्ति, शिक्षा के निजीकरण और वर्षों से लंबित भूमि विवादों के जटिल ताने-बाने को उजागर करता है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसमें पूर्व शिक्षा मंत्री और वर्तमान गदरपुर विधायक अरविंद पांडे का नाम प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ा गया, और दूसरी ओर दर्जनों शैक्षणिक संस्थानों तथा हजारों विद्यार्थियों का भविष्य इस विवाद की जद में आ गया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


आरोप, हंगामा और फिर सीलिंग का सच
बीते दिनों यह आरोप जोर-शोर से उछला कि विधायक अरविंद पांडे और उनके भाई अमर पांडे ने ग्राम बिजपुरी की भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस आरोप ने आग की तरह फैलकर एक नैरेटिव गढ़ दिया—कि सत्ता में प्रभाव रखने वाले लोग जमीन हड़प रहे हैं। लेकिन प्रशासनिक जांच में जो तथ्य सामने आए, वे इस पूरे प्रकरण को एक नया मोड़ देते हैं।
एसडीएम डॉ. अमृता शर्मा के नेतृत्व में हुई कार्रवाई में यह भूमि सीलिंग वाद संख्या 51/82 (1974-75) के अंतर्गत अतिरिक्त सीलिंग भूमि पाई गई, जिस पर पहले ही 21 नवंबर 2025 को एडीएम द्वारा आदेश पारित हो चुका था। इस आदेश का आधार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के पुराने निर्णय हैं, जिनकी अवहेलना दशकों से होती रही। यानी, यह जमीन किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि राज्य सरकार की संपत्ति है—यह तथ्य प्रशासनिक कार्रवाई के बाद औपचारिक रूप से स्थापित हुआ।
राजनीति बनाम प्रशासन
यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि यह भूमि वर्षों पहले ही सीलिंग में दर्ज थी, तो अब तक उस पर निजी कॉलेज, आवास और यहां तक कि मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े प्रोजेक्ट कैसे खड़े हो गए? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं है? और यदि है, तो उसकी जवाबदेही किसकी है?
इस पूरे घटनाक्रम में विधायक अरविंद पांडे का रुख भी ध्यान देने योग्य है। प्रशासनिक कार्रवाई से पहले ही वह स्वयं एसडीएम कार्यालय पहुंचे और मुख्यमंत्री को संबोधित पत्र सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस भूमि को लेकर उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं, यदि वह अवैध है तो प्रशासन तत्काल प्रभाव से उस पर कार्रवाई करे और जरूरत पड़े तो उस बुजुर्ग महिला परमजीत कौर को कब्जा दिलाए, जिनके नाम को लेकर यह विवाद बार-बार उछाला गया।
यह व्यवहार राजनीति में कम ही देखने को मिलता है, जहां अक्सर नेता जांच से पहले ही उसे “राजनीतिक प्रतिशोध” बताकर खारिज कर देते हैं। यहां प्रशासन की कार्रवाई ने यह भी साबित किया कि आरोपों के शोर से अलग तथ्य कुछ और ही थे।
बुजुर्ग महिला का सवाल और नैतिक पक्ष
इस प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू बुजुर्ग महिला परमजीत कौर का है, जिनका नाम बार-बार इस विवाद में सामने लाया गया। विधायक पांडे का आरोप है कि कुछ लोगों ने छह वर्षों से इस बुजुर्ग महिला को मोहरा बनाकर उनका और राज्य की राजनीति का इस्तेमाल किया। यह आरोप गंभीर है, क्योंकि यदि सच है तो यह न केवल राजनीतिक साजिश बल्कि सामाजिक अमानवीयता का भी उदाहरण है।
यह सवाल प्रशासन और समाज दोनों से है—क्या हमारी व्यवस्था इतनी कमजोर है कि बुजुर्गों और असहायों को वर्षों तक कानूनी लड़ाई में घसीटा जाए, और अंत में पता चले कि जमीन तो सीलिंग की थी, किसी की व्यक्तिगत नहीं?
शिक्षा संस्थान और छात्रों का भविष्य
ग्राम बिजपुरी की इस सीलिंग भूमि पर छह बड़े शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं—बीएड कॉलेज, शिक्षा महाविद्यालय और एक निर्माणाधीन मेडिकल कॉलेज तक। इन संस्थानों में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं की संख्या हजारों में है। प्रशासन द्वारा नोटिस चस्पा होते ही स्वाभाविक रूप से छात्रों और अभिभावकों में चिंता फैल गई।
एसडीएम डॉ. अमृता शर्मा का यह बयान कि “कार्रवाई अवैध निर्माण के खिलाफ है, न कि विद्यार्थियों के खिलाफ” राहत देने वाला जरूर है, लेकिन यह भी एक कठोर सच्चाई है कि ऐसी स्थिति में छात्रों का भविष्य असमंजस में पड़ जाता है। यह पहली बार नहीं है जब उत्तराखंड में निजी शिक्षा संस्थानों के भूमि और मान्यता संबंधी विवाद सामने आए हों। सवाल यह है कि जब संस्थानों को मान्यता दी जाती है, तब भूमि के दस्तावेजों की गहन जांच क्यों नहीं होती?
प्रशासनिक जिम्मेदारी और दोहरा मापदंड
यह पूरा मामला प्रशासनिक दोहरेपन की ओर भी इशारा करता है। एक ओर दशकों तक सीलिंग भूमि पर निर्माण होता रहा, संस्थान चलते रहे, और दूसरी ओर अचानक सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के आदेशों की याद आ गई। यदि कानून इतना ही पवित्र है, तो उसका पालन समय पर क्यों नहीं कराया गया?
उत्तराखंड में अक्सर देखा गया है कि छोटे कब्जेदारों पर बुलडोजर चलता है, लेकिन बड़े संस्थान और प्रभावशाली लोग वर्षों तक कानून से ऊपर बने रहते हैं। बिजपुरी की कार्रवाई तभी एक मिसाल बनेगी, जब यह बिना भेदभाव के अपने अंजाम तक पहुंचे।
मीडिया ट्रायल और छवि का प्रश्न
विधायक अरविंद पांडे द्वारा पुलिस और कुछ अधिकारियों पर यह आरोप लगाना कि वीडियो और खबरों को इस तरह फैलाया गया मानो वह “विलेन” हों, आज के मीडिया युग की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। आरोप लगना और जांच होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जांच से पहले ही किसी को दोषी ठहरा देना न केवल व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि जनता का भरोसा भी तोड़ता है।
निष्कर्ष: कानून का राज या अवसरवादी कार्रवाई?
बाजपुर की यह सीलिंग कार्रवाई एक कसौटी है—राज्य के लिए, प्रशासन के लिए और राजनीति के लिए। यदि यह कार्रवाई सिर्फ सुर्खियों तक सीमित रही और बाद में समझौते या दबाव में ढीली पड़ गई, तो यह जनता के विश्वास के साथ एक और धोखा होगा। लेकिन यदि यह निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनसम्मत ढंग से अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचती है, तो यह उत्तराखंड में भूमि सुधार कानूनों के क्रियान्वयन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा।
साथ ही, सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों का भविष्य किसी भी कीमत पर अंधकारमय न हो। अवैधता पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन व्यवस्था की विफलताओं का दंड विद्यार्थियों को नहीं मिलना चाहिए।
बिजपुरी का मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि न्याय, नैतिकता और शासन की साख का मामला है। अब देखना यह है कि उत्तराखंड की सरकार और प्रशासन इस कसौटी पर कितना खरा उतरता है।


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