संपादकीय,मानव-वन्यजीव संघर्ष, आपदाएँ और पलायन : क्या केवल मुआवजा ही समाधान है?

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रुद्रपुर,उत्तराखंड की पहाड़ों से आती खबरें आज केवल प्राकृतिक सौंदर्य की कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि वे उस पीड़ा की गवाही भी देती हैं जिसे वहां के ग्रामीण वर्षों से झेल रहे हैं। हाल ही में विधानसभा में वन मंत्री Subodh Uniyal ने बताया कि राज्य गठन के बाद से अब तक वन्य जीवों के हमलों में 1296 लोगों की मौत हो चुकी है और 6624 लोग घायल हुए हैं। यह आंकड़ा केवल एक सरकारी सूचना नहीं है, बल्कि यह उस भय और असुरक्षा का प्रमाण है जिसमें उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों के लोग जीने को मजबूर हैं।
यह सवाल इसलिए भी गंभीर हो जाता है क्योंकि उत्तराखंड का गठन ही पहाड़ के लोगों की उम्मीदों और सुरक्षा के सपनों के साथ हुआ था। लेकिन आज हालात यह हैं कि गांवों में खेती करने जाना, जंगल से घास-लकड़ी लाना या शाम को घर लौटना भी जानलेवा जोखिम बन चुका है।
मुआवजा बढ़ा, लेकिन समस्या जस की तस
सरकार ने हाल के वर्षों में मुआवजे की राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी है। पहले यह राशि चार लाख थी, फिर छह लाख हुई और अब दस लाख कर दी गई। पहली नजर में यह कदम संवेदनशील प्रतीत होता है, लेकिन क्या यह वास्तव में समाधान है?
दरअसल, किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य यदि वन्य जीव के हमले में मारा जाता है, तो दस लाख रुपये उस परिवार की आजीवन सुरक्षा नहीं कर सकते। पहाड़ों में एक व्यक्ति की मौत केवल एक जान का जाना नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट जाती है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वन्य जीव हमलों में मृतकों के आश्रितों को सरकारी नौकरी देने का कोई प्रावधान नहीं है। यही वह बिंदु है जहां सवाल खड़े होते हैं। यदि किसी परिवार का एकमात्र सहारा खत्म हो जाए और बदले में केवल एकमुश्त राशि दी जाए, तो क्या वह परिवार लंबे समय तक टिक पाएगा?
सुरक्षा उपायों पर भी उठते हैं सवाल
वन विभाग की ओर से गश्त, क्विक रिस्पांस टीम (QRT), पिंजरे लगाने, ट्रेंक्यूलाइज करने और बायोफेंसिंग जैसी योजनाओं की बात कही जाती है। लेकिन पहाड़ के कई गांवों में आज भी यह व्यवस्थाएं कागजों में ही दिखाई देती हैं।
वन्य जीवों की बढ़ती आवाजाही, खेती का उजड़ना और पशुधन का नुकसान ग्रामीणों को धीरे-धीरे गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर रहा है। यही कारण है कि उत्तराखंड के हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं।
भालू, तेंदुए और डर का माहौल
विधानसभा में Harish Dhami ने पिथौरागढ़ के दारमा क्षेत्र में भालुओं द्वारा घरों को नुकसान पहुंचाने का मुद्दा उठाया। यह समस्या केवल पिथौरागढ़ की नहीं है, बल्कि पूरे पर्वतीय उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रही है।
अब सरकार ने भालुओं द्वारा घरों को नुकसान पहुंचाने पर भी मुआवजे का प्रावधान किया है। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन मूल प्रश्न फिर वही है—क्या केवल मुआवजा देकर लोगों के डर और असुरक्षा को समाप्त किया जा सकता है?
वनाग्नि और आपदाओं का बढ़ता संकट
वन मंत्री के अनुसार वर्ष 2024 में प्रदेश में 1276 वनाग्नि घटनाएं हुईं, जिनसे 1771.66 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ और 13 लोगों की मौत भी हुई।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में वनाग्नि केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जल स्रोतों और वन्य जीवों के व्यवहार को भी प्रभावित करती है। जंगलों में आग लगने के बाद वन्य जीव अक्सर आबादी की ओर आने लगते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष और बढ़ जाता है।
पलायन की जड़ में असुरक्षा
पहाड़ से पलायन के कई कारण बताए जाते हैं—रोजगार की कमी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव। लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण सुरक्षा की कमी भी है।
जब किसी गांव में हर साल तेंदुए के हमले की खबर आती हो, जब खेत में काम करना भी खतरे से खाली न हो, जब जंगल से लकड़ी लाना मौत को न्योता देने जैसा लगे—तो स्वाभाविक है कि लोग अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए मैदानों की ओर पलायन करेंगे।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष और प्राकृतिक आपदाएं भी उत्तराखंड के पलायन के बड़े कारण बनते जा रहे हैं।
केवल राहत नहीं, स्थायी समाधान चाहिए
सरकार को यह समझना होगा कि मुआवजा देना केवल दुर्घटना के बाद की प्रतिक्रिया है, समाधान नहीं।
जरूरत है कि
वन्य जीवों की आवाजाही वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वे हो
गांवों के आसपास मजबूत बाड़ और तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था हो
संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा योजना लागू की जाए
और सबसे महत्वपूर्ण, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और रोजगार की ठोस व्यवस्था की जाए।
अंत में
उत्तराखंड की पहाड़ियां केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, वे लाखों लोगों का घर हैं। यदि वहां रहने वाले लोग ही असुरक्षित महसूस करेंगे, तो पलायन रुकना असंभव है।
सरकार को यह समझना होगा कि मुआवजा किसी की जान की कीमत नहीं हो सकता। पहाड़ के लोगों को केवल आर्थिक राहत नहीं, बल्कि सुरक्षित जीवन का अधिकार चाहिए। तभी उत्तराखंड के गांव बच पाएंगे और पलायन की यह दर्दनाक कहानी रुक सकेगी।


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