

उत्तराखंड केवल हिमालय की गोद में बसा एक राज्य नहीं, बल्कि यह वह पवित्र भूमि है जहाँ हर पत्थर, हर सरिता और हर वायु कण में दिव्यता का स्पंदन है। देवभूमि कहलाने का अर्थ ही यही है कि यहाँ जीवन के हर आयाम में धर्म, संस्कृति और लोक परंपराओं की गहरी जड़ें हैं। यहाँ के लोकपर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति हैं — और उन्हीं में से एक है “इगास बग्वाल”, जिसे बूढ़ी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है।

दीपों से नहीं, भावों से जगमगाता पर्व
इगास, दीपावली के ग्यारहवें दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन पर्व 1 नवंबर 2025 को देवभूमि के हर घर-आंगन में उल्लास के साथ मनाया जाएगा। परंपरा कहती है कि जब भगवान श्रीराम चौदह वर्षों के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे, तो पूरी धरती दीपमालाओं से जगमगा उठी। किंतु गढ़वाल के पहाड़ों तक यह शुभ समाचार देरी से पहुँचा। जब यहाँ के लोगों को श्रीराम के आगमन की सूचना मिली, तब उन्होंने ग्यारहवें दिन दीप जलाकर वही आनंदोत्सव मनाया। यही पर्व “इगास” कहलाया — यानी वह दीपावली, जो समय से नहीं बल्कि समर्पण से मनाई गई।
वीरता का प्रतीक — माधो सिंह भंडारी का गौरव
इगास केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वीरता और राष्ट्रभक्ति से भी जुड़ा हुआ पर्व है। इतिहास में यह पर्व गढ़वाल के महान सेनापति वीर माधो सिंह भंडारी की विजय से भी संबंधित माना जाता है। कहा जाता है कि जब गढ़वाल सेना तिब्बत की ओर युद्ध के लिए रवाना हुई, तो राजा महिपति शाह ने आदेश दिया था कि दीपावली से पूर्व लौटना है। परंतु युद्ध लम्बा चला। दीपावली गुजर गई, लोग चिंतित हुए, किसी ने कहा — “सेना तो शायद शहीद हो गई।” पर जब ग्यारह दिन बाद माधो सिंह अपनी सेना के साथ विजय के साथ लौटे, तो गढ़वाल ने दीपों का महासागर रच दिया — और इस विजय पर्व का नाम पड़ा इगास बग्वाल।
इस प्रकार इगास केवल प्रकाश का ही नहीं, बल्कि साहस, समर्पण और उत्तराखंडी स्वाभिमान का पर्व बन गया।
गौसेवा और ग्राम जीवन की पवित्रता
देवभूमि की संस्कृति प्रकृति और पशुधन से गहराई से जुड़ी है। इगास के दिन गौवंश की पूजा की जाती है। गाय और बैलों को स्नान कराया जाता है, उनके सींगों में तेल लगाया जाता है, गले में फूलों की मालाएँ पहनाई जाती हैं और उन्हें पौष्टिक भोजन (च्यूरा, गुड़, और नमक) खिलाया जाता है। यह केवल धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि उस कृषि संस्कृति का सम्मान है, जिसके कारण उत्तराखंड की आत्मा आज भी गाँवों में धड़कती है।
भैलो—लोक आनंद का प्रतीक
इगास का एक अद्भुत दृश्य होता है — भैलो खेलना। गाँव के युवा और बच्चे चीड़ की सूखी लकड़ियों के छोटे-छोटे गठ्ठर (भैलो) बनाते हैं, उन्हें रस्सी से बाँधते हैं और आग लगाकर गोल घुमाते हैं। जब ये अग्निचक्र रात के आकाश में घूमते हैं, तो ऐसा लगता है मानो आकाश में तारे नाच रहे हों। “भैलो रे भैलो, काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू” जैसे गीतों की गूँज में पूरा वातावरण उल्लास से भर जाता है। चांछड़ी, झुमेलो और मांगल गीतों के साथ यह पर्व देवताओं के जागरण में परिवर्तित हो जाता है।
आधुनिकता में भी अमर परंपरा
आज जब दुनिया कृत्रिम रोशनी और डिजिटल खुशियों में खो गई है, तब भी उत्तराखंड के पर्वत और घाटियाँ इगास के दीपों से सच्चा उजाला फैलाती हैं। यह उजाला केवल दीयों का नहीं, बल्कि उन मूल्यों का है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं — संस्कार, श्रम, श्रद्धा और सम्मान।
इगास हमें यह भी सिखाता है कि पर्व केवल तिथि नहीं होते, बल्कि भावनाओं के पुनर्जन्म का अवसर होते हैं।
देवभूमि की आत्मा का संदेश
उत्तराखंड में हर त्योहार प्रकृति से संवाद करता है — कहीं लोकगीतों में देवता उतरते हैं, तो कहीं दीपों में शौर्य झलकता है। इगास इस संवाद की चरम अभिव्यक्ति है — यह वह पर्व है जहाँ दीपों में भगवान राम की भक्ति, माधो सिंह की वीरता और गढ़वाल-कुमाऊं के जनमानस की सादगी एक साथ झलकती है।
जब इगास की रात में गाँवों की घाटियाँ दीपों से जगमगाती हैं, तो यह केवल एक त्योहार नहीं होता — यह उत्तराखंड की आत्मा का उत्सव होता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता की चमक में भी अपनी लोकसंस्कृति का दीपक बुझने नहीं देना चाहिए।
क्योंकि जब तक इगास के दीये जलते रहेंगे, तब तक देवभूमि की पहचान — उसकी श्रद्धा, वीरता और संस्कृति — अमर रहेगी।
“भैलो रे भैलो… उज्यालू आलो, अंधेरो भगलू।”
यह केवल गीत नहीं, बल्कि देवभूमि उत्तराखंड की आत्मा की पुकार है —
अंधकार मिटे, और लोक संस्कृति का उजाला सदा कायम रहे।




