संपादकीय:कांग्रेस की नई टीम में कुमाऊं, मैदान और हरीश रावत की अनदेखी — तिलक राज बहेड़ जैसे जमीनी नेताओं के प्रति भी अन्याय

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उत्तराखंड कांग्रेस की नई संगठनात्मक टीम के ऐलान के बाद पार्टी के भीतर जो हलचल मची है, वह किसी आकस्मिक असंतोष का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही उपेक्षा की परिणति है।
जहाँ पार्टी आलाकमान इसे “नई ऊर्जा और नई शुरुआत” कह रहा है, वहीं जमीनी कार्यकर्ताओं, विशेषकर कुमाऊं और मैदानी जिलों के कांग्रेस समर्थकों के बीच गहरा असंतोष और मोहभंग देखने को मिल रहा है।

दरअसल, नई टीम में गढ़वाल का दबदबा स्पष्ट रूप से दिखता है, जबकि कुमाऊं और मैदान के अनुभवी, जुझारू नेताओं को किनारे कर दिया गया है। यह वही क्षेत्र हैं जिन्होंने कांग्रेस को जनाधार दिया, आंदोलनों में मोर्चा संभाला और भाजपा के खिलाफ वर्षों तक संघर्ष किया।


कुमाऊं की अनदेखी — संगठन की आत्मा से दूरी?कुमाऊं सदैव कांग्रेस की आत्मा रहा है। अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत जैसे जिलों ने न केवल पार्टी के लिए मजबूत राजनीतिक आधार तैयार किया, बल्कि विचारधारा की जड़ों को भी सींचा।

परंतु नई कार्यकारिणी में इस क्षेत्र के नामों का लगभग लोप दिखाई देता है। कई वरिष्ठ नेताओं और पूर्व विधायकों को या तो केवल प्रतीकात्मक जिम्मेदारी दी गई या पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।
यह स्थिति न केवल असंतुलन की ओर इशारा करती है बल्कि एक राजनीतिक भूल का संकेत भी देती है — क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन ही सफलता की कुंजी रहा है।


मैदानी जिलों की उपेक्षा — उधम सिंह नगर की अनदेखी?उधम सिंह नगर, जो राज्य की अर्थव्यवस्था, कृषि और औद्योगिक ताकत का केंद्र है, आज कांग्रेस के संगठन में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।
रुद्रपुर, किच्छा, जसपुर और काशीपुर जैसे शहरों ने कांग्रेस को कई बार निर्णायक बढ़त दिलाई है, पर अब उन्हें संगठन में प्रतिनिधित्व तक नहीं मिला।

यह विडंबना है कि जिस जिले ने कांग्रेस को बड़े चेहरे और अनुभवी नेता दिए — जैसे पूर्व मंत्री तिलक राज बहेड़, जिनकी पहचान न केवल उधम सिंह नगर बल्कि पूरे कुमाऊं में एक जमीनी, सर्वस्वीकार्य और संघर्षशील नेता के रूप में है — उसी जिले को इस नई टीम में लगभग भुला दिया गया है।

बहेड़ न केवल कांग्रेस के पुराने सिपाही हैं, बल्कि उन्होंने हमेशा संगठन को एकजुट करने का काम किया।
उनकी लोकप्रियता यह बताने के लिए काफी है कि मैदान की राजनीति को दिल्ली से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस के अंदर यह चर्चा तेज है कि यदि तिलक राज बहेड़ जैसे सीनियर नेताओं को निर्णायक भूमिका से बाहर रखा गया, तो पार्टी मैदान में अपने जनाधार को संभाल नहीं पाएगी।


हरीश रावत की अनदेखी — अनुभव पर राजनीति का पलड़ा भारी?कांग्रेस की नई टीम में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के समर्थकों की उपेक्षा ने भी पार्टी में असंतोष को भड़का दिया है।
रावत भले ही सार्वजनिक रूप से चुप हों, पर उनके समर्थक खुलकर कह रहे हैं कि यह केवल “व्यक्ति” की नहीं, बल्कि “योगदान” की अनदेखी है।
रावत ने कांग्रेस को दो बार सत्ता तक पहुँचाया, और आज भी पहाड़ से लेकर मैदान तक उनकी पकड़ और पहचान कायम है।
उनके निकटवर्ती नेताओं को नज़रअंदाज़ करना, पार्टी के भीतर संवाद की कमी और गुटबाज़ी की गहराई को उजागर करता है।


राजनीतिक समीकरण और 2027 की चुनौती?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संगठनात्मक असंतुलन 2027 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान पहुँचा सकता है।
गढ़वाल में संगठन मजबूत दिख सकता है, लेकिन कुमाऊं और मैदान, जो कुल सीटों का लगभग आधा हिस्सा रखते हैं, वहाँ कांग्रेस कमजोर पड़ सकती है।

मैदान की राजनीति में जातीय और वर्गीय समीकरणों का गहरा असर होता है।
ऐसे में तिलक राज बहेड़ जैसे नेताओं को किनारे करना कांग्रेस के लिए “आत्मघाती कदम” साबित हो सकता है।
कुमाऊं में पहले से ही भाजपा की पकड़ मजबूत है; वहाँ अगर कांग्रेस ने असंतोष को नहीं संभाला, तो जो बची-खुची ताकत है, वह भी बिखर सकती है।


दिल्ली बनाम देहरादून की राजनीति?नई कार्यकारिणी को लेकर कार्यकर्ताओं में यह धारणा भी गहरी हुई है कि फैसले दिल्ली दरबार से थोपे गए हैं, न कि स्थानीय स्तर पर परामर्श लेकर।
उत्तराखंड जैसे छोटे और संवेदनशील राज्य में “थोपे गए संगठन” की नीति हमेशा उलटा असर करती है।
यही कारण है कि आज कार्यकर्ता महसूस कर रहे हैं कि उनकी आवाज़ न तो सुनी जा रही है, न ही सम्मानित की जा रही है।


नई टीम” या “नई चुनौती”?कांग्रेस की यह नई टीम भले ही “नई शुरुआत” के नारे के साथ आई हो, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इससे पार्टी के भीतर नई चुनौती खड़ी हो गई है।
कुमाऊं, मैदान और हरीश रावत — ये तीनों नाम अब केवल असंतोष के प्रतीक नहीं, बल्कि कांग्रेस के संकट संकेत बन चुके हैं।

यदि पार्टी ने तिलक राज बहेड़ जैसे अनुभवी, संघर्षशील नेताओं की अनदेखी जारी रखी,
यदि मैदान और कुमाऊं के जनाधार को प्रतिनिधित्व नहीं मिला,
तो यह “नई टीम” कांग्रेस के लिए नहीं, बल्कि भाजपा के लिए एक “राजनीतिक तोहफा” साबित होगी।


उत्तराखंड कांग्रेस:- गणेश गोदियाल प्रदेश अध्यक्ष, प्रीतम सिंह चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष , डॉ हरक सिंह रावत चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष नियुक्त।

उत्तराखंड की राजनीति में संतुलन, संवाद और सम्मान तीनों ही अनिवार्य हैं।
अगर कांग्रेस ने इन्हें नज़रअंदाज़ किया, तो संगठन में “नई ऊर्जा” की जगह “नई दूरी” पैदा होगी —
और यह दूरी न केवल नेताओं के बीच, बल्कि जनता के दिलों में भी गहरी जड़ें जमाएगी।



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