

भारत का संविधान भाषाई विविधता को सम्मान देने वाला विश्व का सबसे सशक्त दस्तावेज़ है। अनुच्छेद 345 राज्यों को यह अधिकार देता है कि वे अपनी एक या अधिक भाषाओं को राजकीय भाषा घोषित कर सकते हैं। लेकिन यह कितना विडंबनापूर्ण है कि उत्तराखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य ने इस अधिकार का प्रयोग आज तक नहीं किया। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य के गठन के साथ ही जनता को यह उम्मीद थी कि उनकी बोली—कुमाऊनी और गढ़वाली—को राजकीय दर्जा मिलेगा। परंतु राज्य स्थापना के 25 वर्ष बाद भी यह सपना अधूरा है।

आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है — जब भाषा ही नहीं बचेगी, तो संस्कृति, अस्मिता और पहचान किसकी बचेगी? पहाड़ों के लोकगीतों, लोककथाओं और कहावतों में जो जीवन का दर्शन समाया है, वह किसी भी शहरी भाषा में नहीं मिल सकता। परंतु दुख की बात यह है कि उत्तराखंड का शासन तंत्र अपनी जड़ों से ही कटता जा रहा है। “स्थानीयता” का स्थान “सरकारी सुविधा” ने ले लिया है, और मातृभाषा की जगह पराई भाषाएँ हमारे घरों, स्कूलों और कार्यालयों में हावी हो गई हैं।
राज्य आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड की कल्पना केवल प्रशासनिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में की थी। उनका सपना था — “अपनी बोली में बोलेगा उत्तराखंड, अपने शब्दों में सोचेगा उत्तराखंड।” परंतु आज वही आंदोलनकारी पीढ़ी देख रही है कि उनके बच्चों को अपनी भाषा में गिनती तक नहीं आती। कुमाऊनी और गढ़वाली बोलने वाली नई पीढ़ी अंग्रेज़ी और हिंदी के दबाव में मौन होती जा रही है। यह मौन केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मृत्यु का संकेत है।
सरकारें हर वर्ष राज्य स्थापना दिवस पर भाषण देती हैं — “हम अपनी संस्कृति को बचाएंगे, लोक परंपराओं को आगे बढ़ाएंगे” — लेकिन ज़मीनी स्तर पर कुछ नहीं बदलता। शिक्षा नीति में न कुमाऊनी-गढ़वाली को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल किया गया, न प्रशासनिक संचार में इन भाषाओं का प्रयोग बढ़ाया गया। नतीजा यह हुआ कि हमारी भाषाएँ अब “घर की दीवारों” तक सीमित रह गई हैं, और धीरे-धीरे वहां से भी लुप्त हो रही हैं।
वास्तव में, भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि एक सभ्यता की आत्मा होती है। यह व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और पहचानने का तरीका तय करती है। इसलिए जब कोई भाषा मरती है, तो उसके साथ एक पूरा संसार मर जाता है। उत्तराखंड की इस स्थिति को बदलने के लिए केवल नीतिगत घोषणाएँ नहीं, बल्कि ठोस संवैधानिक कदम उठाने की आवश्यकता है।
अनुच्छेद 345 स्पष्ट कहता है कि राज्य चाहे तो अपनी लोकभाषाओं को राजकीय दर्जा दे सकता है। फिर सवाल यह है कि उत्तराखंड सरकार ने अब तक यह कदम क्यों नहीं उठाया? क्या यह उदासीनता केवल राजनीतिक है, या हमारी सामूहिक असंवेदनशीलता का परिणाम? उत्तराखंड के दोनों मंडल—गढ़वाल और कुमाऊँ—भाषाई रूप से भले ही अलग हों, लेकिन दोनों की पीड़ा समान है। गढ़वाली और कुमाऊनी दोनों ही ‘अपनी ही धरती पर परायी’ बना दी गई हैं।
इसी परिप्रेक्ष्य में रुद्रपुर से उठी एक नई उम्मीद की लौ विशेष महत्व रखती है। 7, 8 और 9 नवंबर 2025 को जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), रुद्रपुर में आयोजित होने जा रहा 17वां राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भाषाई अस्तित्व की पुकार है। यह सम्मेलन उत्तराखंड की लोकभाषा चेतना को नया जीवन देने का एक सशक्त प्रयास है।
सम्मेलन के संरक्षक डॉ. हयात सिंह रावत और अन्य विद्वानों का यह प्रयास सराहनीय है कि वे भाषा को केवल संवाद नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का आधार बना रहे हैं। रुद्रपुर की भूमि हमेशा से प्रवासियों, शिक्षाविदों और कर्मशील युवाओं की रही है। यही कारण है कि यह सम्मेलन मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि एक जनजागरण की शुरुआत बनता जा रहा है।
यह सम्मेलन इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है, जहाँ उत्तराखंड के लोग फिर से अपनी मातृभाषा में बोलने और लिखने का गर्व महसूस करें। स्कूलों और महाविद्यालयों में कुमाऊनी और गढ़वाली को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल करने की मांग इस सम्मेलन से और प्रबल होगी। साथ ही यह आयोजन गढ़वाली, जौनसारी, थारू, राजी जैसी अन्य स्थानीय भाषाओं के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
रुद्रपुर का यह प्रयास इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह राज्य स्थापना की रजत जयंती के अवसर पर हमें याद दिलाता है कि उत्तराखंड की आत्मा उसकी भाषाओं में बसती है। यदि बोली बचेगी, तो संस्कृति बचेगी; और यदि संस्कृति बचेगी, तो उत्तराखंड बचेगा।
अब समय आ गया है कि राज्य सरकार अपने ही संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत कुमाऊनी और गढ़वाली को राजकीय भाषा घोषित करे। यह केवल भाषाई न्याय नहीं होगा, बल्कि उत्तराखंड के आत्मसम्मान का पुनर्जन्म होगा।
अगर आज हम अपनी भाषा को संवैधानिक दर्जा नहीं दिला पाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल इतिहास की किताबों में “कुमाऊनी” और “गढ़वाली” के नाम पढ़ेंगी, जैसे हम आज संस्कृत ग्रंथों में विलुप्त सभ्यताओं के नाम पढ़ते हैं।
उत्तराखंड को अपनी पहचान बचानी है, तो सबसे पहले अपनी भाषा को बचाना होगा। यह लड़ाई केवल भाषाविदों या साहित्यकारों की नहीं, बल्कि हर उस उत्तराखंडी की है जो अपने अस्तित्व से प्रेम करता है।
रुद्रपुर का यह सम्मेलन इसी चेतना की लौ है — एक ऐसी लौ जो शायद पूरे उत्तराखंड को फिर से अपनी मिट्टी की गंध, अपनी बोली की मिठास और अपने स्वाभिमान की आवाज़ से जोड़ दे।
कुमाऊनी-गढ़वाली को मान्यता देना केवल भाषा की लड़ाई नहीं — यह उत्तराखंड की आत्मा को पुनर्जीवित करने का संकल्प है।




